Monday, September 17, 2018

उदगीथ 🌾🌾🌾

भूख के रूदन को
शांत कराती स्त्री रचती है गीत
और इस तरह
भूख के भय को करती है कम
उदगीथ, रचिता को अन्न से कर धन्य
चल पड़ता है
गुंजाते गूंजते
तमाम युद्धों, बर्बरता से
सभ्यताओं को सुरक्षित
बचाने के लिए

कंगूरे पर बंधा उदगीथ*
अब निश्चेष्ट है लेकिन निराश नहीं
वो तोड़ता है छंद ,ललकारता है कंगूरे को

सदियों से तपते सूर्य की किरणों को सहती
आंसुओ में भींगती नीव की ईंट को,
नमन कर बचा ले जाता है
सजीव और चेतन प्रसार जीवन तत्व को।
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*उपनिषद काल में अन्न प्राप्ति के लिए गये जाने वाला गीत उद का अर्थ था श्वास, गीत का अर्थ था वाक् और था का अर्थ था अन्न अथवा भोजन ।
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Friday, September 7, 2018

जिंदगी की धुन

समय के भाल पर न जाने कितनी गीत- संगीत सजे है न जाने जिंदगी ने कितने रूप धरे है ।प्रकृति की सारी थिरकन सिर्फ उसी से है
जिगर की पीर हल्की और दिल से रूह के रिश्ते पुख़्ता सिर्फ उसी से हो जाते है ।
जिंदगी की जद्दोजहद, पसोपेश,अंतर्विरोध सब पर अचानक विराम लग जाता है ।
कौन है वो जो पल भर में हमको आपको सकूंन से भर देता है ?
ये और कुछ नहीं  कंठ से लेकर यंत्र तक से निकला स्वर है जिसने दहक समय में भी हमेशा जीवन संगीत सुनाया है।
स्वर सिर्फ व्यंजनों के उच्चारण में सहायक ही नहीं होते वो स्वतंत्र रूप से भी उच्चारित होते है इन्ही से तो जिंदगी के तराने निकलते है।
स्वर संगीत भी है, गीत भी है स्वर विज्ञान भी है तो ज्ञान भी है  ये अपने आप में गूढ़ विज्ञान है…. जिसे हमारे विद्वानों ने ना केवल समझा बल्कि सिद्ध भी किया है।
ये अमिट नाद है हजारों सालों से बसी मानव जाति के गहन मन, जीवन- पद्धति, चिंतन,व्यवहार सभी को भाषा स्वर से ही मिली है
सृष्टि की उत्पत्ति की प्रक्रिया नाद के साथ हुई। जब प्रथम महास्फोट (बिग बैंग) हुआ, तब आदि नाद उत्पन्न हुआ। उस मूल ध्वनि को जिसका प्रतीक ‘ॐ‘ है, नादब्रह्म कहा जाता है। पांतजलि योगसूत्र में पातंजलि मुनि ने इसका वर्णन ‘तस्य वाचक प्रणव:‘ की अभिव्यक्ति ॐ के रूप में है, ऐसा कहा है। माण्डूक्योपनिषद्‌ में कहा है-
ओमित्येतदक्षरमिदम्‌ सर्वं तस्योपव्याख्यानं
भूतं भवद्भविष्यदिपि सर्वमोड्‌◌ंकार एवं
यच्यान्यत्‌ त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥
माण्डूक्योपनिषद्‌-१॥
अर्थात्‌ ॐ अक्षर अविनाशी स्वरूप है। यह संम्पूर्ण जगत का ही उपव्याख्यान है। जो हो चुका है, जो है तथा जो होने वाला है, यह सबका सब जगत ओंकार ही है । तीनों कालों से अतीत अन्य तत्व है, वह भी ओंकार ही है।
हमारे प्राचीन ग्रंथ शिव स्वरोदय में पार्वती भगवान् शिव से पूछती है ये ब्रह्माण्ड कैसे उत्पन्न हुआ, कैसे स्थित होता है, और कैसे इसका प्रलय होता है?
तत्त्वाद् ब्रह्याण्डमुत्पन्नं तत्त्वेन परिवर्त्तते।तत्त्वे विलीयते देवि तत्त्वाद् ब्रह्मा़ण्डनिर्णयः।।
तत्व से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है, इसी से इसकी पालना होती है और इसी से इसका विनाश होता है। निराकार से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्त्पन हुई है, इसी से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है और अंत में सब तत्व में विलीन हो जाता है, फिर सूक्ष्म रूप में तत्व ही रमण करता है।
इन्ही पंच तत्वों की मनुष्य देह है और देह में सूक्ष्म रूप से ये पंच तत्व ही विद्यमान हैं। स्वर के उदय में ये पंच तत्व ही समाये हैं, स्वर का ज्ञान सारे ज्ञानो में उत्तम है। स्वर में सम्पूर्ण वेद और शास्त्र है, स्वर में उत्तम गायन विद्या है स्वर ही आत्म स्वरुप है। ब्रह्माण्ड के खंड तथा पिंड, शरीर आदि स्वर से ही रचे हुए हैं।
जीवनी शक्ति श्वास में अपने को अभिव्यक्त करती है। श्वास के द्वारा ही प्राणशक्ति (जीवनीशक्ति) को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए प्राण शब्द प्राय: श्वास के लिए प्रयुक्त होता है और इसे कभी प्राण वायु भी कहा जाता हैं।
प्राण वायु का कार्यक्षेत्र कण्ठ से हृदय-मूल तक माना गया है और इसका निवास हृदय में। इसकी ऊर्जा की गति ऊपर की ओर है ये प्राण वायु ही हमारे कंठ में स्वर भारती है । इसी प्राण वायु की एक फूंक से बंसी से कितने मधुर स्वर निकलते है।
श्वास अन्दर लेना, निगलना, यहाँ तक कि मुँह का खुलना प्राण वायु की शक्ति से ही होता है। इसके अतिरिक्त, ऑंख, कान, नाक और जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा तन्मात्राओं को ग्रहण करने की प्रक्रिया में भी इसी वायु का हाथ होता हैं। साथ ही यह हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है तथा मानसिक क्रिया जैसे सूचना लेना, उसे आत्मसात करना और उसमें तारतम्य स्थापित करने का कार्य भी सम्पादित करती है।
योगविद्या में स्वर विद्या का अपना स्थान है। स्वर शास्त्र स्वर योग की साधना विज्ञान में महत्त्वपूर्ण स्थान है। नासिका द्वारा चलने वाले सूर्य चन्द्र स्वरों को माध्यम बनाकर कितने ही साधक प्रकृति के अन्तराल में प्रवेश करते हैं और वहाँ से अभीष्ट मणिमुक्तक उपलब्ध करते हैं।
नादाधिनम जगत सर्व...सच तो है सारा जग नाद है
जिंदगी की भागदौड़ में जब सात स्वरों का जादू चलता है तो दुनियाबी नहीं ईश्वर की सदा कानों में सुनाई पड़ती है।
ये सात स्वर आखिर हैं क्या ?
असल में इन सातों स्वरों के विभिन्न प्रकार के समायोजन से विभिन्न रागों के रूप बने और उन रागों के गायन में उत्पन्न विभिन्न ध्वनि तरंगों का परिणाम मानव, पशु प्रकृति सब पर पड़ा।
ये ध्वनि तरंगों ने जब मंत्रो का रूप लिया तो ये बेहद प्रभावशाली हो गये।
असल में विशिष्ट मंत्रों के विशिष्ट ढंग से उच्चारण से वायुमण्डल में विशेष प्रकार के कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनका विशेष परिणाम होता है। यही मंत्रविज्ञान है।
सटीक स्वर अगर लगता है तो बहुत ही कर्णप्रिय होता है वो न सिर्फ सुनने में अच्छा लगता है बल्कि मष्तिष्क में गहरी छाप भी छोड़ता है। शायद यही कारण रहा कि हमारे मनीषी यज्ञ हवन आदि में अपने मन्त्रों की शक्ति से असंभव को संभव कर जाते थे।
शास्त्रकारों ने कहा है ' स्वरेण संल्लीयते योगी।' सृष्टि में हर और रस हर और स्वर संगीत है तभी तो उपनिषेदो में ब्रह्म को रस कहा है। जहां रस वही ब्रह्म जहां ब्रह्म वहां रस। यही रास अंतस की चेतना तरंगों में बहता हुआ मन की अवचेतन कंदराओं में पहुंचता है तब  चित्त प्रकाश से भर जाता है।
ये उपनिषदों का उद्गगीत है तो ऋषि- मुनियों का अनहद।
स्वरों का जादू अनंत है ,ये तो अमिट नाद है जो दुःख,सुख सभी पर अपना प्रभाव छोड़ता है तभी तो अनंत गोपाल कहते है वेदना के सुरों में ही स्वर्गिक संगीत की सृष्टि होती है जिसमे ईश्वर का वास होता है।
आप नींद में भी निश्चेष्ट हो जाएंगे तब भी ये आप के आस- पास रहेगा और आप को झंकृत करता रहेगा।
ये झंकार हमारे  जीवन में बनी रहे इसके लिए जरुरी है बेसुरा राग छोड़ प्रकृति के स्वर  में स्वर मिलाते रहना  ताकि समूची दुनिया माधव बन नृत्य करती रहे।

Wednesday, August 29, 2018

कविता का दिक्‌ काल

कुछ ठेके पर उठी कविताएं
अपने आप पर रश्क़ कर सकती है उनके मालिक कुछ ख़ास किस्म के होते है। दुनिया उन्हें सलाम करती है।
वैसे सजदा करते उनकी भी उम्र बीत रही है।

कुछ इतनी खुशकिस्मत नहीं
वो फुटपाथ पर ही जन्म लेकर वही मर जाती है हालाँकि मुझे ख़ुशी है कि वो उनकी तरह नहीं जिनकी रूह तक बजबजा रही है ।

ऐसी कविताएं अक्सर नज़र आ जाती है जो प्रेम को याद करती है बार-बार और फिर आहे भरती है हालाँकि प्रेम को फ़ना हुए एक युग बीत गया

कुछ कविताएं ऐसी जादू की टोपी पहनातीे है बस एक हाथ हिलाया और तमाम नामजद पुरस्कार उनकी जादू के झोली में।

इंसानी हांथों में बिछी दरारों की तरह कुछ कविताएं हर उस दरार में घुस झांकती है जिसमे वर्षो से थकी रूह सांस लेना भी भूलती जा रही है।

नतीजा दरारों में ही दम तोड़ती है

कुछ तो अजीब अहमक (लोग उन्हें ऐसा ही कहते है) किस्म की कविताएं है कभी -कभी अपनी धौंकनी सी सांसों से तमाम अंगारे गिराती है, और उन पर अपने फूंक का मंतर मार-मार कर दफन हुई बातों को जिन्दा करने की कोशिश करती है ,क्योंकि उन्हें लगता है कुछ बातें दफन नहीं हुई जबरदस्ती जिन्दा दफना दी गई है।

कुछ कविताओं का ये भी शौक भी है वो कब्र खोद दुर्घटनाओं को निकालती और घटना बना लोगो के बीच सनसनी फैला कर चर्चा में रहना चाहती है ।

लेकिन एक दर्द है एक कविता का (जब दर्द गहरा हो तो प्रश्न बन जाता है )वो ये कि जब सब कविता है तो वो साथ क्यों नहीं ?

वैसे ये समय क्या है ? कविता का लोकतंत्र, भेड़तंत्र, तानाशाही या तमगाशाही ?
जो भी हो कुछ कविताएं सर को उठाए न्याय मांग रही है.... मिलेगा क्या?


Wednesday, August 15, 2018

स्वतंत्रता का अनुष्ठान

🇮🇳 🇮🇳
स्वतंत्रता का आलोक
हर तरफ फैला ही था कि
अपनी- अपनी पताका के साथ
अपने -अपने उदघोष हुए
द्वार पर ही स्वतंत्रता ठिठक गई
प्रकाश की किरणें धीरे- धीरे काट दी गई
स्वतंत्रता का सूर्य खंडित हो
क्षत विक्षत हो गया

कुछ उत्साही जाग्रत हुए
अब सत्ता के शिखरों पर
अवतार जन्म लेने लगे
अवसरवाद के पालने में झूलते वो
अँधेरी सदियों के सपने देखने लगे

सारे आदर्शो को सुरिक्षित कर
अवसरवाद को गले लगाया गया
एक मूर्च्छित  युग की शुरुआत हुई
और होती ही चली गई

मूर्छा का संरक्षण कर
बुद्ध के मौन को नष्ट कर
स्वतंत्रता का अनुष्ठान आरम्भ किया गया।
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🇮🇳🇮🇳🇮🇳
स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं
डॉ किरण मिश्रा

Sunday, April 1, 2018

तेरी कहानी-1

रामरती (एक थी रामरती ) अपनी निर्भीकता कई पीढ़ियों में बाँट कर आखिर अपनी कोशिश में कामयाब हो ही जाती  और तैयार कर ही देती है न जाने कितनी मणिकर्णिका।
दरवाजे की ओट से झांकती आंखे तो कुछ नीची निग़ाह अचानक तीखी होकर अपने लिए रास्ता बनाती है और पारे उन रास्तों को आसान बनाने का नुस्खा इतना सहज बता उन आँखों को बड़े ही खूबसूरती से आत्मविश्वास के काजल से सजा देती है।
असल में पारे अपनी कहानी मणिकर्णिका में बिना कह देती हैं की आप ने जो "इ" निकाला है तो अब आप शव हो आपकी पूर्णता व समाज की प्रगति का आधार हमारे द्वारा घुमाएं गये प्रगति के पहिये से ही है।
उन्होंने स्त्री की मंद मुस्कान, लज्जा,मुख फेर लेना, तिरछी दृष्टि , मीठी बातें इन सब से निकाल कर उसे यथार्थ के सामने मणिकर्णिका के रूप में खड़ा किया है जिसमे वाद है प्रतिवाद है पर उसका तरीका पारम्परिक न होकर  गैर पारम्परिक प्रस्तुत किया है लेकिन इस प्रस्तुति में उनके स्त्री पात्र अपना फर्ज नहीं भूलते वो जानते है उनके लिए रहा आसान नहीं इसीलिए वो चाम को नहीं काम को तवज्जो देते है लेकिन वो ये भी जानते है इन सब के बीच उन्हें न सिर्फ अपनी रहा खुद खोजनी है बल्कि उस रहा के झाड़- झंखाड़ को उन्हें खुद ही साफ करना है।
लड़कियों के रास्ते को आसान बनाने के लिए पारे ने वक्त का पहिया घुमा दिया है कच्चे- पक्के रास्तों से आई लड़कियां
वक्त के पहियों में बैठ गुनगुनाती है--

मंज़िल मिली मुराद मिली मुद्दआ मिला सब कुछ मुझे मिला जो तिरा नक़्श-ए-पा मिला....।