Thursday, August 31, 2017

सहजता ही जीवन है

जिंदगी मौत भी एक उम्र में मालूम हुआ।
मेरा होना था महज़ मेरे न होने के लिए।।

स्व. कुंवर रघुवीरसिंह ने सच ही लिखा इस दुनिया में प्रत्येक चीज का मूल्य चुकाना पढता है और जो जीवन उसने दिया है उसका भी मूल्य वो मृत्यु से ले लेता है तभी तो कहा गया है जगत मिथ्या ।

स्पिनोजा ने भी लिखा है कि जो ईश्वर को प्यार करता है वह निश्चित न समझे कि ईश्वर भी उसे उतना ही प्यार करेगा।
मानव ईश्वर से अलग है वो आशा रखता है, मानव से भी ईश्वर से भी ,नहीं करेगा तो जायगा कहां ? आशा, निराशा के इस उतार-चढ़ाव के बंधी रस्सी पर चलते हम वो नट है जिसके खेल का आनंद कोई और ऊपर बैठा लेता है।

आज हमारी प्रवृतियों और हम में लड़ाई छिड़ी है यही हमारे जीवन की उलझन है। हम जिसे तर्क कहते है अच्छे-बुरे की पहचान कहते है और जिसे इस पहचान से असलियत समझने का दावा करने वाली बुद्धि कहते है वो इतनी उलझी है कि वो कल्याण नहीं अकल्याण करती घूम रही है।दूषित हो बजबजाने वाली वस्तु सड़न तो फैलाएगी ही और हम उस सड़न में अपने तर्कों की रस्सी से फंसे भटक रहे है।

जायज और नैतिक के बीच इतना बड़ा अंतर आ गया है कि इनके बीच व्यक्तिगत स्वार्थ आत्मकेंद्रित हो समाज की टोपी के नीचे ''कीमत की आंक'' छिपाकर अव्यवस्था फैला कर खुश है।
फ़र्थ- समाज से आज तक एक ही प्रश्न कर रहा है तुम्हारे आदेश क्या है ? लेकिन समाज ,उसे युद्ध और बर्बरता से फुर्सत कहां । आस्टिन प्रयोग छोड़ कहीं से पुरानी न्यायसंगत परिभाषा ले बताते है समाज के नियमों के उल्लघंन के फलस्वरूप मिला दंड वही आदेश है।

आज विचारधारा बंदली है या हमने उनकी व्याख्या बदल दी जो भी हो हम आदेशों में उलझे प्राणी है आदेश स्पष्ट नहीं जीवन स्पष्ट नहीं ये समस्या यूं तो दिखाई वैसे नहीं पड़ती जैसी है लेकिन सबसे बुरी बात इसका हल अभी तो मानवजाति के पास नहीं।बस एक ही कोशिश होनी चाहिए हम मानव को मानव समझे।

आज की व्यापक अव्यवस्था कर्तव्य, कानून, धर्म में विभिन्नता आ जाने के कारण है, जिससे सभ्य समाज में असामंजस्य की स्थिति उत्पन्न की है लेकिन ये स्थिति सरल समाजों में नहीं है सो हे आधुनिक सभ्यता अपने सभ्यता के बोझ को थोड़ा-थोड़ा कम करो इसी में हम सबका कल्याण है।


Sunday, August 27, 2017

स्त्री स्वर्ग का फाटक

पीड़ा की नीव में दबी वासना सुखी हो उठी
जब जब स्त्री कराही ,चिल्लाई
और इस तरह बर्बर दंड ने जन्म लिया इस पृथ्वी पर
हर कराहने के बाद शिकारी बढते गए
पहला शिकारी कोई आदि अमानुष था

ढेंकुल ने मधुर वचनों के दंड में फरेब घोला
प्रेम की रस्सी से वासना का कुंड भरा
कुइयां अब रीती थी
ये बुद्धिजीवी थे

धर्म की कृपालु आत्माओं ने कहा
स्त्री तेरे शरीर में स्वर्ग का फाटक है
हम उसे स्वर्ग की कुंजी से बंद करेंगे
तब वो विभिन्न धर्मों के साथ
स्वर्ग की कुंजी से ताले जड़ते गये
ये धर्म के ठेकेदार थे

वेश्यालयों की दीवारें धर्म के पत्थरों से सजी थी
मंदिर अक्षत योनि से
फिर सारे बर्बर दंड
कराहने ,चिल्लाने से निकल कर
फैल गये धर्म ग्रंथों तक

कारागार खड़े हुए न्याय की नींव पर
सारी निर्दयता का अंत
स्त्री की जांघ पर जा बैठा
अब स्त्री की उतनी ही जरुरत थी
जितनी खाट की ,सवारी की, छत की।

स्त्री अब कोई चीज बड़ी है मस्त मस्त थी।

Sunday, August 20, 2017

स्वधीनता की तरफ लौटने का समय

स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है लेकिन स्वतंत्रत हुए पौधें को स्वाधीन रहने के लिए किस तरह के हवा, पानी की जरुरत पड़ेगी ये विचार अपने आप में स्वतंत्रता के सही अर्थ को परिभाषित करने के लिए एक कदम साबित हो सकता है।

ये विचार अगर हमने स्वतंत्रता के पूर्व ही कर लिया होता तो ज्यादा अच्छा था तब शायद हमें स्वतंत्रता दिवस की रस्म अदायगी की जरुरत ही नहीं होती क्योंकि तब हम सही मायने में स्वतंत्रता को जी रहे होते।

हम स्वतंत्र तो है पर क्या हम स्वाधीन है? ये प्रश्न एक बार सामान्य नागरिक को जो आधा-अधूरा स्वतंत्र है और जो स्वतंत्रता दिवस मनाने की रस्म अदायगी सबसे कम करता है  अचंभित कर सकता है क्योंकि उसके लिए आज भी स्वतंत्रता, स्वाधीनता में कोई अंतर नहीं है।
'स्वतंत्रता' एवं 'स्वाधीनता'  महज़ शब्दों का हेर-फेर नहीं है न एक मतलब है जहां स्वतंत्रता हो वहां स्वाधीनता हो ऐसा जरुरी भी नहीं, लेकिन लोगों ने इन दोनों शब्दों के घालमेल से जीवन और जीने के मायने जरूर बदल लिए है या यूं कहें कि उनके लिए बदल दिए गए है।

1947 के बाद भारत ने लोकतंत्र को अपना कर ये समझा कि अब हम जनता के लिए एक ऐसा देश बना रहे है जिसमे जनता सर्वोपरि होगी और ये गलत भी नहीं था क्योंकि लोकतंत्र का ढांचा जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा की परिभाषा पर टिका हुआ है ये वो परिभाषा है जो लोकतंत्र क्या है बताती है पर वो असल में भी यही है इसके बारे में संदेह है।

हमने सोचा था कि हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जिसमे धर्म, भाषा, जाति सब को लोकतंत्र में समाहित करके राष्ट्र निर्माण में सामुदायिक भावना का विकास करेंगे लेकिन शायद हम ये भूल गये थे की शताब्दियों तक सामंती संस्कारों में पले हम इतने ढल चुके है जो समाज में लोकतान्त्रिक हेतू अपेक्षित प्रयासों की और से मुंह मोड़ कर लोकतांत्रिक गतिविधियों को गड़बड़ी में बदलते रहेंगे या हम में से कुछ लोगों को ऐसी गड़बड़ी में बदलने के लिए बाध्य करते रहेंगे।

असल में इसकी शुरुआत स्वतंत्रता के समय से ही हुई जब स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका निभाने वाले कुछ नायकों ने स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता को आलोचनात्मक प्रसंग की तरह लिया और उसे समय-समय पर ख़ारिज किया उन्हें समान मताधिकार का विचार ही बड़ा विचित्र लगता था ऐसा लगना उनके लिए कोई विचित्र बात नहीं थी क्योंकि उनमें से कुछ समाज के ऐसे तबके से थे जो स्वतंत्रता पूर्व शासक था तो कोई शासक का  सलाहकार ऐसे लोगों को लोकतंत्र अवगुण तंत्र लगने लगे ये बड़ी बात नहीं थी। 

ऐसे में लोकतंत्र  के प्रति जो निष्ठा बनी वो इतनी गैरजिम्मेदार थी कि हम राज्य और नागरिक के आपसी संबंधों को पहचानने तथा उनकी मजबूती के लिए उपयुक्त तंत्र खड़ा करने में अक्षम रहे ।

नागरिक सरकार की जिस व्यवस्था के अंतर्गत रहता है वही उसके जीने का अधिकार बन जाती है ये ऐसी बात होती है जो किसी भी अन्य बात से ज्यादा प्रभावित करती है अर्थात धर्म से दर्शन तक ।
हमने लोकतंत्र तो अपनाया लेकिन अपनाते समय हमें अपने बोध का इस्तेमाल जो आधा-अधूरा किया उसने लोकतंत्र को सिर्फ सरकार चुनने के अधिकार का तंत्र बना दिया।

नागरिकों को इस तंत्र में कितनी स्वतंत्रता व कितनी स्वाधीनता मिलती है इसका मंत्र अगर हम समझ लेते तो शायद आज इसके मायने कुछ अलग होते जनता इतने नुकसान में नहीं रहती।

घर लौटने के कई रस्ते है जो एकांत में मुझे अपना हाल सुनाते है थिक नात (कवि एवं बौद्ध भिक्षु)ने सही कहा  है । हमें वास्तविक लोकतंत्र की तरफ लौटना ही होगा सिर्फ मतदान वाला लोकतंत्र नहीं बल्कि ऐसा लोकतंत्र जहां नागरिक ये महसूस करें कि उनके पास एक नागरिक के रूप में सामान अवसर है वो विज्ञान, कला, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से अवसर पा सकते है।

ये क्षेत्र कोई भ्रष्टाचार का दलदल नहीं जिसमे वो डूब जाएंगे उन्हें अब किसी भी क्षेत्र में अपनी योग्यता को सिद्ध करने के लिए किसी गॉडफादर की जरुरत नहीं ये बात एक आशा जागती है तो क्या आशा वापस आने की उम्मीद रखी जानी चाहिए ?

इन सब में एक बात बहुत महत्वपूर्ण है शक्ति का संतुलन हो न शक्ति संचित हो न क्षीण हो ।

सरकार और अन्य संस्थाएं न तो अपनी स्वतंत्रता का दायरा लांघकर नागरिकों की स्वाधीनता और अधिकारों को अवरुद्ध करें  और न ही नागरिक शासन–प्रशासन को अपने कृत्यों से आहत करें ये विचार  लोकतंत्र की स्वाभाविक दुर्बलता को दूर करके एक स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण करेगा तभी स्वतंत्रता, स्वाधीनता की अवधारणा सच साबित होगी।

Monday, July 24, 2017

खड़कती खिड़कियां

दुनिया की सारी चीख़ें मेरे जहान में है
जेहन में रहना कोई अच्छी बात नहीं
इससे मांगने का डर रहता है
इंसाफ दर्द देता है

मेरे अंदर एक चुप्पी है
जिसे सुनकर
खिड़कियां खड़कती है
मैं ने एक हिमाकत की
खिड़कियां खोलने की
उसूलों ने मुझे नेस्तनाबूत कर दिया

अब खंडहर भी नहीं
सिर्फ चौकटे बचे है
आश्चर्य जिनकी नीव में
आज भी "हैं" दबा है

वो बरगद के नीचे बैठ पीर
जो असल में क़यामत से बैठा कोई फक्कड़ है
कहता है मुझसे
मन को बांधो
बांध मन को देखा मैं ने ज्यों ही
उस पार तमाम हैं'जमा हो
फातिया पढ़ रहे है।



Wednesday, July 5, 2017

सूफ़ी पात

दरवेश से होते है पत्ते
यहां वहां बिचरते हुये
बेनियाज़
शाखों पर लगे ये करते हैं जुहद
अतीत के गुम ये यायावर
निकल आते है
कच्ची दीवारों पुराने खंडहरों से
और पहुंच जाते है सर्द रातों में
दहकते आवा में
इंतजार करते लोगो को
देते है दिलासा और करते है गर्म रिश्तों को
इनके दिल पर जो लकीरें है
दरअसल ये युगों की कविता है
बंद डायरी के बीच बैठे
ये सुनाते है किस्से
तेरे मेरे प्रेम के
ये दरवेश है तो कहां ठहरेंगे
चल देते है किसी और
पगडंडी पर
जहां प्रतीक्षा की पंक्तियां
गुनगुनाता प्रेम
इन्हें भर लेता है बाहों में
कहानी सुनने को
शुरू होती है
एक और नई कहानी....।

(बेनियाज़-- किसी भी चीज़ की चाह न होना।
जुहद-- तपस्या )