Thursday, October 3, 2019

षोडशोपचार

लोक संस्कृति हो या वैदिक संस्कृति मानव के मन मे जब जब इच्छा उठेगी तब तब वो उसकी पूर्ति के लिए ईश्वर का आहवान करेगा आराधना का तरीका भिन्न हो सकता है जैसे पूर्णरूप से भौतिक या दिव्य आनंद से युक्त या पूर्ण आधयात्मिक।
  
हिन्दू धर्म में किसी भगवान को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार की पूजा के विधान है पर मुख्य रूप से पूजन के मुख्य छ: प्रकार है--
  • पंचोपचार (5 प्रकार)
  • दशोपचार (10 प्रकार)
  • षोडशोपचार (16 प्रकार)
  • द्वात्रिशोपचार (32 प्रकार)
  • चतुषष्टि प्रकार (64 प्रकार)
  • एकोद्वात्रिंशोपचार (132 प्रकार)

षोडशोपचार

पूजन का कृत्य

१. प्रथम उपचार : देवता का आवाहन करना (देवता को बुलाना)
‘देवता अपने अंग, परिवार, आयुध और शक्तिसहित पधारें तथा मूर्ति में प्रतिष्ठित होकर हमारी पूजा ग्रहण करें’, इस हेतु संपूर्ण शरणागतभाव से देवता से प्रार्थना करना, अर्थात् उनका `आवाहन’ करना । आवाहन के समय हाथ में चंदन, अक्षत एवं तुलसीदल अथवा पुष्प लें ।
इ. आवाहन के उपरांत देवता का नाम लेकर अंत में ‘नमः’ बोलते हुए उन्हें चंदन, अक्षत, तुलसीrदल अथवा पुष्प अर्पित कर हाथ जोडें ।
टिप्पणी – १. देवता के रूप के अनुसार उनका नाम लें, उदा. श्री गणपति के लिए ‘श्री गणपतये नमः ।’, श्री भवानीदेवी के लिए ‘श्री भवानीदेव्यै नमः ।’ तथा विष्णु पंचायतन के लिए (पंचायतन अर्थात् पांच देवता; विष्णु पंचायतन के पांच देवता हैं – श्रीविष्णु, शिव, श्री गणेश, देवी तथा सूर्य) ‘श्री महाविष्णु प्रमुख पंचायतन देवताभ्यो नमः ।’ कहें ।
२. दूसरा उपचार : देवता को आसन (विराजमान होने हेतु स्थान) देना
देवता के आगमन पर उन्हें विराजमान होने के लिए सुंदर आसन दिया है, ऐसी कल्पना कर विशिष्ट देवता को प्रिय पत्र-पुष्प आदि (उदा. श्रीगणेशजी को दूर्वा, शिवजी को बेल, श्रीविष्णु को तुलसी) अथवा अक्षत अर्पित करें ।
३. तीसरा उपचार : पाद्य (देवता को चरण धोने के लिए जल देना;पाद-प्रक्षालन) 
देवता को ताम्रपात्र में रखकर उनके चरणों पर आचमनी से जल चढाएं ।
४. चौथा उपचार : अघ्र्य (देवता को हाथ धोने के लिए जल देना; हस्त-प्रक्षालन)
आचमनी में जल लेकर उसमें चंदन, अक्षत तथा पुष्प डालकर, उसे मूर्ति के हाथ पर चढाएं ।
५. पांचवां उपचार : आचमन (देवता को कुल्ला करने के लिए जल देना; मुख-प्रक्षालन)
आचमनी में कर्पूर-मिश्रित जल लेकर, उसे देवता को अर्पित करने के लिए ताम्रपात्र में छोडें ।
६. छठा उपचार : स्नान (देवता पर जल चढाना)
धातु की मूर्ति, यंत्र, शालग्राम इत्यादि हों, तो उन पर जल चढाएं । मिट्टी की मूर्ति हो, तो पुष्प अथवा तुलसीदल से केवल जल छिडवेंâ । चित्र हो, तो पहले उसे सूखे वस्त्र से पोंछ लें । तदुपरांत गीले कपडेसे, पुनः सूखे कपडे से पोंछें । देवताओं की प्रतिमाओं को पोंछने के लिए प्रयुक्त वस्त्र स्वच्छ हो । वस्त्र नया हो, तो एक-दो बार पानी में भिगोकर तथा सुखाकर प्रयोग करें । अपने कंधे के उपरने से अथवा धारण किए वस्त्र से देवताओं को न पोंछें ।
अ. देवताओं को पहले पंचामृत से स्नान करवाएं । इसके अंतर्गत दूध, दही, घी, मधु तथा शक्कर से क्रमानुसार स्नान करवाएं । एक पदार्थ से स्नान करवाने के उपरांत तथा दूसरे पदार्थ से स्नान करवाने से पूर्व जल चढाएं । उदा. दूध से स्नान करवाने के उपरांत तथा दही से स्नान करवाने से पूर्व जल चढाएं ।
आ़ तदुपरांत देवता को चंदन तथा कर्पूर-मिश्रित जल से स्नान करवाएं ।
इ. आचमनी से जल चढाकर सुगंधित द्रव्य-मिश्रित जल से स्नान करवाएं ।
ई. देवताओं को उष्णोदक से स्नान करवाएं । उष्णोदक अर्थात् अत्यधिक गरम नहीं, वरन् गुनगुना पानी ।
उ. देवताओं को सुगंधित द्रव्य-मिश्रित जल से स्नान करवाने के उपरांत गुनगुना जल डालकर महाभिषेक स्नान करवाएं । महाभिषेक करते समय देवताओं पर धीमी गति की निरंतर धारा पडती रहे, इसके लिए अभिषेकपात्र का प्रयोग करें । संभव हो तो महाभिषेक के समय विविध सूक्तों का उच्चारण करें ।
ऊ. महाभिषेक के उपरांत पुनः आचमन के लिए ताम्रपात्र में जल छोडेें तथा देवताओं की प्रतिमाओं को पोंछकर रखें ।
७. सातवां उपचार : देवता को वस्त्र देना
देवताओं को कपास के दो वस्त्र अर्पित करें । एक वस्त्र देवता के गले में अलंकार के समान पहनाएं तथा दूसरा देवता के चरणों में रखें ।
८. आठवां उपचार : देवता को उपवस्त्र अथवा यज्ञोपवीत (जनेऊ देना) अर्पित करना 
पुरुषदेवताओं को यज्ञोपवीत (उपवस्त्र) अर्पित करें ।
९-१३. नौंवे उपचार से तेरहवें उपचारतक, पंचोपचार अर्थात देवता को गंध (चंदन) लगाना, पुष्प अर्पित करना, धूप दिखाना (अथवा अगरबत्ती से आरती उतारना), दीप-आरती करना तथा नैवेद्य निवेदित करना ।
नैवेद्य दिखाने के उपरांत दीप-आरती और तत्पश्चात् कर्पूर-आरती करें ।
१४. चौदहवां उपचार : देवता को मनःपूर्वक नमस्कार करना
१५. पंद्रहवां उपचार : परिक्रमा करना
नमस्कार के उपरांत देवता के सर्व ओर परिक्रमा करें । परिक्रमा करने की सुविधा न हो, तो अपने स्थान पर ही खडे होकर तीन बार घूम जाएं ।
१६. सोलहवां उपचार : मंत्रपुष्पांजलि
परिक्रमा के उपरांत मंत्रपुष्प-उच्चारण कर, देवता को अक्षत अर्पित करें । तदु पूजा में हमसे ज्ञात-अज्ञात चूकों तथा त्रुटियों के लिए अंत में देवतासे क्षमा मांगें और पूजा का समापन करें । अंत में विभूति लगाएं, तीर्थ प्राशन करें और प्रसाद ग्रहण करें ।
मानवीय अंतःकरण में सत्प्रवृत्तियों, सद्भावनाओं, सुसंस्कारों के जागरण, आरोपण, विकास व्यवस्था आदि से लेकर महत् चेतना के वर्चस्व बोध कराने, उनसे जुड़ने, उनके अनुदान ग्रहण करने तक के महत्त्वपूर्ण क्रम में कर्मकाण्डों की अपनी सुनिश्चित उपयोगिता है । इसलिए न तो उनकी उपेक्षा की जानी चाहिए और न उन्हें चिह्न पूजा के रूप में करके सस्ते पुण्य लूटने की बात सोचनी चाहिए । कर्मकाण्ड के क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठना या उन्हें एकदम निरर्थक मान लेना, दोनों ही हानिकारक हैं । उनकी सीमा भी समझें, लेकिन महत्त्व भी न भूलें । संक्षिप्त करें, पर श्रद्धासिक्त मनोभूमि के साथ ही करें, तभी वह प्रभावशाली बनेगा और उसका उद्देश्य पूरा होगा ।

Saturday, August 10, 2019

सावन और उद्गगीत

धरा की नैसर्गिक सौन्दर्यता देख लोक की मनः भावना करोड़ो-करोड़ मुखों से पावस गीतों के रूप में फूट पड़ती है | वर्षा ऋतू में भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कजरी, हिन्दुली, चौमासा,  सावन गीत ,वन्य प्रदेशों में टप्पा, झोलइयां, मलेलबा  आदि तमाम तरह के मधुर गीतों से प्रकृति गुंजायमान हो जाती है |
लेकिन ये गीत आए कहां से इन्हें किसने रचा....?

उपनिषद के रचयिताओं ने उद्गगीत  का सृजन किया उनका संबंध अन्न प्राप्ति के विचार से ही था असल मे  उद का अर्थ था श्वास ,गी का अर्थ था वाक्र और था का अर्थ था अन्न अथवा भोजन।(लोकायत)
अन्न पर स्थित सारे विश्व की मंगलकामना करने का विचार ही कितना मनमोहक है।

ऋतु प्रेम, उल्लास, उछाह साथ ही करुणा की अभिव्यक्ति की ऋतू है ऐसी ही किसी ऋतु में रिमझिम बारिश में डूबे खेत, हरियाली का दुशाला ओढ़े पर्वत, कल - कल करती नदियां और झूमते दरख्त ऐसे में श्रम में लीन किसी तरुनी ने काले- काले बादलों के समूह को जाता देख तान छेड़ी होगी जिसमे प्रेम के साथ-साथ विरह भी था और थी कहीं न कहीं अन्न प्राप्ति की भावना जो श्रम की थकान से मुक्ति का मनोविज्ञान भी था।

इस सुंदर धरती पर अपना जीवन खुद गढ़ने का अद्भुत वरदान ईश्वर ने मानव को दिया है इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम इस धरती को मौसम के अनुकूल रहने दे तभी सावन आएगा बादल छाएंगे और तरुणी गा उठेगी---   


रसे रसे पानी बरसे हुलसे है परान 
रसे रसे बाढ़े, खेतवा में हरियर धान
रसे रसे बोले धनिया रसभरी बतिया   
रसे रसे भीजे, पोरे पोरे देहिया जुड़ान  

मटियारी गीत और निरबंसियों की कथा ठहर कर सुनने के लिए प्रकृति को सुनना जरूरी है 
बादर बुनियाते रहे... मानस  .. के स्वर और तेज होते रहे बस प्रकृति से यही कामना है--

'घन घमंड नभ गरजत घोरा ...प्रिया हीन डरपत मन मोरा' ।


Friday, July 19, 2019

ज़रा पढ़ना दिल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता

बचपन में मालवा के बिताए सालों में मां के साथ जब भी बाज़ार जाती थी तो काकीजी के हाथ से बनी डबल लौंग सेव खाना कभी नही भूलती वो मुझे इतने पसंद थे कि उनके लिए मैं कुछ भी छोड़ सकती थी। लेकिन खाते ही जो मुंह जलता सो बस की बोलती बंद ।
जबान की बोलती बंद आंखे बोलती वो भी आंसुओ की भाषा.... तब काकी रामजी की मूरत के सामने से मिश्री की डली उठा कर मेरे मुहं में रख देती... अब दोनों स्वाद मेरी जबान पर होते।
मिश्री की डली  मैं ने भी उठा कर अपने मुंह में रखी मुझे क्या पता था डबल लौंग वाले सेव का स्वाद भी चला आएगा....😊 
बाप रे बाप तुम्हारा गुस्सा पहली बार जब मेरा इससे सामना हुआ तो... तुम किसी को डांट रहे थे और मैं अंदर ही अंदर कांप रही थी कुछ कहना चाहती थी लेकिन सब भूल गई थी समझ नही आ रहा था पहली बार मोहिनी मुस्कान लिए जो मिला था वो क्या यही है....। लो मैं कहां फंस गई।😊
मिश्री की डाली कब की घुल गई थी अब केवल लौंग का स्वाद ही जुबा पर था। लेकिन प्यारा था।
न तुम भाई, न बंधु, न सखा न...।
लेकिन मन साध रहा था शायद कोई रिश्ता....।

गंगा के मैदान पर पहली बार तुम्हें देखा तो जाना फाल्गुन पंचाग का अंतिम महीना नही पहला महीना होता है
कुछ था जो मन से चित्त की तरफ चलने लगा था ।
आसमान कितना ऊपर था धरती कितनी नीचे कुछ पता ही नही चला जैसे हर तरफ क्षितिज ही क्षितिज....जाती ठंड मुझ में एक सिहरन छोड़े जा रही थी।

अजीब जगह थी जहां तुम मिले थे वहां अलसाई सुबह थी उदास शाम थी और तन्हा रात ,लेकिन रात की सारी उदासी सुबह की मीठी आवाज़ में गुम हो जाती... कितनी कशिश थी उस बुलावे में.... उफ़्फ़

दोपहर की रौनकों का कस्बा है ये जगह जहां एक दिन दोपहर में मैं ने तुम्हारी आहट को पहचाना था आहट क्या थी रिफ़त- ए- चाहत थी जो लम्हा लम्हा रूह में समा रही थी.... पल पल रहत में दिन निकल रहे थे।
धूप के साए कम होने लगते थे कि फिर आने के लिए तुम चले जाते और मैं तुम्हें देखती उसी खिड़की से । बस उसके बाद शुरू होता तुम्हें देखने का सिलसिला तुम्हारा आना पल पल देखती ये जानते हुए भी कि तुम अभी नही आओगे।
 तुम्हारे आने की आहट कैसे तो मन मे गुदगुदी लाती मैं अपने को बमुश्किल संभाल पाती....।

फ़क़त बिजनिस में उलझे तुम, तुम कविता लिखने वाली लड़की के मन की बात पता नही समझते थे या नही लेकिन  डूबता सूरज दिखाने पर तुम्हारी मुस्कान गहरी होती ।कभी कभी मेरी कुछ कविता सी बातें पढ़ते तुम मुझे कोई और ही लगते.... तुम भी अब रच रहे थे ,कविता नही मुझे और  मैं रच रही थी पल- पल हर पल मन में पलते तुम्हारे अहसासों को।
कैसे तुम्हें बताती कि तुम्हारे साथ बिताए पल सितारों की तरह टंक गये है मेरे अंतस में या 
कि मेरी सीधी- सुलझी बातें और तुम्हारा उलझे- उलझे मुझे देखना 
कि मेरी ढेर सी अभिलाषाएं कि तुम्हारी विवशताएं....।
कि वो दो आंखे जो मुझे सच बयान करती थी और जिन्हें मैं चूमना चाहती हूं मरने से पहले।
 कि तुम्हारे सामने  झुकता मेरा सर लाज थी  उस प्यार की जो अब मन से चित्त में उतर चुका था। 
कि जब भी मैं तुम्हारे पीछे- पीछे चलती मैं मन ही मन रचती अपने अंदर पग पग तुम्हारे प्यार को  ..।

ढलता हुआ सूरज मैं देखा करती और तुम अपने लैपटॉप में काम करते रहते शायद खुद से मुझ से बेख़बर और मैं हर लम्हा संभाल रही होती इस आशा में कि कभी तो तुम उन अहसास से गुजरोगे जिन से मैं गुजर रही हूं।
प्रेम तो प्रकृति है
ये कोई व्यवहार थोड़ी है कि,
तुम करो तो ही मै भी करू

तुम्हारी आहट से धड़कते इस दिल मे ढ़ेरो स्पर्श लिए मैं जा रही हूं ये जानते हुए कि हमारे बीच मे कोई वादा नही वादा जैसा कोई रिश्ता नही फिर भी कुछ ख्वाहिशें थी , थे कुछ सपनें भी जो मैं ने अंजाने ही में खुली आंखों से देखे थे ।
यकीन करो मेरा में ने आंखे बंद भी की लेकिन न जाने कब कैसे तुम उनमे समा गये।
पता ही नही चला....।

ख्वाहिश थी कि हल्की बारिश में एक लंबी सड़क पर तुम मेरा हांथ पकड़ कर चलो और बारिश की बूंदे हमारे तन मन को भिंगो दे 
कि तुम बाइक चलाओ और मैं तुम्हारे पीछे बैठी तुम्हारी पीठ पर अपना सर रखें तुम्हें रूह तक महसूस करूं।
कि किसी गुमनाम से थियेटर में हम साथ- साथ हो और लाइट बंद होते ही हौले से तुम मेरा हांथ थाम लो 
कि मैं तुम्हें सोता हुआ देखूं.....।
कि कभी- कभी तुम्हारी डांट खा कर बच्चों की तरह तुमसे ही  लिपट जाऊं
कि किसी दिन मैं इठलाकर तुम से रंग बिरंगी चुड़िया लेने के लिए कहूं और तुम उन्हें ले कर मेरे हांथो में पहना दो 
कि तुम्हारे नाम की मेहंदी लगा कर तुम्हें दिखाऊं 
कि तुम किसी चांदनी रात में मोगरे की वेणी धीरे से मेरे बालों में लगा दो ।
तुम जानते हो न मुझे सफेद रंग पसंद है.....।
कि किसी दिन दूर कहीं किसी जगह तुम्हारी पीठ पर अपने प्यार का चुम्बन टांक दूं 
कि....।
ख्वाहिशों का क्या ... जानती हूं मौन का धर्य साथ लेकर चलना ही होगा इस अधूरे प्रणय बंध में किस ठौर कहां तुमको जोडू ,बोलूं तो क्या बोलूं।

अब विदा लेती हूं दोस्त विदाई के इन पलों के शुक्रिया करना चाहती हूँ शुक्रिया करना चाहती हूँ उस आहट का जिसके आने से जीने की उमंग आती थी, जिंदगी में सलीका आता था, आती थी रोहानी खुशबू और आता था अपने को शेष रखने का भाव।
यहां से सिर्फ मैं नही जाऊंगी दोस्त 'हम' जाएंगे कहां छोड़ा तुमने कभी अकेला न अलसाई सी सुबह में न भींगती रातों में न पूर्ण चांद में न अमावस में।अब हर पल तुम मेरे साथ ही रहोगे ।

जानती हूं जीवन की आपा-धापी गंगा छोड़ते ही शुरू होगी लेकिन इस बार इस आपा-धापी में पुर-सुकूँ मिलेगा
चांद अब पूरी कलाएं दिखाएगा अमावस की काली रातें मेरे हिस्से नही होंगी।

अब विदा लेती हूं दोस्त तुम्हारी प्यारी सी मुस्कान से, इंतज़ार करती रहूंगी कि मुस्कान से बोल फूटे और तुम वो कहा दो जो में सुनना चाहती हूँ।
विदा अब शायद अलविदा।

Thursday, July 11, 2019

प्रकृति संवर्धन और संरक्षण

'स्नो पियर्सर' के अमेरिकी डिस्ट्रीब्यूटर टॉम क्विन का कहना है, जलवायु परिवर्तन के बाद की स्थितियों को दिखाने वाली फिल्म नई पीढ़ी को प्रभावित करें तो शायद बहुतायत में लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो ।

 गॉडजिला बनाने वाले एडवड्रस का कहना है, 'गॉडजिला' जैसी फिल्म हमने जो कुछ किया है, उसका काल्पनिक दंड है। अगर हम ऐसा ही करते रहे तो वास्तविक दंड मिलेगा।

बात सही भी है जिस तेजी से पर्यावरण में बदलाव देखने को मिल रहा है, तब वो दिन दूर नही कि सारे मौसम  अपना रास्ता ले लेंगें, सिर्फ एक को छोड़ कर, चाहे वो हिम युग हो, जल युग हो या तपता सूरज।

स्टीफ़न हॉकिंग कहते है- 'मानव समुदाय इतिहास के सबसे ख़तरनाक समय का सामना कर रहा है ।

हमारे पास पृथ्वी की बरबादी की तकनीकें तो बड़ी संख्या में आ गई हैं, लेकिन इनसे बचने की तकनीकों का विकास नहीं हो सका है ।

यदि ज़ल्दी ही पर्यावरण और तकनीकी चुनौतियों से निपटने का तरीक़ा ईज़ाद नहीं किया गया तो परिस्थितियाँ बदतर हो जाएँगी और पृथ्वी के बरबादी के निकट होगी ।
इसलिए अब विश्व को उच्चतर जीवन शैली को त्यागना होगा, क्योंकि आजीविका के संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं ।'' 
अपनी भौतिकवादी प्रवत्तियों से किनारा कीजिए ।
पर्यावरण को लेकर जागरूक हो और दूसरे को भी करें।

पर्यावरण पर जागरूकता मिशन पर लगी पत्रिका प्रकृति दर्शन है । ये त्रैमासिक पत्रिका है ,जो मुरादाबाद से निकलती है ।
इसके संपादक संदीप कुमार शर्मा जी है, जिन्होंने इस पत्रिका के द्वारा प्रकृति दर्शन अभियान चला रखा है ।
जिसको इन्होंने नाम दिया है "आओ सुधारें अपनी प्रकृति" जिसमे इन्होंने प्रमुख बिंदु पर अपनी पत्रिका 'प्रकृति दर्शन के माध्यम से आवाज़ उठाई है।
जिसमे इन्होंने कहा है-

1. नेशनल वाटर एक्ट बनाया जाए
2.वाटर-हार्वेस्टिंग एक्ट के गठन किया जाए
3. राष्ट्रीय वैन सरंक्षक, अंकेक्षण अधिनियम व आयोग का गठन हो।
4. पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य की जाए।

ये पर्यावरण संतुलन के लिए अहम सुधार है जिसमे हमारी, आपकी भागीदारी जरूरी है अगर आप भी पर्यावरण बेहतर बनाना चाहते है तो आदरणीय प्रधानमंत्री जी को इस संदर्भ में जरूर लिखें।
प्रकृति यशस्वी हो ये कामना के साथ उसके यशस्वी होने के उपाय भी करें।








Wednesday, May 8, 2019

मानवता की रक्त शिराएं हमारी नदियां


कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ।।
तो क्या शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १३ वें श्लोक में स्तुतिकार रावण अविरल प्रेमयुक्त तरल-सरल भावों के साथ अपने मन की साध को प्रकट करता है ।
नदियों की ऐसी क्या महिमा है कि सोने की लंका वाला रावण भाव-भीने मन से, खोया हुआ  नदी के तट के निकट किसी कुञ्ज-कुटीर में वास करता करना चाहता है अपनी दुर्बुद्धि से मुक्त होना चाहता है।
प्रस्तुत श्लोक  से हो यही लगता है कि हमारी प्राचीन नदियों के तट पर रहने से मन में छिपी आसुरी वृत्तिया शिथिल अथवा विनष्ट करती है एवं शुभ विचारों का मन में उदय करती है और ऐसी स्थिति में यह सोच भी अवश्यम्भावी हो जाती है कि क्या नदियां जादुई होती है जिनके जादू से दुष्ट वृत्तियां उभर कर मन-बुद्धि को दूषित व उद्वेलित नहीं होने देती या जल का संबंध मानव से सिर्फ शरीर का नहीं मन का भी होता है।   रावण द्वारा ‘निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे’ कहना ध्यातव्य है कि भारतीय संस्कृति में जल व जलाशयों की महत्ता पुरातन काल से स्वीकार की जाती रही है तभी तो रावण गंगा के कछार में , कूल के कुञ्ज-कानन में बसने की बात करता है।
नदियां कई कालखण्डों के इतिहास को अपने हृदय में समेटे है । किस मर्यादा पुरुषोत्तम ने अपनी पत्नी का परित्याग किया  किन बच्चों ने माता के परित्याग का प्रतिकार लिया था।
इतिहास बताता है कि किस नदी तट पर बसी बस्तियों से मिले अवशेष तथा इन अवशेषों की कहानी केवल किसी सभ्यता से नहीं जुड़ी बल्कि हिन्द की उन्नति से जुड़ी है
किस प्रकार उसके तट पर अनेक ऋषियों ने अपने आश्रम स्थापित किये, किस प्रकार इस क्षेत्र में कथाओं का सूत्रपात हुआ किस भांति उसके ही क्षेत्र में पौरोहित्य का विश्वविद्यालय स्थापित हुआ?
किसी रणछोड़ के अग्रज ने अपने अपराध का प्रायश्चित किया।
किस तरह से तथागत ने इसके तट पर विश्राम किया और धम्म पद के उपदेश दिये?
एक महान सम्राट की लाल चीवर धारी शांति सेना अपने नृपति के आदेशों-संदेशों के साथ इसके कूलों के किनारों से आगे बढ़ते हुए आत्ममुग्ध भाव से गुजरी थी।
कैसे एक विदेशी पर्यटक ह्वेनसांग धम्म सभा में सम्मलित होने के लिए थेरी गाता हुआ जिसके तट से गुजर था वो भी उसे याद है। 
किस प्रकार धम्म सभा में उपद्रव करने के बाद कुछ लोग उसको  पार करके उत्तरांचल की ओर प्रस्थान किए थे तब राजा की सेनाएं नदी के तट पर आकर उनकी खोज में काफी समय भटकती रह गयी थी।
किसी मुगल अकबर ने यहां पर वाजिपेय यज्ञ कराने के लिए एक लाख रुपये यहां के ब्राह्मणों को दिये और गोमती का तट यजु:वेद की ऋचाओं सेगूंज उठा। इसके बाद अपनी विभेद कारी नीति के तहत विप्रों की मर्यादा आंकी गयी।
तो क्या नदियां हमारी मानवीय चेतना को प्रभावित करती है ? अगर है तो हमें इन्हें मानवीय दर्जा दे देना चाहिए।
नदियों के नामकरण तो यही कहते है
एददः सम्प्रयती रहावनदता हते।
तस्मादा नद्यो3नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः।।
(सन्दर्भ ग्रंथ: अथर्ववेद, तृतीय काण्ड, सूक्त-13, मंत्र संख्या - 01)
“हे सरिताओं, आप भली प्रकार से सदैव गतिशील रहने वाली हो। मेघों से ताडि़त होने, बरसने के बाद, आप जो कल-कल ध्वनि नाद कर रही हैं; इसीलिये आपका नाम ’नदी’ पड़ा। यह नाम आपके अनुरूप ही है।’’
नदियों के नामकरण के भिन्न आधार दिए गए हैं। अधिकांश नदियों के नामकरण उनके गुण, वंश अथवा उद्गम स्थल के आधार पर किए गए हैं।
भारत के विविध भागों में प्रवाहित इन नदियों को देवी-देवताओं से समीकरण स्थापित किया जाता है यथा: गंगा – भगवान शिव, गोदावरी – श्री राम, यमुना – श्री कृष्ण, सिंधु – श्री हनुमान, सरस्वती – भगवान गणेश, कावेरी – भगवान दत्तात्रेय, नर्मदा – देवी दुर्गा।
ऐसी स्थिति में हमें इनके सन्दर्भ में पुनः विचार करना होगा शायद ये विचार एक पूरी सभ्यता को पुनःमानव बनाने की कवायद होगी।
एक नदी को हम क्या दे सकते है ?आपने कभी सोचा है या एक नदी आज के दौर में हमसे क्या चाहती है ?
प्रश्न बड़ा गंभीर है जिसके उत्तर भी हमें गंभीरता से ही देने होंगे और अगर हम ऐसा नहीं करते तो मानव सभ्यताओं को विलुप्त होते देर नहीं लगेगी।
नदी सिर्फ जीवन चाहती है वो चाहती है कि मानव सभ्यता के साथ- साथ उसके अंदर पलने वाले प्राणियों को बेहतर जीवन मिले लेकिन ऐसा है नहीं देश की समस्त नदियां प्रदुषण का शिकार है ।
एक सर्वेक्षण के अनुसार ज्यादातर नदियों के जल के एक लीटर में ऑक्सीजन की मात्रा इस समय 0.1 घन सेमी रह गई है जबकि 1940 में औसतन यह 2.5 घन सेमी थी। 
कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, भागलपुर, कोलकाता-जैसे कई बड़े-बड़े नगर गंगा के किनारे बसे हुए हैं। इन नगरों में अनेक कल-कारखाने हैं। शहरों का मल-जल तथा उद्योगों के अपशिष्ट बिना शोधन के गंगा मे प्रवाहित किये जाते हैं। इसका उपयोग जल-मार्ग की तरह भी किया जा रहा है। गंगा एवं इसकी सहायक नदियों पर बांध बनाकर इसके जल को नहरों में ले जाया जा रहा है। गंगा और सहायक नदियों पर बनाये गये तटबंध गंगा के पारिस्थितिकी तन्त्र पर काफी बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। फलत: इसकी जैव-विविधता में तेजी से ह्रास हुआ है। 
जैव विविधता में ह्रास के दो मुख्य कारण हैं-
1. जीवों का अधिक शिकार या दोहन एवं
2. जीवों के वासस्थान का विनाश।
अधिक शिकार के कारण गंगा में पायी जाने वाली डाल्फिन, घड़ियाल, उदविलाव और मुलायम आवरण वाले कछुए कई क्षेत्रों से विलुप्त हो गये हैं। अन्य क्षेत्रों में ये विलुप्ति के कगार पर हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण रोहू, कतला, नैनी-जैसी प्रजातियों के लिए गंगा का दियारा बरसात के मौसम में प्रजनन क्षेत्र होता है। दियारा में पहले प्राकृतिक रूप से उगने वाली वनस्पतियाँ होती थीं। अब सम्पूर्ण दियारा क्षेत्र में खेती हो रही है। खेती में कीटनाशकों और रासायनिक खादों का इस्तेमाल हो रहा है। इन जहरीले पदार्थों के कारण मछलियों के अंडे से बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं। इस तरह वासस्थान के जहरीला होते जाने और अंधाधुन्ध शिकार के कारण मछलियों में तेजी से ह्रास हुआ है।
वैश्वीकरण के दौर में मछलियों की कई विदेशी प्रजातियाँ भारत में आ रहीं हैं। इनके प्रभाव से गंगा भी अछूती नहीं है। दो दशक पहले तक (1993-95 ई.) गंगा में पटना के आस-पास एक भी विदेशी मछली नहीं पायी गयी थी। लेकिन 2007-09 में विदेशी मछलियों की लगभग दस प्रजातियाँ यहाँ पायी गयीं। ये विदेशी मछलियाँ स्थानीय मछलियों के लिए खतरनाक हैं। 
इस ह्रास के भी कई कारण हैं। इनमें सबसे प्रमुख है प्रदूषण एवं जल प्रवाह की कमी। शहरों से बिना शोधन के जल-मल को सीधे गंगा में गिराया जा रहा है। प्रतिदिन लगभग 13,000 मिलियन लीटर जल-मल गंगा के किनारे वाले शहरों में जनित होते हैं। मगर, मुश्किल से 4,000 मिलियन लीटर जल-मल के शोधन की व्यवस्था हो पायी है।
इसी तरह कल-कारखानों से प्रतिदिन 260 मिलियन लीटर बहि:स्राव निकलता है। इसका अधिकांश भाग बिना शोधन के गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। घरेलू एवं औद्योगिक बहि:स्राव के कारण गंगा काफी प्रदूषित हो गयी है।
कृषि एवं स्वास्थ्य क्षेत्र को उपयोग में लाये जाने वाले डी.डी.टी., टी.सी.एच, बी.एच.सी. और इण्डोसल्फान आदि कीटनाशक बरसात के महीने में बहकर गंगा में आ जाते हैं। गंगा का जल एवं पारिस्थितिकी तन्त्र इन जहरीले रसायनों से प्रदूषित हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 3,000 टन कीटनाशक प्रति वर्ष गंगा में प्रवाहित हो रहे हैं। कीटनाशकों के अलावा पालीक्लोरिनटेड, बाईफनाईल, परक्लोरिनेटेड- जैसे रसायन भी गंगा में पाए गए हैं।
सोचिए अगर ये हालत भारत देश की सबसे पवित्र नदी मानी जाने वाली गंगा की है तो अन्य नदियों का हाल कैसा होगा ? क्या करें जिनसे हमारी नदियां प्रदूषण से बचे ? क्या हमें उन्हें जीवित दर्जा दे देना चाहिए?
एक नदी की इंसान बनने की कहानी --------------------------------------------
देखा जाए तो ये बुरा भी नहीं अगर ये नदियां हमें जीवन देती है जीवनदायनी है तो इन्हें ये दर्जा मिलने ही चाहिए।
नदी को जीवित का दर्जा दिए जाने का मतलब है, उसे वे सभी अधिकार दे देना, जो किसी जीवित प्राणी के होते हैं। नदी का शोषण करने, नदी को बीमार करने और नदी को मारने की कोशिश करने जैसे मामलों में अब क्रिमिनल एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। नदी पर किए गए अत्याचारों के मामले मानवाधिकार आयोग में सुने जा सकेंगे।
भारतीय संस्कृति के आलोक में देखें, तो नदी इतने गुणों का बहाव दिखती है कि लगता है कि सभी सद्गुण तो नदिया के भीतर-बाहर छिपे बैठे हैं।
नदिया-गुणिया एकधन, जो खोजे, सब पाय।
आइये तो खोजें आखिर नदियों में किस तरह और कितने मानवीय गुण है-
प्रहवामाय ,बलशाली,क्रियाशीलता,सक्रिय तत्व की उपस्थिति,क्रिया शक्ति,रसवती-स्पर्शवती आदि
ऋगवेद के सातवें मण्डल में नदी के निरन्तर प्रवाह की स्तुति की गई है। स्पष्ट है कि प्रवाह की निरन्तरता, किसी भी नदी का प्रथम एवम् आवश्यक गुण है। प्रवाह की निरन्तरता बहुआयामी होती है यही नदी का गुण है। किसी एक भी आयाम में हम निरन्तरता को बाधित करने की कोशिश करेंगे; नदी अपना प्रथम और आवश्यक गुण खो देगी। इसके दुष्प्रभाव कितने व्यापक हो सकते हैं; इसका आकलन आज हम कोसी, गंगा, नर्मदा जैसी कई प्रमुख नदियों के आयामों में मनुष्य द्वारा पैदा की गई बाधाओं के परिणामस्वरूप नदी जल की गुणवत्ता तथा जल, रेत, गाद, वेग तथा नदी के बदले रुख से समझ सकते हैं।
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्व श्रवा भवत वजिनः।
देवीरापो यो व ऽऊमिः प्रतूतिः ककुन्मान् वाजसास्तेनायं वाज सेत्।।
यजुर्वेद (नवमध्याय, मंत्र संख्या-छह) में लिखे इस श्लोक का भावार्थ है कि जल के अन्तःस्थल में अमृत तथा पुष्टिकारक औषधियाँ मौजूद हैं। अश्व यानी गतिशील पशु अथवा प्रकृति के पोषक प्रवाह इस अमृत और औषधिकारक जल का पान कर बलवान् हों। हे जलसमूह, आपकी ऊंची और वेगवान तरंगे हमारे लिये अन्न प्रदायक बनें।
वैज्ञानिक दृष्टि भी यही कहती है कि नदी तभी बलवान होती है, जब उसका जल मृत न हो यानी प्रवाह में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया सतत् होती रहे। गुणवान होने के लिये औषधियों से संसर्ग करने आने वाले जल का नदी में आते रहना जरूरी है।
नदी, सिर्फ जल नहीं है; लेकिन जलमय है और यही गुण नदी में क्रियाशीलता लाता है अतः क्रियाशीलता को नदी का गुण कहना गलत नहीं।
अथर्ववेद -(काण्ड तृतीय, सूक्त 13, मंत्र संख्या - एक ) में जलधाराओं में सृष्टि के मूल सक्रिय तत्व का आहृान किया गया है।
सृष्टि के शाब्दिक अर्थ पर जायें तो ‘सृष्टि’ शब्द का मतलब ही है, रचना करना। शाब्दिक अर्थ को सामने रखें, तो रचनात्मक सक्रियता को नदी का एक अपेक्षित गुण मानना चाहिए। सृष्टि कर्म देखें तो सृष्टि में रचना के बाद विनाश और विनाश के बाद रचना सतत् चलने वाले कर्म हैं। इस दृष्टि से नदी में रचना और विनाश तत्व की सक्रिय मौजूदगी की अपेक्षा करनी चाहिए। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि नदी में जहाँ एक ओर शीतल तत्व मौजूद होते हैं, वहीं ऊर्जा उत्पन्न करने लायक ताप और वेग भी मौजूद होता है। नदीजल जीवन भी देता है और आवश्यक होने पर विनाश करने की भी शक्ति रखता है।
भारत में आज कितनी ही नदियाँ ऐसी हैं कि जिनमें इतना जल न के बराबर  है । कितनी ऐसी है जिनके सिर्फ निशान मौजूद हैं। उनमें न जल है और न जीवन। पृथ्वी पर उनकी रचना आंशिक ही है ।
कई नदियां तो नाले में परिवर्तित है तो कुछ अपने बीत चुके वैभव के साथ बीती बात हो चुकी है। जो है उनके पानी में क्रियाशीलता के आभाव में तेज नहीं।
अथर्ववेद -(काण्ड 03, सूक्त 13, मंत्र संख्या -दो) में जलधाराओं से कामना की गई है कि वे क्रियाशक्ति उत्पन्न कर उन्हे हीनता से मुक्त करेंगी तथा प्रगतिपथ पर शीघ्र ले जायेंगी।
इसका मतलब है कि नदी इतनी सक्षम होनी चाहिए कि वह हमारे भीतर ऐसा कुछ करने की शक्ति पैदा कर सकें, जिससे हमारी हीनता यानी कमजोरी मिटे और हम प्रगति पथ पर अग्रसर हों। इस नदी गुण को हम कृषि, उर्वरता वृद्धि, भूजल पुनर्भरण, भूजल शोधन तथा मैदान व डेल्टा बनाने वाले में नदी के योगदान से जोड़कर देखें।
नदी तो प्रेरणा है
यह नदी गुणाों का आध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष है। नदी कर्म में निरन्तरता, शुद्धता, उदारता व परमार्थ तथा वाणी में शीतलता की प्रेरणा देती है। नदियों से सीखने और प्रेरित करने के लिये कवियों ने संस्कृत से लेकर अनेक भाषा व बोलियों में रचनायें रची हैं। कभी उन्हे देखना चाहिए।
रूपा रस स्पर्शवत्य आपो द्रवः स्निग्धा:।
मनुस्मृति में किए उक्त उल्लेख का तात्पर्य है कि रूप, स, स्पर्शवान, द्रवीभूत तथा कोमल ‘जल’ कहलाता है; परन्तु इसमें जल का रस अग्नि और वायु के योग से होता है। स्पष्ट है कि ये सभी गुण, नदी के गुण हैं। नदी कोमलता का आभास देती है। नदी तरल होती है। नदी स्पर्श करने योग्य होती है। नदी में रस यानी जल होता है। नदी का अपना एक रूप होता है।
विचारणीय तथ्य यह है कि जल के ये गुण अग्नि और वायु के योग के कारण होते हैं। यह तथ्य हमें सावधान करता है कि जल हो या नदी, वायु और ताप से इनका सम्पर्क टूटने न पाये। पानी से बिजली बनाती परियोजनाएं नदी का वायु और ताप से संपर्क तोड़ देती है।
शीतलत एवं शांति दायक - एक नदी ही हो सकती है
हिमवतः प्रस्नवन्ति सिन्धौ समह संगम।
आपो ह महंन तद् देवीर्ददन् हृदद्योत भेषज्ञम्।।
अथर्ववेद (सूक्त 24, मंत्र संख्या-एक) का भावार्थ यह है
कि हिमाच्छित पर्वतों की जलधारायें बहती हुई समुद्र में मिलती हैं। ऐसी धारायें हृदय के दाह को शान्ति देने वाली होती है।
आज अशांति में जीते हम शांति का मर्म समझना ही नहीं चाहते ऐसे में एक नदी ही हमें इस गुण से परिचित करा सकती है।
ये गौर करने वाली बात है ये गुण हिम धाराओं के है जो पर्वतीय नदियों में मिलते है।
भारत के सांस्कृतिक ग्रंथों में जहाँ जल में ईश का वास माना गया है, वहीं नदियों को देवी तथा माँ का सम्बोधन दिया गया है। पौराणिक कथाओं में कहीं किसी नदी का उल्लेख किसी की पुत्री, तो किसी का किसी की बेटी, बहन अथवा अर्धांगिनी के रूप में आया है। नर्मदाष्टक में नर्मदा को हमारी और हमारी प्राचीन संस्कृति की माँ बताया गया है। यह प्रमाण है कि भारत का सांस्कृतिक इतिहास नदियों को जड़ न मानकर, जीवित मानता है। सांस लेना, गतिशील होना, वृद्धि होना, अपने जैसी सन्तान पैदा करना - किसी के जीवित होने के इन जैविक लक्षणों को यदि हम आधार मानें, तो हम पायेंगे कि नदी में ये चारों लक्षण मौजूद हैं।
नदियां मानवता की रक्त शिराएं हैं
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गौर करें कि तल, तलछट, रेत, सूक्ष्म एवम् अन्य जलीय जीव, वनस्पति, वेग, प्रकाश, वायु तथा जल में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया मिलकर एक नदी और इसके गुणों की रचना करते हैं। इसी आधार पर नदी वैज्ञानिकों ने प्रत्येक नदी को महज जल न मानकर, एक सम्पूर्ण जीवंत प्रणाली माना है। इसी आधार पर न्यूजीलैण्ड और इक्वाडोर में नदियों को जीवित का दर्जा मिला।
यह सिर्फ एक नदी को बचाने की कवायद नहीं है बल्कि मानव और प्रकृति के बीच के छीजते रिश्ते को मजबूत करने की कोशिश है. सहअस्तित्व का ये भाव सिर्फ भाषणों या सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उसे जमीन पर उतारकर दुनिया भर की नदियों का भविष्य संवारने का पैगाम दिया गया है. नदी को इंसानी अधिकार देना चौंकाता जरूर है लेकिन बहुत से जानकार मानते हैं कि ऐसे अभूतपूर्व तरीकों से ही तेजी से प्रदूषित हो रही दुनियाभर की नदियों की रक्षा की जा सकती है. उनके मुताबिक इस बात को भी समझने की जरूरत है कि नदियों को बचाने के परंपरागत तरीके उतने प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे।
नदियां मानवता की रक्त शिराएं हैं। नदियों के मरने का मतलब इंसानी सभ्यता का भी खत्म होना है.
नदी को जीवित का दर्जा दिए जाने का मतलब है, उसे वे सभी अधिकार दे देना, जो किसी जीवित प्राणी के होते हैं लेकिन क्या जीवित आम आदमी की तरह नदी भी न्याय मंगाते- मंगाते निराश हो ख़त्म तो नहीं हो जाएगी?
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सन्दर्भ ग्रंथ--
1.शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १३ वें श्लोक
2.अथर्ववेद, तृतीय काण्ड, सूक्त- 13, मंत्र संख्या- 01
3.यजुर्वेद, नवमध्याय, मंत्र संख्या-6
4.यजुर्वेद अध्याय 23 मंत्र 22
5.मनुस्मृति
6.अथर्ववेद सूक्त-24, मंत्र संख्या- 1
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