Tuesday, December 5, 2017

प्याली में तुफान

मानव समाज जब ताम्रयुग में पहुंचता है
संस्कृति जब ग्रामीण पृष्ठभूमि पर खडी
चरखे से बनाती है सभ्यताओं के विकास के धागे
जिन का छोर पकड़
प्राचीन जगत की नदीघाटी सभ्यताएं
नगरों की स्थापना के लिए
करती है प्रसव लिपियों का
तब ग्राम और नगर के बीच
एक स्वर धीरे धीरे पनपता है
जो व्यंजन में बदल
बॉस्टन हार्बर में
करता है विरोध अंग्रेज सरकार का
देता है साथ उपनिवेशवासियों  का
सारी दुनिया के गरीब, मजदूर, बेसहारा
का सहारा बन
पहुंच जाता है विदर्भ के गांवों में
दुमका की खदानों में
दंडकारणय  के जंगलों में
वादी-ए-कश्मीर की संगत में
बन जाता है सबका प्रिय अक्षर चाय
और क्यों न हो
शोंनोग जैसे ईश्वरीय किसान के प्याले से
जनता का जनता के लिए बन
राजा को रंक, रंक को राजा बना
उठा देता है प्याली में तुफान।

☕☕☕
चाय की चर्चा 😊

Monday, October 9, 2017

भाद्रपद के चाँद सा प्रेम

प्रेम की निर्जनता में उदासी हमेशा स्लेटी रंग की क्यों होती है?
यही पूछा था न मैं ने
और तुमने हस कर कहा था
बिना संकट के कुछ भी सार्थक की प्रति संभव कहां,
संभव तभी है
जब मन के पथ में दूसरे की गंध भरी हो
शारदीय धूप का केसरिया रंग किन्हीं अक्षांशो पर खिलाना ही होता है मयूख....
सच कहा था तुमने
प्रेम की परिणति तो पहुँच जाने में ही होती है
चाहे इतिहास बने या वर्त्तमान
बस इतना रहे की
मन की निर्जनता में भाद्रपद के चाँद सा झलकता रहे।

Friday, October 6, 2017

प्रेम पथ

प्रेम की निर्जनता में उदासी हमेशा स्लेटी रंग की क्यों होती है
यही पूछा था न मैं ने
और तुमने हस कर कहा था
बिना संकट के कुछ भी सार्थक की प्रति संभव कहां
संभव तभी है
जब मन के पथ में दूसरे की गंध भरी हो
शारदीय धूप का केसरिया रंग किन्हीं अक्षांशो पर खिलाना ही होता है मयूख....
सच कहा था तुमने
प्रेम की परिणति तो पहुँच जाने में ही होती है
चाहे इतिहास बने या वर्त्तमान
बस इतना रहे की
मन की निर्जनता में भाद्रपद के चाँद सा झलकता रहे।

Thursday, August 31, 2017

सहजता ही जीवन है

जिंदगी मौत भी एक उम्र में मालूम हुआ।
मेरा होना था महज़ मेरे न होने के लिए।।

स्व. कुंवर रघुवीरसिंह ने सच ही लिखा इस दुनिया में प्रत्येक चीज का मूल्य चुकाना पढता है और जो जीवन उसने दिया है उसका भी मूल्य वो मृत्यु से ले लेता है तभी तो कहा गया है जगत मिथ्या ।

स्पिनोजा ने भी लिखा है कि जो ईश्वर को प्यार करता है वह निश्चित न समझे कि ईश्वर भी उसे उतना ही प्यार करेगा।
मानव ईश्वर से अलग है वो आशा रखता है, मानव से भी ईश्वर से भी ,नहीं करेगा तो जायगा कहां ? आशा, निराशा के इस उतार-चढ़ाव के बंधी रस्सी पर चलते हम वो नट है जिसके खेल का आनंद कोई और ऊपर बैठा लेता है।

आज हमारी प्रवृतियों और हम में लड़ाई छिड़ी है यही हमारे जीवन की उलझन है। हम जिसे तर्क कहते है अच्छे-बुरे की पहचान कहते है और जिसे इस पहचान से असलियत समझने का दावा करने वाली बुद्धि कहते है वो इतनी उलझी है कि वो कल्याण नहीं अकल्याण करती घूम रही है।दूषित हो बजबजाने वाली वस्तु सड़न तो फैलाएगी ही और हम उस सड़न में अपने तर्कों की रस्सी से फंसे भटक रहे है।

जायज और नैतिक के बीच इतना बड़ा अंतर आ गया है कि इनके बीच व्यक्तिगत स्वार्थ आत्मकेंद्रित हो समाज की टोपी के नीचे ''कीमत की आंक'' छिपाकर अव्यवस्था फैला कर खुश है।
फ़र्थ- समाज से आज तक एक ही प्रश्न कर रहा है तुम्हारे आदेश क्या है ? लेकिन समाज ,उसे युद्ध और बर्बरता से फुर्सत कहां । आस्टिन प्रयोग छोड़ कहीं से पुरानी न्यायसंगत परिभाषा ले बताते है समाज के नियमों के उल्लघंन के फलस्वरूप मिला दंड वही आदेश है।

आज विचारधारा बंदली है या हमने उनकी व्याख्या बदल दी जो भी हो हम आदेशों में उलझे प्राणी है आदेश स्पष्ट नहीं जीवन स्पष्ट नहीं ये समस्या यूं तो दिखाई वैसे नहीं पड़ती जैसी है लेकिन सबसे बुरी बात इसका हल अभी तो मानवजाति के पास नहीं।बस एक ही कोशिश होनी चाहिए हम मानव को मानव समझे।

आज की व्यापक अव्यवस्था कर्तव्य, कानून, धर्म में विभिन्नता आ जाने के कारण है, जिससे सभ्य समाज में असामंजस्य की स्थिति उत्पन्न की है लेकिन ये स्थिति सरल समाजों में नहीं है सो हे आधुनिक सभ्यता अपने सभ्यता के बोझ को थोड़ा-थोड़ा कम करो इसी में हम सबका कल्याण है।


Sunday, August 27, 2017

स्त्री स्वर्ग का फाटक

पीड़ा की नीव में दबी वासना सुखी हो उठी
जब जब स्त्री कराही ,चिल्लाई
और इस तरह बर्बर दंड ने जन्म लिया इस पृथ्वी पर
हर कराहने के बाद शिकारी बढते गए
पहला शिकारी कोई आदि अमानुष था

ढेंकुल ने मधुर वचनों के दंड में फरेब घोला
प्रेम की रस्सी से वासना का कुंड भरा
कुइयां अब रीती थी
ये बुद्धिजीवी थे

धर्म की कृपालु आत्माओं ने कहा
स्त्री तेरे शरीर में स्वर्ग का फाटक है
हम उसे स्वर्ग की कुंजी से बंद करेंगे
तब वो विभिन्न धर्मों के साथ
स्वर्ग की कुंजी से ताले जड़ते गये
ये धर्म के ठेकेदार थे

वेश्यालयों की दीवारें धर्म के पत्थरों से सजी थी
मंदिर अक्षत योनि से
फिर सारे बर्बर दंड
कराहने ,चिल्लाने से निकल कर
फैल गये धर्म ग्रंथों तक

कारागार खड़े हुए न्याय की नींव पर
सारी निर्दयता का अंत
स्त्री की जांघ पर जा बैठा
अब स्त्री की उतनी ही जरुरत थी
जितनी खाट की ,सवारी की, छत की।

स्त्री अब कोई चीज बड़ी है मस्त मस्त थी।