Wednesday, February 4, 2015

तुम्हारे प्यार की खुशबू में



रात भर बारिश में,
ऐसे भीगा मोगरा
जैसे भीगता है मन मेरा
तुम्हारे प्यार में
और खिल खिल सा जाता है।
मैंने उस मोगरे की
बना ली है वेणी
और टांक लिया है जूड़े में
इस तरह महकती रहती हूँ
तुम्हारे प्यार की खुशबू में।
++किरण++

Saturday, January 31, 2015

मुहब्बत का मौसम ग़ज़ल गा रहा है


आफताब है वो मेरा सहर कर रहा है
दीदार धीरे धीरे असर कर  रहा है

न दिल पास में है ना धड़कन  बची है
मुहब्बत का मौसम  ग़ज़ल गा रहा है

संवरती हूँ जब भी आईने के सामने
प्यार से उसके मेरा बदन खिल  रहा है

शबनम बन बिखरती  फिजाओं में हूँ
फ़रिश्ता हिफाजत मेरी कर रहा है

प्यार मैं भी करती हूँ उससे इस तरह
जैसे मस्जिद में कोई दुआ कर रहा है

Tuesday, January 27, 2015

मैंने सिर्फ मुहब्बत की

हवायें बदली बदली हैं ये मौसम बहका बहका है
मैंने सिर्फ मुहब्बत की तो फिर ये जादू कैसा है।
नज़्मों के बादल घिरे थे कुछ गज़लें भी बरसी थीं
मेरी कच्ची धरती से उठी भाप में चंदन महका है।
उस रात चाँद से तुमने क्या कह दिया बता देना
आजकल मुझसे जानें क्यूँ वो उखड़ा उखड़ा रहता है 

तुम्हे जब याद करती हूँ तो होंठ मुस्कानें लगते हैं
ये दुनिया वाले कहते हैं मुझे शायद कुछ हुआ सा है।

Saturday, January 24, 2015

वसंत ! क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर.

ये मेरा सौभाग्य है की डिग्री कॉलेज में पहला चयन मेरा निराला की धरती गढ़ाकोला निकट उन्नाव में हुआ. गढ़ाकोला माँ सरस्वती के वरद पुत्र महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी का पैत्रिक गाँव  है वैसे उनका जन्म वसंत पंचमी के दिन 21फरवरी 1896 को मिदनापुर पश्चिमी बंगाल में हुआ था.बंगला, हिंदी,संस्कृत,और अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले महाप्राण ने अपनी छाया से  हिंदी साहित्य में वसंत  के अग्रदूत बने.… किंतु  दुर्भाग्य से वो अपने जीवन को पतझड़ से अलग नहीं कर सके.

ये निराला का ही प्रताप है की आज भी वहां की धरती में कुछ ऐसी अनुभूति  है की आप की लेखनी रचियता बन भाव को शब्दों में पिरोने लगती है .वो भाव जो अब स्थाई भाव है के साथ मेरी रचना।।

वसंत देखा तुम्हे था
निराला की रचना में
कवि की कल्पना में
उस घाट  पर बाधी थी नाव जहाँ कवि ने
अब तुम क्यों नजर नहीं आते
प्रेम गीत अब क्यों नहीं गाते
क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर
सुस्ताना था वहां तुम्हे पल भर
अभी भी शाखों में फूल खिलते हैं
प्रेमी अब भी यहाँ मिलते है
व्यथा से मेरी बौराया वसंत
फिर बोला कुछ सकपकाया वसंत
रोज मिलते तो है प्रेम की सौगात लिए
फिर धुंधले हो जाते है उनकी आँखों के दिये
अब प्रेम में वो रंग नहीं मिलते
अब ख़्वाबों के कंवल नहीं खिलते
इसलिए पतझड़ की तरह आता हूँ
रस्म अदायगी   कर चला जाता हूँ
अब न रहूँगा इस ठावं बंधु
पूछे चाहे सारा गाँव बंधु 

Tuesday, December 23, 2014

हिन्दू जीवन दर्शन

हिन्दू जीवन दर्शन सिर्फ एक बकवास है छात्रों के एक समूह ने आवाज को थोडा तीखा करते हुए कहा दुसरे समूह ने उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया हिन्दू जीवन दर्शन के पक्ष में दि . मेरे शिक्षक जीवन में ऐसी कई बहस को मैंने सुना है और सुनकर आश्चर्य हुआ है कि हम हमारे जीवन दर्शन को ठीक से नहीं जानते जबकि दर्शन  किसी भी राष्ट के संस्कार और संस्कृति  को गड़ता है हमारे देश के साथ भी ऐसा ही है .

हम भारतीयों की चेतना शक्ति जहा से प्रभावित होती है वो हमारे वेद,उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और हमारा लोक जीवन है . हिन्दू जीवन दर्शन के वैदिक दर्शन में कहा गया है कि मनुष्य पून्यरूप से इच्छाओ का बना हुआ है जैसी उसकी इच्छाएं होगी वैसी उसकी विचारशीलता होगी जैसी उसकी विचारशीलता व समझ होगी वैसा ही उसका कर्म होगा और जैसे उसके कर्म होंगे वैसा उसका भाग्य . इच्छाओ से छुटकारा प्राप्त कर मनुष्य अमर हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है .

ये हिन्दू दर्शन का एकमात्र द्रष्टिकोण नहीं है गीता में कर्म का दर्शन है असल में ये नवीन हिन्दू दर्शन है जो कर्म का आधार बना कर पुनर्जन्म और इच्छाओ के बीच एक सयोजन करता है

हिन्दू दर्शन वर्तमान की अतीत के साथ निरन्तरता में विश्वास करता है ये एक पक्ष है और दुसरी तरफ वर्तमान को भविष्य में अभिव्यक्त करता है. हिन्दू दर्शन कुछ आधात्मिक विचारो में भी विश्वास रखता है जैसे 'पाप', 'पुण्य', धर्म आदि लेकिन भारतीय जीवन दर्शन सिर्फ संन्यास युक्त ही नहीं है उसमे अर्थ,धर्म,कर्म,मोक्ष भी हैं हमारे यहा का संन्यास व्यक्ति को समाज से न तो पलायनवादी बनाता है और न ही अकर्मण्य वो तो व्यक्ति के जीवन को बहुजन हिताय के सर्वोच्च शिखर तक उठा देता है .चाहे हमारा धर्म हो या दर्शन उसमे वसुधैव कुटुम्बकम रचे-बसे है तमाम तरह की साधना पद्धतिय ,अनुष्ठान और अवधारणाओ के होने पर भी हम सहिष्णु है और सर्वे भवतु सुखिन : की बात करते है .

निम्न पंक्तियों में भारतीय जीवन दर्शन की मूल आवधारणा छिपी है ........
कामिहि नारी पिआरी जिमी,लोभिहिं प्रिय जिमी दाम .
तिमी रघुनाथ निरंतर प्रिय लगांह मोहि राम