Friday, December 29, 2017

एक था सरवन

एक था सरवन
पालकी उठाता था
जेठ की लू में
पूस के जाड़े में
गीत गाता था
चैता सुनाता था

सरवन की पालकी में
ठहर गया एक दिन
चुलबुला वसंत
प्रीत कुसुंभ के संग

फिर प्रेम रंगा, फागुन रंगा
रंग गया वसंत
प्रीत कुसुंभ के संग

अब पग फेरा नहीं
वसंत ठहरा वही

इतिहास हुआ क्रुद्ध
मौसम हुआ रुद्ध

इतिहास देवता कहते है..

सरवन सीधा नहीं बदमाश था
वो तो चालबाज था
वो चोर है
वो पागल है
वो कायर है

सरकार ने सामाजिक स्तरीकरण की बात की
सरवन को मात दी
सरवन सरकार के पाँव पखारता है
माई बाप, माई बाप चिल्लाता है

साल आते है चले जाते है
हर युग में सरवन गाते फिर रोते है
बस यूं ही अपना वसंत खोते है

पालकी उठाएगा नहीं
चैता सुनाएगा नहीं
सरवन अब कभी नज़र आएगा नहीं

एक है पागल
विगत पालो की पालकी उठता है
चैता गाता है-

चढ़त चइत चित लागे ना रामा
बाबा के भवनवा
बीर बमनवा सगुन बिचारो
कब होइहैं पिया से मिलनवा हो रामा
चढ़ल चइत चित लागे ना रामा...

वसंत की कब्र पर बंदिशें बिखर बिखर जाती है

सरवन मरते नहीं
वसंती अंधेड़ों में अदृश्य हो जाते है।

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Saturday, December 16, 2017

न्याय की आस्थाएं

उसकी पीठ पर बैजनी फूल बंधे थे 
और हाथ में सपने 
अभी अभी उगे पंख 
उसने करीने से सजा रखे थे 
कुछ जुगनू उसके होठों पर चिपके थे 
कुछ हँसी बन आसमान में

वो एक सर्द रात थी 
जब हम नक्षत्रों के नीचे चल रहे थे 
और चाँद मेरे साथ 
हिम खंड के पिघलने तक 
मैं उसका साथ चाहता था 
उसे भी इंतजार था सुनहरी धूप का

मैं भरना चाहता था 
वो समेटना 
इसलिए हमने एकांत का 
इंतजार किया

उसकी हँसी एकांत को भर रही थी
मैं डूब रहा था
तभी एकांत के अधेरों में छिपे भेड़ियों ने 
उसकी हँसी को भेदना शुरू कर दिया 
मैं अकेला ,उनके साथ उनकी हैवानियत
हैवानियत से मेरी नियत हार गई 
और हँसी भी

क्षत विक्षित हँसी अब झाड़ियों में पड़ी थी 
और में न्याय में
न्याय उलझा था किसी नियम से
मैं आज भी अधेरी रात के डर को 
मुट्टी भर राख और चुल्लू भर आंसू में मिला कर
न्याय की आस्थाएं ढूंढ़ रहा हूं।
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Friday, December 15, 2017

बोलो पद्मावती

पद्मावती
इतिहास की वीथिका में भटकती
क्या सोच रही हो ,खिलजी चला गया ?

देह की राख से शांति के महल मत बनाओ
ठुड्डी पर बने तुम्हारे तिल की चाहत लिए
लौटता आदमखोर बांट रहा है
बाल मन को आदम वासना के विचार

अब वो
जिंदगी के गुजरते कारवां में
मौत के हरकारा बन
घर के आँगन में , आँगन के बहार
अकसर नज़र आता है,
मासूम चीखों के अशुभ पैगाम लेकर

यौवन की उछलती गलियों में
मौत की ठिठोली अब भी वैसी ही चल रही है पद्मावती
कुछ दर्द बिना नाम बिना संदर्भ के इतिहास में
कुछ नियति के तराजू के पलड़े पर झूलते
तो कुछ मुट्ठी भर राख बन न्याय मांगते दिख जाते है

रानी शायद तुम्हारा सोचना सच होता
अगर प्रतिरोध का तरीका कुछ और होता
शायद..
वेदना का अन्त: पक्ष ज्यादा पेचीदा होता है
वेदना के सामाजिक पक्ष की तुलना में
निर्दयी खिलजी परम्परा के अंत का मार्ग जौहर नहीं साका  है रानी

बचने की अनंत चेष्टाओं का अंत सिर्फ देह का परित्याग नहीं
देह की राख झाड़ कर
आओ पद्मावती
कामी सुलतानों को दंड देना है
देखो स्त्रियाँ खप्पर लिया चली आ  रही है।
कारवां बनने को है।
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#डॉकिरणमिश्रा

शाका : महिलाओं को अपनी आंखों के आगे जौहर की ज्वाला में कूदते देख पुरूष दुश्मन सेना पर आत्मघाती हमला कर इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करते हुए रणभूमि में चिरनिंद्रा में शयन करेंगे | पुरुषों का यह आत्मघाती कदम शाका के नाम से विख्यात हुआ |
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Tuesday, December 5, 2017

प्याली में तुफान

मानव समाज जब ताम्रयुग में पहुंचता है
संस्कृति जब ग्रामीण पृष्ठभूमि पर खडी
चरखे से बनाती है सभ्यताओं के विकास के धागे
जिन का छोर पकड़
प्राचीन जगत की नदीघाटी सभ्यताएं
नगरों की स्थापना के लिए
करती है प्रसव लिपियों का
तब ग्राम और नगर के बीच
एक स्वर धीरे धीरे पनपता है
जो व्यंजन में बदल
बॉस्टन हार्बर में
करता है विरोध अंग्रेज सरकार का
देता है साथ उपनिवेशवासियों  का
सारी दुनिया के गरीब, मजदूर, बेसहारा
का सहारा बन
पहुंच जाता है विदर्भ के गांवों में
दुमका की खदानों में
दंडकारणय  के जंगलों में
वादी-ए-कश्मीर की संगत में
बन जाता है सबका प्रिय अक्षर चाय
और क्यों न हो
शोंनोग जैसे ईश्वरीय किसान के प्याले से
जनता का जनता के लिए बन
राजा को रंक, रंक को राजा बना
उठा देता है प्याली में तुफान।

☕☕☕
चाय की चर्चा 😊

Monday, October 9, 2017

भाद्रपद के चाँद सा प्रेम

प्रेम की निर्जनता में उदासी हमेशा स्लेटी रंग की क्यों होती है?
यही पूछा था न मैं ने
और तुमने हस कर कहा था
बिना संकट के कुछ भी सार्थक की प्रति संभव कहां,
संभव तभी है
जब मन के पथ में दूसरे की गंध भरी हो
शारदीय धूप का केसरिया रंग किन्हीं अक्षांशो पर खिलाना ही होता है मयूख....
सच कहा था तुमने
प्रेम की परिणति तो पहुँच जाने में ही होती है
चाहे इतिहास बने या वर्त्तमान
बस इतना रहे की
मन की निर्जनता में भाद्रपद के चाँद सा झलकता रहे।