Thursday, July 11, 2019

प्रकृति संवर्धन और संरक्षण

'स्नो पियर्सर' के अमेरिकी डिस्ट्रीब्यूटर टॉम क्विन का कहना है, जलवायु परिवर्तन के बाद की स्थितियों को दिखाने वाली फिल्म नई पीढ़ी को प्रभावित करें तो शायद बहुतायत में लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो ।

 गॉडजिला बनाने वाले एडवड्रस का कहना है, 'गॉडजिला' जैसी फिल्म हमने जो कुछ किया है, उसका काल्पनिक दंड है। अगर हम ऐसा ही करते रहे तो वास्तविक दंड मिलेगा।

बात सही भी है जिस तेजी से पर्यावरण में बदलाव देखने को मिल रहा है, तब वो दिन दूर नही कि सारे मौसम  अपना रास्ता ले लेंगें, सिर्फ एक को छोड़ कर, चाहे वो हिम युग हो, जल युग हो या तपता सूरज।

स्टीफ़न हॉकिंग कहते है- 'मानव समुदाय इतिहास के सबसे ख़तरनाक समय का सामना कर रहा है ।

हमारे पास पृथ्वी की बरबादी की तकनीकें तो बड़ी संख्या में आ गई हैं, लेकिन इनसे बचने की तकनीकों का विकास नहीं हो सका है ।

यदि ज़ल्दी ही पर्यावरण और तकनीकी चुनौतियों से निपटने का तरीक़ा ईज़ाद नहीं किया गया तो परिस्थितियाँ बदतर हो जाएँगी और पृथ्वी के बरबादी के निकट होगी ।
इसलिए अब विश्व को उच्चतर जीवन शैली को त्यागना होगा, क्योंकि आजीविका के संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं ।'' 
अपनी भौतिकवादी प्रवत्तियों से किनारा कीजिए ।
पर्यावरण को लेकर जागरूक हो और दूसरे को भी करें।

पर्यावरण पर जागरूकता मिशन पर लगी पत्रिका प्रकृति दर्शन है । ये त्रैमासिक पत्रिका है ,जो मुरादाबाद से निकलती है ।
इसके संपादक संदीप कुमार शर्मा जी है, जिन्होंने इस पत्रिका के द्वारा प्रकृति दर्शन अभियान चला रखा है ।
जिसको इन्होंने नाम दिया है "आओ सुधारें अपनी प्रकृति" जिसमे इन्होंने प्रमुख बिंदु पर अपनी पत्रिका 'प्रकृति दर्शन के माध्यम से आवाज़ उठाई है।
जिसमे इन्होंने कहा है-

1. नेशनल वाटर एक्ट बनाया जाए
2.वाटर-हार्वेस्टिंग एक्ट के गठन किया जाए
3. राष्ट्रीय वैन सरंक्षक, अंकेक्षण अधिनियम व आयोग का गठन हो।
4. पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य की जाए।

ये पर्यावरण संतुलन के लिए अहम सुधार है जिसमे हमारी, आपकी भागीदारी जरूरी है अगर आप भी पर्यावरण बेहतर बनाना चाहते है तो आदरणीय प्रधानमंत्री जी को इस सन्दरत
प्रकृति यशस्वी हो ये कामना के साथ उसके यशस्वी होने के उपाय भी करें।








Wednesday, May 8, 2019

मानवता की रक्त शिराएं हमारी नदियां


कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ।।
तो क्या शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १३ वें श्लोक में स्तुतिकार रावण अविरल प्रेमयुक्त तरल-सरल भावों के साथ अपने मन की साध को प्रकट करता है ।
नदियों की ऐसी क्या महिमा है कि सोने की लंका वाला रावण भाव-भीने मन से, खोया हुआ  नदी के तट के निकट किसी कुञ्ज-कुटीर में वास करता करना चाहता है अपनी दुर्बुद्धि से मुक्त होना चाहता है।
प्रस्तुत श्लोक  से हो यही लगता है कि हमारी प्राचीन नदियों के तट पर रहने से मन में छिपी आसुरी वृत्तिया शिथिल अथवा विनष्ट करती है एवं शुभ विचारों का मन में उदय करती है और ऐसी स्थिति में यह सोच भी अवश्यम्भावी हो जाती है कि क्या नदियां जादुई होती है जिनके जादू से दुष्ट वृत्तियां उभर कर मन-बुद्धि को दूषित व उद्वेलित नहीं होने देती या जल का संबंध मानव से सिर्फ शरीर का नहीं मन का भी होता है।   रावण द्वारा ‘निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे’ कहना ध्यातव्य है कि भारतीय संस्कृति में जल व जलाशयों की महत्ता पुरातन काल से स्वीकार की जाती रही है तभी तो रावण गंगा के कछार में , कूल के कुञ्ज-कानन में बसने की बात करता है।
नदियां कई कालखण्डों के इतिहास को अपने हृदय में समेटे है । किस मर्यादा पुरुषोत्तम ने अपनी पत्नी का परित्याग किया  किन बच्चों ने माता के परित्याग का प्रतिकार लिया था।
इतिहास बताता है कि किस नदी तट पर बसी बस्तियों से मिले अवशेष तथा इन अवशेषों की कहानी केवल किसी सभ्यता से नहीं जुड़ी बल्कि हिन्द की उन्नति से जुड़ी है
किस प्रकार उसके तट पर अनेक ऋषियों ने अपने आश्रम स्थापित किये, किस प्रकार इस क्षेत्र में कथाओं का सूत्रपात हुआ किस भांति उसके ही क्षेत्र में पौरोहित्य का विश्वविद्यालय स्थापित हुआ?
किसी रणछोड़ के अग्रज ने अपने अपराध का प्रायश्चित किया।
किस तरह से तथागत ने इसके तट पर विश्राम किया और धम्म पद के उपदेश दिये?
एक महान सम्राट की लाल चीवर धारी शांति सेना अपने नृपति के आदेशों-संदेशों के साथ इसके कूलों के किनारों से आगे बढ़ते हुए आत्ममुग्ध भाव से गुजरी थी।
कैसे एक विदेशी पर्यटक ह्वेनसांग धम्म सभा में सम्मलित होने के लिए थेरी गाता हुआ जिसके तट से गुजर था वो भी उसे याद है। 
किस प्रकार धम्म सभा में उपद्रव करने के बाद कुछ लोग उसको  पार करके उत्तरांचल की ओर प्रस्थान किए थे तब राजा की सेनाएं नदी के तट पर आकर उनकी खोज में काफी समय भटकती रह गयी थी।
किसी मुगल अकबर ने यहां पर वाजिपेय यज्ञ कराने के लिए एक लाख रुपये यहां के ब्राह्मणों को दिये और गोमती का तट यजु:वेद की ऋचाओं सेगूंज उठा। इसके बाद अपनी विभेद कारी नीति के तहत विप्रों की मर्यादा आंकी गयी।
तो क्या नदियां हमारी मानवीय चेतना को प्रभावित करती है ? अगर है तो हमें इन्हें मानवीय दर्जा दे देना चाहिए।
नदियों के नामकरण तो यही कहते है
एददः सम्प्रयती रहावनदता हते।
तस्मादा नद्यो3नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः।।
(सन्दर्भ ग्रंथ: अथर्ववेद, तृतीय काण्ड, सूक्त-13, मंत्र संख्या - 01)
“हे सरिताओं, आप भली प्रकार से सदैव गतिशील रहने वाली हो। मेघों से ताडि़त होने, बरसने के बाद, आप जो कल-कल ध्वनि नाद कर रही हैं; इसीलिये आपका नाम ’नदी’ पड़ा। यह नाम आपके अनुरूप ही है।’’
नदियों के नामकरण के भिन्न आधार दिए गए हैं। अधिकांश नदियों के नामकरण उनके गुण, वंश अथवा उद्गम स्थल के आधार पर किए गए हैं।
भारत के विविध भागों में प्रवाहित इन नदियों को देवी-देवताओं से समीकरण स्थापित किया जाता है यथा: गंगा – भगवान शिव, गोदावरी – श्री राम, यमुना – श्री कृष्ण, सिंधु – श्री हनुमान, सरस्वती – भगवान गणेश, कावेरी – भगवान दत्तात्रेय, नर्मदा – देवी दुर्गा।
ऐसी स्थिति में हमें इनके सन्दर्भ में पुनः विचार करना होगा शायद ये विचार एक पूरी सभ्यता को पुनःमानव बनाने की कवायद होगी।
एक नदी को हम क्या दे सकते है ?आपने कभी सोचा है या एक नदी आज के दौर में हमसे क्या चाहती है ?
प्रश्न बड़ा गंभीर है जिसके उत्तर भी हमें गंभीरता से ही देने होंगे और अगर हम ऐसा नहीं करते तो मानव सभ्यताओं को विलुप्त होते देर नहीं लगेगी।
नदी सिर्फ जीवन चाहती है वो चाहती है कि मानव सभ्यता के साथ- साथ उसके अंदर पलने वाले प्राणियों को बेहतर जीवन मिले लेकिन ऐसा है नहीं देश की समस्त नदियां प्रदुषण का शिकार है ।
एक सर्वेक्षण के अनुसार ज्यादातर नदियों के जल के एक लीटर में ऑक्सीजन की मात्रा इस समय 0.1 घन सेमी रह गई है जबकि 1940 में औसतन यह 2.5 घन सेमी थी। 
कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, भागलपुर, कोलकाता-जैसे कई बड़े-बड़े नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं। इन नगरों में अनेक कल-कारखाने हैं। शहरों का मल-जल तथा उद्योगों के अपशिष्ट बिना शोधन के गंगा मे प्रवाहित किये जाते हैं। इसका उपयोग जल-मार्ग की तरह भी किया जा रहा है। गंगा एवं इसकी सहायक नदियों पर बांध बनाकर इसके जल को नहरों में ले जाया जा रहा है। गंगा और सहायक नदियों पर बनाये गये तटबंध गंगा के पारिस्थितिकी तन्त्र पर काफी बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। फलत: इसकी जैव-विविधता में तेजी से ह्रास हुआ है। 
जैव विविधता में ह्रास के दो मुख्य कारण हैं-
1. जीवों का अधिक शिकार या दोहन एवं
2. जीवों के वासस्थान का विनाश।
अधिक शिकार के कारण गंगा में पायी जाने वाली डाल्फिन, घड़ियाल, उदविलाव और मुलायम आवरण वाले कछुए कई क्षेत्रों से विलुप्त हो गये हैं। अन्य क्षेत्रों में ये विलुप्ति के कगार पर हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण रोहू, कतला, नैनी-जैसी प्रजातियों के लिए गंगा का दियारा बरसात के मौसम में प्रजनन क्षेत्र होता है। दियारा में पहले प्राकृतिक रूप से उगने वाली वनस्पतियाँ होती थीं। अब सम्पूर्ण दियारा क्षेत्र में खेती हो रही है। खेती में कीटनाशकों और रासायनिक खादों का इस्तेमाल हो रहा है। इन जहरीले पदार्थों के कारण मछलियों के अंडे से बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं। इस तरह वासस्थान के जहरीला होते जाने और अंधाधुन्ध शिकार के कारण मछलियों में तेजी से ह्रास हुआ है।
वैश्वीकरण के दौर में मछलियों की कई विदेशी प्रजातियाँ भारत में आ रहीं हैं। इनके प्रभाव से गंगा भी अछूती नहीं है। दो दशक पहले तक (1993-95 ई.) गंगा में पटना के आस-पास एक भी विदेशी मछली नहीं पायी गयी थी। लेकिन 2007-09 में विदेशी मछलियों की लगभग दस प्रजातियाँ यहाँ पायी गयीं। ये विदेशी मछलियाँ स्थानीय मछलियों के लिए खतरनाक हैं। 
इस ह्रास के भी कई कारण हैं। इनमें सबसे प्रमुख है प्रदूषण एवं जल प्रवाह की कमी। शहरों से बिना शोधन के जल-मल को सीधे गंगा में गिराया जा रहा है। प्रतिदिन लगभग 13,000 मिलियन लीटर जल-मल गंगा के किनारे वाले शहरों में जनित होते हैं। मगर, मुश्किल से 4,000 मिलियन लीटर जल-मल के शोधन की व्यवस्था हो पायी है।
इसी तरह कल-कारखानों से प्रतिदिन 260 मिलियन लीटर बहि:स्राव निकलता है। इसका अधिकांश भाग बिना शोधन के गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। घरेलू एवं औद्योगिक बहि:स्राव के कारण गंगा काफी प्रदूषित हो गयी है।
कृषि एवं स्वास्थ्य क्षेत्र को उपयोग में लाये जाने वाले डी.डी.टी., टी.सी.एच, बी.एच.सी. और इण्डोसल्फान आदि कीटनाशक बरसात के महीने में बहकर गंगा में आ जाते हैं। गंगा का जल एवं पारिस्थितिकी तन्त्र इन जहरीले रसायनों से प्रदूषित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 3,000 टन कीटनाशक प्रति वर्ष गंगा में प्रवाहित हो रहे हैं। कीटनाशकों के अलावा पालीक्लोरिनटेड, बाईफनाईल, परक्लोरिनेटेड- जैसे रसायन भी गंगा में पाए गए हैं।
सोचिए अगर ये हालत भारत देश की सबसे पवित्र नदी मानी जाने वाली गंगा की है तो अन्य नदियों का हाल कैसा होगा ? क्या करें जिनसे हमारी नदियां प्रदूषण से बचे ? क्या हमें उन्हें जीवित दर्जा दे देना चाहिए?
एक नदी की इंसान बनने की कहानी --------------------------------------------
देखा जाए तो ये बुरा भी नहीं अगर ये नदियां हमें जीवन देती है जीवनदायनी है तो इन्हें ये दर्जा मिलने ही चाहिए।
नदी को जीवित का दर्जा दिए जाने का मतलब है, उसे वे सभी अधिकार दे देना, जो किसी जीवित प्राणी के होते हैं। नदी का शोषण करने, नदी को बीमार करने और नदी को मारने की कोशिश करने जैसे मामलों में अब क्रिमिनल एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। नदी पर किए गए अत्याचारों के मामले मानवाधिकार आयोग में सुने जा सकेंगे।
भारतीय संस्कृति के आलोक में देखें, तो नदी इतने गुणों का बहाव दिखती है कि लगता है कि सभी सद्गुण तो नदिया के भीतर-बाहर छिपे बैठे हैं।
नदिया-गुणिया एकधन, जो खोजे, सब पाय।
आइये तो खोजें आखिर नदियों में किस तरह और कितने मानवीय गुण है-
प्रहवामाय ,बलशाली,क्रियाशीलता,सक्रिय तत्व की उपस्थिति,क्रिया शक्ति,रसवती-स्पर्शवती आदि
ऋगवेद के सातवें मण्डल में नदी के निरन्तर प्रवाह की स्तुति की गई है। स्पष्ट है कि प्रवाह की निरन्तरता, किसी भी नदी का प्रथम एवम् आवश्यक गुण है। प्रवाह की निरन्तरता बहुआयामी होती है यही नदी का गुण है। किसी एक भी आयाम में हम निरन्तरता को बाधित करने की कोशिश करेंगे; नदी अपना प्रथम और आवश्यक गुण खो देगी। इसके दुष्प्रभाव कितने व्यापक हो सकते हैं; इसका आकलन आज हम कोसी, गंगा, नर्मदा जैसी कई प्रमुख नदियों के आयामों में मनुष्य द्वारा पैदा की गई बाधाओं के परिणामस्वरूप नदी जल की गुणवत्ता तथा जल, रेत, गाद, वेग तथा नदी के बदले रुख से समझ सकते हैं।
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्व श्रवा भवत वजिनः।
देवीरापो यो व ऽऊमिः प्रतूतिः ककुन्मान् वाजसास्तेनायं वाज सेत्।।
यजुर्वेद (नवमध्याय, मंत्र संख्या-छह) में लिखे इस श्लोक का भावार्थ है कि जल के अन्तःस्थल में अमृत तथा पुष्टिकारक औषधियाँ मौजूद हैं। अश्व यानी गतिशील पशु अथवा प्रकृति के पोषक प्रवाह इस अमृत और औषधिकारक जल का पान कर बलवान् हों। हे जलसमूह, आपकी ऊंची और वेगवान तरंगे हमारे लिये अन्न प्रदायक बनें।
वैज्ञानिक दृष्टि भी यही कहती है कि नदी तभी बलवान होती है, जब उसका जल मृत न हो यानी प्रवाह में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया सतत् होती रहे। गुणवान होने के लिये औषधियों से संसर्ग करने आने वाले जल का नदी में आते रहना जरूरी है।
नदी, सिर्फ जल नहीं है; लेकिन जलमय है और यही गुण नदी में क्रियाशीलता लाता है अतः क्रियाशीलता को नदी का गुण कहना गलत नहीं।
अथर्ववेद -(काण्ड तृतीय, सूक्त 13, मंत्र संख्या - एक ) में जलधाराओं में सृष्टि के मूल सक्रिय तत्व का आहृान किया गया है।
सृष्टि के शाब्दिक अर्थ पर जायें तो ‘सृष्टि’ शब्द का मतलब ही है, रचना करना। शाब्दिक अर्थ को सामने रखें, तो रचनात्मक सक्रियता को नदी का एक अपेक्षित गुण मानना चाहिए। सृष्टि कर्म देखें तो सृष्टि में रचना के बाद विनाश और विनाश के बाद रचना सतत् चलने वाले कर्म हैं। इस दृष्टि से नदी में रचना और विनाश तत्व की सक्रिय मौजूदगी की अपेक्षा करनी चाहिए। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि नदी में जहाँ एक ओर शीतल तत्व मौजूद होते हैं, वहीं ऊर्जा उत्पन्न करने लायक ताप और वेग भी मौजूद होता है। नदीजल जीवन भी देता है और आवश्यक होने पर विनाश करने की भी शक्ति रखता है।
भारत में आज कितनी ही नदियाँ ऐसी हैं कि जिनमें इतना जल न के बराबर  है । कितनी ऐसी है जिनके सिर्फ निशान मौजूद हैं। उनमें न जल है और न जीवन। पृथ्वी पर उनकी रचना आंशिक ही है ।
कई नदियां तो नाले में परिवर्तित है तो कुछ अपने बीत चुके वैभव के साथ बीती बात हो चुकी है। जो है उनके पानी में क्रियाशीलता के आभाव में तेज नहीं।
अथर्ववेद -(काण्ड 03, सूक्त 13, मंत्र संख्या -दो) में जलधाराओं से कामना की गई है कि वे क्रियाशक्ति उत्पन्न कर उन्हे हीनता से मुक्त करेंगी तथा प्रगतिपथ पर शीघ्र ले जायेंगी।
इसका मतलब है कि नदी इतनी सक्षम होनी चाहिए कि वह हमारे भीतर ऐसा कुछ करने की शक्ति पैदा कर सकें, जिससे हमारी हीनता यानी कमजोरी मिटे और हम प्रगति पथ पर अग्रसर हों। इस नदी गुण को हम कृषि, उर्वरता वृद्धि, भूजल पुनर्भरण, भूजल शोधन तथा मैदान व डेल्टा बनाने वाले में नदी के योगदान से जोड़कर देखें।
नदी तो प्रेरणा है
यह नदी गुणाों का आध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष है। नदी कर्म में निरन्तरता, शुद्धता, उदारता व परमार्थ तथा वाणी में शीतलता की प्रेरणा देती है। नदियों से सीखने और प्रेरित करने के लिये कवियों ने संस्कृत से लेकर अनेक भाषा व बोलियों में रचनायें रची हैं। कभी उन्हे देखना चाहिए।
रूपा रस स्पर्शवत्य आपो द्रवः स्निग्धा:।
मनुस्मृति में किए उक्त उल्लेख का तात्पर्य है कि रूप, स, स्पर्शवान, द्रवीभूत तथा कोमल ‘जल’ कहलाता है; परन्तु इसमें जल का रस अग्नि और वायु के योग से होता है। स्पष्ट है कि ये सभी गुण, नदी के गुण हैं। नदी कोमलता का आभास देती है। नदी तरल होती है। नदी स्पर्श करने योग्य होती है। नदी में रस यानी जल होता है। नदी का अपना एक रूप होता है।
विचारणीय तथ्य यह है कि जल के ये गुण अग्नि और वायु के योग के कारण होते हैं। यह तथ्य हमें सावधान करता है कि जल हो या नदी, वायु और ताप से इनका सम्पर्क टूटने न पाये। पानी से बिजली बनाती परियोजनाएं नदी का वायु और ताप से संपर्क तोड़ देती है।
शीतलत एवं शांति दायक - एक नदी ही हो सकती है
हिमवतः प्रस्नवन्ति सिन्धौ समह संगम।
आपो ह महंन तद् देवीर्ददन् हृदद्योत भेषज्ञम्।।
अथर्ववेद (सूक्त 24, मंत्र संख्या-एक) का भावार्थ यह है
कि हिमाच्छित पर्वतों की जलधारायें बहती हुई समुद्र में मिलती हैं। ऐसी धारायें हृदय के दाह को शान्ति देने वाली होती है।
आज अशांति में जीते हम शांति का मर्म समझना ही नहीं चाहते ऐसे में एक नदी ही हमें इस गुण से परिचित करा सकती है।
ये गौर करने वाली बात है ये गुण हिम धाराओं के है जो पर्वतीय नदियों में मिलते है।
भारत के सांस्कृतिक ग्रंथों में जहाँ जल में ईश का वास माना गया है, वहीं नदियों को देवी तथा माँ का सम्बोधन दिया गया है। पौराणिक कथाओं में कहीं किसी नदी का उल्लेख किसी की पुत्री, तो किसी का किसी की बेटी, बहन अथवा अर्धांगिनी के रूप में आया है। नर्मदाष्टक में नर्मदा को हमारी और हमारी प्राचीन संस्कृति की माँ बताया गया है। यह प्रमाण है कि भारत का सांस्कृतिक इतिहास नदियों को जड़ न मानकर, जीवित मानता है। सांस लेना, गतिशील होना, वृद्धि होना, अपने जैसी सन्तान पैदा करना - किसी के जीवित होने के इन जैविक लक्षणों को यदि हम आधार मानें, तो हम पायेंगे कि नदी में ये चारों लक्षण मौजूद हैं।
नदियां मानवता की रक्त शिराएं हैं
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गौर करें कि तल, तलछट, रेत, सूक्ष्म एवम् अन्य जलीय जीव, वनस्पति, वेग, प्रकाश, वायु तथा जल में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया मिलकर एक नदी और इसके गुणों की रचना करते हैं। इसी आधार पर नदी वैज्ञानिकों ने प्रत्येक नदी को महज जल न मानकर, एक सम्पूर्ण जीवंत प्रणाली माना है। इसी आधार पर न्यूजीलैण्ड और इक्वाडोर में नदियों को जीवित का दर्जा मिला।
यह सिर्फ एक नदी को बचाने की कवायद नहीं है बल्कि मानव और प्रकृति के बीच के छीजते रिश्ते को मजबूत करने की कोशिश है. सहअस्तित्व का ये भाव सिर्फ भाषणों या सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उसे जमीन पर उतारकर दुनिया भर की नदियों का भविष्य संवारने का पैगाम दिया गया है. नदी को इंसानी अधिकार देना चौंकाता जरूर है लेकिन बहुत से जानकार मानते हैं कि ऐसे अभूतपूर्व तरीकों से ही तेजी से प्रदूषित हो रही दुनियाभर की नदियों की रक्षा की जा सकती है. उनके मुताबिक इस बात को भी समझने की जरूरत है कि नदियों को बचाने के परंपरागत तरीके उतने प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे।
नदियां मानवता की रक्त शिराएं हैं। नदियों के मरने का मतलब इंसानी सभ्यता का भी खत्म होना है.
नदी को जीवित का दर्जा दिए जाने का मतलब है, उसे वे सभी अधिकार दे देना, जो किसी जीवित प्राणी के होते हैं लेकिन क्या जीवित आम आदमी की तरह नदी भी न्याय मंगाते- मंगाते निराश हो ख़त्म तो नहीं हो जाएगी?
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सन्दर्भ ग्रंथ--
1.शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १३ वें श्लोक
2.अथर्ववेद, तृतीय काण्ड, सूक्त- 13, मंत्र संख्या- 01
3.यजुर्वेद, नवमध्याय, मंत्र संख्या-6
4.यजुर्वेद अध्याय 23 मंत्र 22
5.मनुस्मृति
6.अथर्ववेद सूक्त-24, मंत्र संख्या- 1
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Tuesday, May 7, 2019

वैशाख की साख





वैशाख भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है। इस माह को एक पवित्र माह के रूप में माना जाता है। जिनका संबंध देव अवतारों और धार्मिक परंपराओं से है। ऐसा माना जाता है कि इस माह के शुक्ल पक्ष को अक्षय तृतीया के दिन विष्णु अवतारों नर-नारायण, परशुराम, नृसिंहऔर ह्ययग्रीव के अवतार हुआ और शुक्ल पक्ष की नवमी को देवी सीता धरती से प्रकट हुई थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग की शुरुआत भी वैशाख माह से हुई। इस माह की पवित्रता और दिव्यता के कारण ही कालान्तर में वैशाख माह की तिथियों का सम्बंध लोक परंपराओं में अनेक देव मंदिरों के पट खोलने और महोत्सवों के मनाने के साथ जोड़ दिया। यही कारण है कि हिन्दू धर्म के चार धाम में से एक बद्रीनाथधाम के कपाट वैशाख माह की अक्षय तृतीया को खुलते हैं।इसी वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एक और हिन्दू तीर्थ धाम पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी निकलती है। वैशाख कृष्ण पक्ष की अमावस्या को देववृक्ष वट की पूजा की जाती है। यह भी माना जाता है कि भगवान बुद्ध की वैशाख पूजा 'दत्थ गामणी' (लगभग 100-77 ई. पू.) नामक व्यक्ति ने लंका में प्रारम्भ करायी थी।

न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम्।
न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।
(स्कंदपुराण, वै. वै. मा. 2/1)
अर्थात वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। 
धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वयं ब्रह्माजी ने वैशाख को सब मासों से उत्तम मास बताया है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला इसके समान दूसरा कोई मास नहीं है। जो वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु विशेष स्नेह करते हैं। सभी दानों से जो पुण्य होता है और सब तीर्थों में जो फल मिलता है। उसी को मनुष्य वैशाख मास में केवल जलदान करके प्राप्त कर लेता है। 
जो जलदान नहीं कर सकता यदि वह दूसरों को जलदान का महत्व समझाए तो भी उसे श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस मास में प्याऊ लगता है वह विष्णुलोक में स्थान पाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि जिसने वैशाख मास में प्याऊ लगाकर थके-मांदे मनुष्यों को संतुष्ट किया है, उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं को संतुष्ट कर लिया।
मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ।
प्रात:स्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।।
हे मधुसूदन। मैं मेष राशि में सूर्य के स्थित होने पर वैशाख मास में प्रात:स्नान करुंगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए। 

शाखा नक्षत्र से सम्बन्ध होने के कारण इसको वैशाख कहा जाता है। आम तौर पर वैशाख का महीना अप्रैल मई में शुरू होता है। विशाखा नक्षत्र से सम्बन्ध होने के कारण इसको वैशाख कहा जाता है। इस महीने में धन प्राप्ति और पुण्य प्राप्ति के तमाम अवसर आते हैं।मुख्य रूप से इस महीने में भगवान विष्णु , परशुराम और देवी की उपासना की जाती है। वर्ष में केवल एक बार श्री बांके बिहारी जी के चरण दर्शन भी इसी महीने में होते हैं। इस महीने में गंगा या सरोवर स्नान का विशेष महत्व है।आम तौर पर इसी समय से लोक जीवन में मंगल कार्य शुरू होते हैं।

हिन्दु धर्म के अनेक ग्रंथों और पुराणों में जिनमें स्कंदपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण आदि प्रमुख है, वैशाख माह के महत्व के बारे में विस्तार से लिखा गया है। स्कंद पुराण में देवर्षि नारद ने वैशाख माह का महत्व बताया कि विद्याओं में वेद श्रेष्ठ है, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगा, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि श्रेष्ठ है, उसी तरह महीनों में वैशाख मास सर्वोत्तम है। देवर्षि नारद ने इस माह की श्रेष्ठता के साथ ही वैशाख माह के धर्म और आचरण का महत्व भी बताया। उनके अनुसार इस माह में ग्रीष्म ऋतु होने से जलदान ही श्रेष्ठ है। इस माह में जलदान करने वाला, प्याऊ लगवाने वाला, कुएं और तालाब बनवाने वाला असीम पुण्य पाता है। देवर्षि नारद द्वारा बताए गए वैशाख माह के महत्व और आचरण का संदेश यही है कि मानव ऐसे आचरण करें जिससे एक मानव दूसरे मानव से भावनाओं और संवेदनाओं से जुड़ा रहे। चूंकि यह माह गर्मी के मौसम का होता है। जल की कमी होती है। मानव के साथ ही अमूक प्राणी और पक्षियों के जीवन के लिए भी जल बहुत आवश्यक होता है। अत: जल का मूल्य समझकर जल का अपव्यय न करते हुए जल का दान करना, पक्षियों के लिए जलपात्र रखना चींटियों के लिए आटे-गुड़ से बनी गोलियां और मछलियों के लिए दाना देना स्वयं के मन को सुकून देने के साथ ही अहं भाव तिरोहित कर दूसरों को भी सुख और तृप्ति देता है। इससे धर्म के साथ मानवीय भावनाओं का भी पोषण होता है। अमूक जीवों को जल और भोजन देना मानव को प्रकृति से भी जोड़ता है।
वैशाख का महीना हमें सरलता और परोपकार की भावना से जीना सीखाता है। पुराणों में वैशाख को पवित्र मास बताया गया है। हमारे मनीषियों और ऋषि-मुनियों के द्वारा वैशाख माह में होने वाले प्रकृति के बदलावों को समझकर अपने अनुभव और ज्ञान से इस माह के व्रत, पर्व, त्यौहार की रचना की और इनके साथ ही पालन हेतु नियम-संयम को लोक व्यवहार से जोड़ा गया। जिनमें धार्मिक कर्म, स्नान और दान का महत्व भी बताया गया है। यह सारे विधान मानव को सादगी सेे रहने और हर प्राणी मात्र के प्रति संवेदना रखने की प्रेरणा देते हैं। 

वैशाख मास की परंपराएं मानवीय संवदेनाओं से भरी हुई हैं। जिनसे लोगों में मानवता की भावना पोषित होती रही है। हर धर्म में भूखे को भोजन देना और प्यासे जीव को पानी पिलाकर तृप्त करना धर्म पालन में श्रेष्ठ कर्तव्य माना जाता है। सनातन धर्म में वैशाख माह में भी ग्रीष्म ऋतु की गर्माहट में प्राणीमात्र को शीतलता देने के लिए लोक व्यवहार में इन दो बातों के साथ ही अन्य परंपराएं भी प्रचलित है। जिनमें जल का दान, प्यासे को पानी पिलाने के लिए प्याऊ लगाना, पंखा दान जो ठंडी हवा देता है, कड़ी धूप से बचने के लिए छायादार स्थान बनाना, धूप से तपती जमीन से पैरों को बचाने के लिए पदयात्रियों को जूते-चप्पल या पादुका देना तथा भोजन कराना आदि प्रमुख हैं। 

इस प्रकार वैशाख माह धार्मिक दृष्टि से जहां पुण्य प्राप्ति का काल है, वहीं व्यावहारिक दृष्टि से यह माह शरीर के ताप के साथ ही मन के संताप का शमन करता है।




Tuesday, April 30, 2019

वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास❤

आगाही कार्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास
मेरे  ही  सीने  में  उतरे  हैं  ये  खंज़र सारे

बशीर फ़ारूक़ी जी ने शायद हम जैसो का दिल पढ़ कर ही ये शेर कहा होगा....

दो महीने की घर से बाहर व्यस्ता के चलते अव्यवस्थित घर से रूबरू होते ही सबसे पहले गर्म- ठंडी के कपड़े रखते उठते बेटी अपनी घाघरा- चोली दिखा कर बोली देखो मां मेरी ये ड्रेस कितनी छोटी हो गई है, इस बार में नई लुंगी और हैं इस बार मे ये भी लुंगी कहा कर उसने एक फोटो मेरी तरफ बड़ाई..

डिजाइनर पायल की फ़ोटो जिसे देख कर में अतीत मैं खो गई...

पहली बार इसे जब देखा तो उम्र रही होगी मात्र 22-23 साल,एक दिन अपनी सहेली के साथ सुनार की दुकान पर गई उसने वहां सुंदर से इयररिंग लिया लेकिन मेरी नज़र तो वहां रखी डिजाइनर पायल पर अटक गई, दाम पूछे तो अपने पर्स में सौ रु कम...

सहेली ने लाख समझाया अरे 100 रु की ही बात है मुझसे ले ले लेकिन न अपने सिद्धान्त आड़े आ गये। घर आकर सहेली ने मां को बताया तो माँ ने कहा ये ऐसी ही है ,जानती हूं ले ये रु और जाकर इसके लिए वही वाली पायल ले आ, मैं ने सुना तो, माँ को मना कर दिया मां कल आप ही ले आना बोल कर अपने कमरे में चली गयी ,बात आई- गई हो गयी ।

कुछ सालों बाद शादी तय हो गई घर वालो ने जो जेवर दिया अपन ने बिना पसंद किए भाई पर पसंद की जिम्मेदारी डाल कर इतिश्री कर ली।
ससुराल आकर देखा मायके से सुंदर सी पायल मिली पर डिजाइनर नही..
मन की ख़्वाहिश मन मे ही दबी रही ।
पहली होली पर घर गई तो मां ने पिता से कहा गुड़िया के पैर सुंदर से छोटे से है, देखिए इस तरह की पायजेब लाकर दीजिए, मेरा बहुत मन है उसके पैरों पर सुंदर लगेगी और पिताजी पायजेब लेने चले गये।
आलता लगे पैरो पर सात लड़ी की पायजेब जिसने मेरे पैरों को ढक लिया था और मेरे पैरों की शोभा भी बड़ा रही थी लेकिन मन मे फिर वही डेलिकेट सी डिजाइनर पायल दस्तक दे रही थी...।
वैसे भी मुझे डेलिकेट से ही जेवर पसंद है ।
नई- नई शादी के बाद एक दिन हम गृहस्थी सजाने के लिए शॉपिंग कर रहे थे, कि एकाएक मेरी नज़र पास ही दुकान पर लटकी डिजाइनर पायल पर पड़ी ...
मैं ने जल्दी से दाम पूछे दुकानदार ने बताए पर्स में देखा फिर से सौ रु कम थे, मन मसोस कर मैं चलने को हुई कि पतिदेव आ गये बोले कुछ लेना है अपनी संकोची प्रवति से शायद पर्दा हटाती तभी पतिदेव के शब्द सुनाई पड़े सब तो है और क्या करोगी लेकर और मैं चुपचाप उनके पीछे चल पड़ी ...।

आज जब बेटी ने डिजाइनर पायल की फ़ोटो दिखाई तो एक बार फिर से अपने पैरों पर नज़र गई समय की धूल ने चाहें  वैसा रूप रंग न रहने दिया हो पैर भी शायद उतने सुंदर न रह पाये हो लेकिन ख़्वाहिश आज भी वैसी ही है नई सी ...
लेकिन संकोच का पर्दा आज भी नही उठा सच कहा था पिता ने विदा के समय मेरी बेटी ने हम से कभी कुछ मंगा नही ये इसका अहं नही संकोच है वो कभी कुछ मांगेगी नही ये बात ध्यान रखना।
पिछले 14 सालों में कितनी बार संकोच को परे हटाने की भरपूर कोशिश की लेकिन अपने लिए कुछ मांगना ....।

 हजारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले...