Wednesday, December 4, 2019

दास्तान-ए- इश्क

उस दिन गहन निस्पंद  आधी रात में अचानक टहनियों की फुनगी पर पढ़ी बदली से निकलते चांद की रोशनी उतार लाई थी, अतीत का स्वप्न

अहा! कैसे तो स्वप्न थे बारम्बार बांधते थे मन के सुने द्वार पर पंखों के तोरण

आज फिर मादल की थाप कानो में गूंज रही है....
पलाश के फूल तारों भरे सफेद दुपट्टे पर गिर रहे है । उधर कुछ दूर बंदिशें अपनी मुस्कान लिए बिखर- बिखर जा रही है।
पलकों की कोरें  बंदिशों की छांव बन अपनी आंखों से काजल का टीका लगा रहीं है।

काजल का टीका आत्माओं के अंधेरों से  कहां कभी बचा पाया है?

बिखरे शब्द जंगल के रास्ते शहर की धूप भरी सड़को पर पहचाने गये   लाल स्याही से गोले लगाए जाने लगे.....
बंदिशें भूल गई थी मात्राओं का खेल निराला है इसलिए राजा है तभी न उसकी नीति व अनीति का साया है।

पलाश तो स्वच्छंद उगता है.... इसलिए जंगल मे ही फलता फूलता है...जंगल मे शब्द नही होते सिर्फ ध्वनि होती है,हर राजा कहां समझ पाता है हर ध्वनि  गुरुत्वाकर्षण का भेदन नही करती....।

आज भी निस्पंद रात में जब कभी बादलों की ओट से चांद की रोशनी टहनियों की फुनगियों पर पड़ती है तो न जाने क्यूं मन के नक्शे पर एक हराभरा जंगल बंदिशें गाने लगता है।
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Wednesday, November 27, 2019

गांधी कहाँ हैं ?

गांधी के  व्यक्तित्व को  लेखों पुस्तकों नही समेटा जा सकता है । गांधी का जीवन तो वह  महान गाथा  है जिसके द्वारा  शब्दों में ब्रह्म की शक्ति को समाहित कर उस गूढ़ मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से लोगों का परिचय कराया और  दिखाया गया  कि विचार, वाणी, और कर्म से जो चाहे वो किया जा सकता है  । हालांकि जो वह  नहीं कर सकते थे उस के लिए उन्होंने कभी किसी से कहा भी नहीं । अपने आचरण से मण्डित  शब्दों को उन्होंने मन्त्र से भी ज्यादा प्रभावशाली बना डाला था यही कारण था कि  उनके एक -एक कार्य शैली को लोगो ने जिया था। उनका जीवन सदैव  आत्मा के प्रकाश से  प्रकाशित रहा और उस प्रकाश में ही उन्होंने अपनी जीवन यात्रा तय की। 
हम सब जिस गांधी को जानते है वह वो व्यक्ति हैं  जिसे समय ने  हिन्दुस्तान के लिए चुना और फिर गढ़ा उस भारतीय सभ्यता और संस्कृति से जो राम से चलती हुई बुद्ध   तक आई थी। 
गांधी ने करोड़ो देशवासियो की संभावनाओं  को गढ़ा और भर दिये  उनकी आंखो में सपने आजाद भारत के ।  एक गुलाम देश का फेका गया चोट खाया स्वाभिमान जो एक  सूने प्लेटफार्म में अपनी संस्कृती और सभ्यता समेटता हुआ भारतवर्ष के भविष्य को एक नूतन आकार  देने के संकल्प के साथ उठ खड़ा हुआ। गांधी ने अपने अपमान को देश और देशवासियों का सामूहिक अपमान को स्वतन्त्रता में बदल डाला। बुद्ध की करुणा को ह्रदय में धारण करके गांधी ने पीड़ित जनमानस के ह्रदय में धंसा  तीर निकला था और दुखी संतृप्त देश को आशा की न सिर्फ किरण दिखलाई थी बल्कि उन्होंने उन्हें उनके अस्तित्व से रूबरू भी कराया था। 
यह प्रश्न ही काफी है कि हमें गांधी की जरुरत है तो क्या गांधी के विचारो की प्रासंगिकता पर विचार करना चाहिए ? पर हम तो विकास के रास्ते पर चल पढ़े है फिर गांधी के विचारो का आत्ममंथन क्यों करे? पर  उन समस्याओं का क्या जो विकास के रास्ते में मजबूती से गढ़ी है ये समस्याएं है- आर्थिक असमानता एवं पर्यावरणीय परिस्थितिकी असंतुलन।क्या  ये समस्याएं  आर्थिक वृद्धि की सफलता का या बड़े पैमाने पर अपनाई गई  प्रौद्योगिकी को अपनाने का परिणाम है?  ऐसे ढेरों प्रश्नों के उत्तर गांधी में ही ढूंढा  है  । आज के समय गांधी की प्रासंगिकता क्या  है यह जानने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि गाँधी के व्यक्तित्व एवं विचार दर्शन का मूल आधार क्या है?  
गांधी राजनीतिज्ञ हैं, दार्शनिक हैं, सुधारक हैं, आचारशास्त्री हैं, अर्थशास्त्री हैं, क्रान्तिकारी हैं। समग्र दृष्टि से गाँधी के व्यक्तित्व में इन सबका सम्मिश्रण है मगर उनके व्यक्तित्व एवं विचार दर्शन का मूल आधार धार्मिकता है। बक़ौल  गांधी- मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है. सत्य मेरा भगवान है। अहिंसा उसे साकार करने का साधन है। एक धर्म जो व्यावहारिक मामलो पर ध्यान नहीं देता और उन्हें हल करने में कोई मदद नहीं करता धर्म नहीं है।  
स्वामित्व और प्रबंधन का केन्द्रीयकरण श्रम का अवसर कम होना एवं पर्यावरण का प्रदूषण और प्राकृतिक  संसाधनों के तेजी से दोहन के कारण  वो समाप्ति की तरफ है । इसके फलस्वरूप  परिस्थितिक  असंतुलन का खतरा तेजी से बढ रहा है ऐसे समय मे हमें गांधी के व्यवहारिक धर्म को अपनाने की आवश्यकता है। आज अगर महात्मा गांधी होते तो इसके समाधान स्वरुप 'स्वदेशी' प्रौद्यौगिकी’ का सुझाव देते जिसका  स्थानीय संसाधनों से ही  स्थानीय आवश्यकता की पूर्ति करना है । उत्पादन स्थानीय जरुरतो के लिए होने के कारण उसके माल भाड़े,विक्रय और उसके प्रबन्धन आदि की लागत में कमी होती। चूँकि  लाभ केन्द्रिकत नहीं होता या सीमित होता तो आर्थिक असमानता में निरंतर कमी होती जाती। 
गांधी के विचारो से प्रेरित अमर्त्य सेन विकास का तात्पर्य मनुष्य की स्वतंत्रता को मानते है। यह स्वतंत्रता केवल तभी पाई जा सकती है,यदि हम उसे केवल 'अंतिम मंजिल न' मान कर उसकी प्रक्रिया में ही उसे समाहित कर सके।  आर्थिक केन्द्रीयकरण  की जरूरतें राजनीतिक, केन्द्रीयकरण के बिना पूरी नहीं की जा सकती है।गांधी ने अपने जीवन के साथ बहुतेरे प्रयोग किये वो अपनी आत्मकथा में लिखते है मेरी आत्मकथा के हर पन्ने में मेरे प्रयोग झलके तो में इस आत्मकथा को निर्दोष मानूंगा। क्या हमारे अर्थशास्त्री  एवं राजनेता प्रयोग नहीं कर सकते?  मानव -मानव में भेद धर्म -धर्म में भेद राग- द्वेष इन सबको मिटाने का प्रयोग हमें करना होगा ताकि राजनेता लोकतान्त्रिक आकाँक्षाओं व अधिकारों को पोषित करना छोड़ दें और एक हिंसक सोच को अहिंसक रूप देने का प्रयोग शुरू हो। 
हमारे देश को प्रशासन की बुनियाद की तरफ देखना ही होगा जनता के निचले तबके की भागेदारी व सरकारी नियंत्रण से मुक्त स्वराज के लिए गांधीवाद को अपनाना ही होगा। एक राष्ट्र की बुनियादी प्रगति के लिए ये सोच बहुत ही जरुरी है इससे विकास की गति बहुपक्षीय  होगी जो आर्थिक व सामाजिक आसमनाता की खाई को भर देगी।मार्टिन सुआरेज ने अपनी पुस्तक ' पोप गोज टू अलास्का 'में लिखा है , अगर जीसस या बुद्ध होने की राह चाहिए तो गांधी को समझ लीजिये । अगर इंसानियत की राह  चाहिए तो गांधी को सिर्फ समझना ही नहीं होगा बल्कि उनके वाद को  लोकतंत्र में स्थापित भी करना होगा। आज के समाज की मनोदशा को दिशा देने के लिए गांधी को फिर से समझना होगा ऐसा न हो कि हम देर कर दे और फिर से बर्बर युग में प्रवेश कर जाएं। 
स्वीडिश अर्थशास्त्री गुर्नार मिर्डल  का कहना है,  जिस सामाजिक और आर्थिक क्रांति का स्वप्न गांधी ने देखा उसमे गहन दूरदर्शिता थी। आज समानाताओं की बड़ी वजह दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है । ऐसी प्रणाली जो श्रमिक और शिक्षित के बीच की दूरियों को पाट नहीं पाई ।ये कैसी शिक्षा है जो डिग्री धारक को श्रमिक बना देती है और श्रमिक को श्रम का मूल्य  नहीं दे पाती है ।ऐसी स्थिति में गांधी तकनीकी  शिक्षा का रास्ता सुझाते हैं जिसमे शिक्षा का मापदंड डिग्री नहीं ज्ञान हो ताकि व्यक्ति अपने कार्य से अर्थ अर्जित आसानी से कर सके। 
भारत ने सदा ही अपना सर्वोतम दुनिया को दिया है। यह वह धरती है, जहां बुद्ध ने जन्म लिया था। वही बुद्ध, जिन्हें मानने वाले करोड़ो देश के बाहर है तो मुठ्ठी भर देश के अन्दर है । कालांतर में यही मिटटी दुनिया को गांधी जैसा द्रष्टा सौंपती है लेकिन वह  भी कही गुम हो जाता है। गांधी कहां है?  क्यों हमारे अन्दर या हमारे सिद्धांतो में दिखाई नहीं देते? 
भारत देश में जो गांधीवाद है क्या वह  सच में उनकी राह  पर चल रहा  है ? कहीं गांधी खोया हुआ महात्मा तो नहीं ।क्या इस फरिश्ते की चमक अपनी ही धरती पर मिट रही है? सच है गांधी किताबो में गुम है जो निकल आते है कभी -कभी विशेष दिनों में । यह कैसी बिडम्बना है हम गांधी को अपनाना चाहते है उन्हें समझना चाहते है पर कहीं न कहीं भाग रहे है खुद से समस्याओं से । हमें खुद को जांचना होगा ।आने वाली पीढ़ी के लिए उन्हें वह  सपने देने होंगे जिनका सपना बापू ने देखा था । क्या जवाब हम बच्चो को देंगे जब वो कहेंगे कि बापू जो अहिंसा का पाठ आप को पढ़ा गए थे  तब भी इतना हिंसक समाज क्यों है? गांधी को वाद, विचार, सिद्धांत से मत जोडिये गांधी को इंसानियत से जोडिये क्योंकि यहीं  से शुरुआत होगी बेहतर जीवन की, बेहतरीन समाज की.....। 

Wednesday, October 30, 2019

यात्रा


सभ्रम के साथ हम साथ यात्रा पर निकले राही है

कहीं से गुजरना और गंतव्य तक पहुंचना
दोनों यात्राएं अलग-अलग होती है
यात्रा में दूरी की जांच-पड़ताल नहीं की जाती
बस यात्रा की लहरों के
के साथ कदमताल मिलाया जाता है

जीवन के खुरदुराहट के भीतर
मन की अँगुलियों ने
यात्रा सुखद हो
इसलिए कितने ही रास्ते बनाएं
सारे संताप उलीचने की कोशिश की
और यात्रा जारी रखी

न जाने कब से यात्रा चल रही है
हर कोई यात्री है अपने सपनों के साथ
वो कहाँ भस्माभूत होते है सिर्फ चेहरा बदलते है
वक्त के साथ उनकी यात्रा भी चलती रहती है

सूर्य यात्रा के आधे रस्ते पर
अँधियारा दूर करता आगे बढ़ रहा है,
अंधियारा ,सितारों को रास्ता बताने के लिए यात्रा पर है

इश्क की बिसात पर रांझे कश्ती खे रहे है
रात आईने में बदलती है
पर बारिश सबके लिए नहीं होती

चाँद हर यात्रा में बताता है इश्क की हक़ीक़तें
तब देह की यात्रा
पाक हो पहुँचती है आत्मा तक

सुदूर सितारों की भट्ठी से
धरती पर चली आई धूल की यात्रा
अज्ञात में सिमटी है

मिट्टी की यात्रा उस बूँद के इंतज़ार में है जो जीवन को आगे बढ़ाएं।
पुरुष की देह से गुज़री एक बिंदु की यात्रा
स्त्री देह तक आकार अगर ख़त्म हो जाती तो
यात्रा के महत्त्व को कैसे समझते हम

कोई भी यात्रा यूं ही नहीं होती
प्रशांत नयन से भाद्रपद के चंद्रमा तक
साँस से आस तक।
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Wednesday, October 16, 2019

मेरी प्रकृति और तुम्हारी प्रकृति से
हमारा सह - अस्तित्व बना है.
तुमने मेरे अन्दर प्रेम के बीज बोये है 
और मैने प्रेम पूर्ण उत्पादन करा है 
तुम्हे दी है प्रसन्नता की फसल 
तुम्हारा प्रेम मेरी रचना मे हमेशा प्रवाहमान रहा है 
कभी वृक्ष, वन, सागर,
कभी परबत, हवा, बादल मे
बस इतना करना 
अपने अंतर्मन के सत्य से
मेरे मन को बाँध  कर 
मेरे भौतिक मन को 
प्राकृतिक मन मे बदल देना  

Thursday, October 3, 2019

षोडशोपचार

लोक संस्कृति हो या वैदिक संस्कृति मानव के मन मे जब जब इच्छा उठेगी तब तब वो उसकी पूर्ति के लिए ईश्वर का आहवान करेगा आराधना का तरीका भिन्न हो सकता है जैसे पूर्णरूप से भौतिक या दिव्य आनंद से युक्त या पूर्ण आधयात्मिक।
  
हिन्दू धर्म में किसी भगवान को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार की पूजा के विधान है पर मुख्य रूप से पूजन के मुख्य छ: प्रकार है--
  • पंचोपचार (5 प्रकार)
  • दशोपचार (10 प्रकार)
  • षोडशोपचार (16 प्रकार)
  • द्वात्रिशोपचार (32 प्रकार)
  • चतुषष्टि प्रकार (64 प्रकार)
  • एकोद्वात्रिंशोपचार (132 प्रकार)

षोडशोपचार

पूजन का कृत्य

१. प्रथम उपचार : देवता का आवाहन करना (देवता को बुलाना)
‘देवता अपने अंग, परिवार, आयुध और शक्तिसहित पधारें तथा मूर्ति में प्रतिष्ठित होकर हमारी पूजा ग्रहण करें’, इस हेतु संपूर्ण शरणागतभाव से देवता से प्रार्थना करना, अर्थात् उनका `आवाहन’ करना । आवाहन के समय हाथ में चंदन, अक्षत एवं तुलसीदल अथवा पुष्प लें ।
इ. आवाहन के उपरांत देवता का नाम लेकर अंत में ‘नमः’ बोलते हुए उन्हें चंदन, अक्षत, तुलसीrदल अथवा पुष्प अर्पित कर हाथ जोडें ।
टिप्पणी – १. देवता के रूप के अनुसार उनका नाम लें, उदा. श्री गणपति के लिए ‘श्री गणपतये नमः ।’, श्री भवानीदेवी के लिए ‘श्री भवानीदेव्यै नमः ।’ तथा विष्णु पंचायतन के लिए (पंचायतन अर्थात् पांच देवता; विष्णु पंचायतन के पांच देवता हैं – श्रीविष्णु, शिव, श्री गणेश, देवी तथा सूर्य) ‘श्री महाविष्णु प्रमुख पंचायतन देवताभ्यो नमः ।’ कहें ।
२. दूसरा उपचार : देवता को आसन (विराजमान होने हेतु स्थान) देना
देवता के आगमन पर उन्हें विराजमान होने के लिए सुंदर आसन दिया है, ऐसी कल्पना कर विशिष्ट देवता को प्रिय पत्र-पुष्प आदि (उदा. श्रीगणेशजी को दूर्वा, शिवजी को बेल, श्रीविष्णु को तुलसी) अथवा अक्षत अर्पित करें ।
३. तीसरा उपचार : पाद्य (देवता को चरण धोने के लिए जल देना;पाद-प्रक्षालन) 
देवता को ताम्रपात्र में रखकर उनके चरणों पर आचमनी से जल चढाएं ।
४. चौथा उपचार : अघ्र्य (देवता को हाथ धोने के लिए जल देना; हस्त-प्रक्षालन)
आचमनी में जल लेकर उसमें चंदन, अक्षत तथा पुष्प डालकर, उसे मूर्ति के हाथ पर चढाएं ।
५. पांचवां उपचार : आचमन (देवता को कुल्ला करने के लिए जल देना; मुख-प्रक्षालन)
आचमनी में कर्पूर-मिश्रित जल लेकर, उसे देवता को अर्पित करने के लिए ताम्रपात्र में छोडें ।
६. छठा उपचार : स्नान (देवता पर जल चढाना)
धातु की मूर्ति, यंत्र, शालग्राम इत्यादि हों, तो उन पर जल चढाएं । मिट्टी की मूर्ति हो, तो पुष्प अथवा तुलसीदल से केवल जल छिडवेंâ । चित्र हो, तो पहले उसे सूखे वस्त्र से पोंछ लें । तदुपरांत गीले कपडेसे, पुनः सूखे कपडे से पोंछें । देवताओं की प्रतिमाओं को पोंछने के लिए प्रयुक्त वस्त्र स्वच्छ हो । वस्त्र नया हो, तो एक-दो बार पानी में भिगोकर तथा सुखाकर प्रयोग करें । अपने कंधे के उपरने से अथवा धारण किए वस्त्र से देवताओं को न पोंछें ।
अ. देवताओं को पहले पंचामृत से स्नान करवाएं । इसके अंतर्गत दूध, दही, घी, मधु तथा शक्कर से क्रमानुसार स्नान करवाएं । एक पदार्थ से स्नान करवाने के उपरांत तथा दूसरे पदार्थ से स्नान करवाने से पूर्व जल चढाएं । उदा. दूध से स्नान करवाने के उपरांत तथा दही से स्नान करवाने से पूर्व जल चढाएं ।
आ़ तदुपरांत देवता को चंदन तथा कर्पूर-मिश्रित जल से स्नान करवाएं ।
इ. आचमनी से जल चढाकर सुगंधित द्रव्य-मिश्रित जल से स्नान करवाएं ।
ई. देवताओं को उष्णोदक से स्नान करवाएं । उष्णोदक अर्थात् अत्यधिक गरम नहीं, वरन् गुनगुना पानी ।
उ. देवताओं को सुगंधित द्रव्य-मिश्रित जल से स्नान करवाने के उपरांत गुनगुना जल डालकर महाभिषेक स्नान करवाएं । महाभिषेक करते समय देवताओं पर धीमी गति की निरंतर धारा पडती रहे, इसके लिए अभिषेकपात्र का प्रयोग करें । संभव हो तो महाभिषेक के समय विविध सूक्तों का उच्चारण करें ।
ऊ. महाभिषेक के उपरांत पुनः आचमन के लिए ताम्रपात्र में जल छोडेें तथा देवताओं की प्रतिमाओं को पोंछकर रखें ।
७. सातवां उपचार : देवता को वस्त्र देना
देवताओं को कपास के दो वस्त्र अर्पित करें । एक वस्त्र देवता के गले में अलंकार के समान पहनाएं तथा दूसरा देवता के चरणों में रखें ।
८. आठवां उपचार : देवता को उपवस्त्र अथवा यज्ञोपवीत (जनेऊ देना) अर्पित करना 
पुरुषदेवताओं को यज्ञोपवीत (उपवस्त्र) अर्पित करें ।
९-१३. नौंवे उपचार से तेरहवें उपचारतक, पंचोपचार अर्थात देवता को गंध (चंदन) लगाना, पुष्प अर्पित करना, धूप दिखाना (अथवा अगरबत्ती से आरती उतारना), दीप-आरती करना तथा नैवेद्य निवेदित करना ।
नैवेद्य दिखाने के उपरांत दीप-आरती और तत्पश्चात् कर्पूर-आरती करें ।
१४. चौदहवां उपचार : देवता को मनःपूर्वक नमस्कार करना
१५. पंद्रहवां उपचार : परिक्रमा करना
नमस्कार के उपरांत देवता के सर्व ओर परिक्रमा करें । परिक्रमा करने की सुविधा न हो, तो अपने स्थान पर ही खडे होकर तीन बार घूम जाएं ।
१६. सोलहवां उपचार : मंत्रपुष्पांजलि
परिक्रमा के उपरांत मंत्रपुष्प-उच्चारण कर, देवता को अक्षत अर्पित करें । तदु पूजा में हमसे ज्ञात-अज्ञात चूकों तथा त्रुटियों के लिए अंत में देवतासे क्षमा मांगें और पूजा का समापन करें । अंत में विभूति लगाएं, तीर्थ प्राशन करें और प्रसाद ग्रहण करें ।
मानवीय अंतःकरण में सत्प्रवृत्तियों, सद्भावनाओं, सुसंस्कारों के जागरण, आरोपण, विकास व्यवस्था आदि से लेकर महत् चेतना के वर्चस्व बोध कराने, उनसे जुड़ने, उनके अनुदान ग्रहण करने तक के महत्त्वपूर्ण क्रम में कर्मकाण्डों की अपनी सुनिश्चित उपयोगिता है । इसलिए न तो उनकी उपेक्षा की जानी चाहिए और न उन्हें चिह्न पूजा के रूप में करके सस्ते पुण्य लूटने की बात सोचनी चाहिए । कर्मकाण्ड के क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठना या उन्हें एकदम निरर्थक मान लेना, दोनों ही हानिकारक हैं । उनकी सीमा भी समझें, लेकिन महत्त्व भी न भूलें । संक्षिप्त करें, पर श्रद्धासिक्त मनोभूमि के साथ ही करें, तभी वह प्रभावशाली बनेगा और उसका उद्देश्य पूरा होगा ।