Friday, June 17, 2022

आषाढ़ की आस

 आषाढ़ बनकर ही अधर के पास आना चाहता हूं

मैं तुम्हारे प्राणों का उच्छ्वास पाना चाहता हूं।💚

■■■

आषाढ़ तो धरती और अंबर का मिलन दिवस तो  आइए हम इस मिलन दिवस के गवाह बने, फागुन के लड़कपन और सावन के यौवन में डूबे आषाढ़ को धरती के ताप को हर लेने दीजिए। गर्मी की कसक को अगर कम करना है तो आषाढ़ को ठसक के साथ आने दीजिए इसलिए जरूरी है कि पर्यावरण को लेकर हम सब बेहद जागरूक हो जाएं।

तो ज्येष्ठ की रोहिणी की तप्तता को मृग की बौछार संतृप्त करें और प्रकृति हरीतिमा के गीत गाये, धारा- अंबर एक हो तभी तो किसी दूर गांव की हरियाली पर आषाढ़ की बून्दे देख कोई किशोरी अपनी सखी से कहेगी-

कारी सियाही बदरी, झक झालर आयो मेह

बरसे आषाढ़ी मेहरा,कोई कोई उत बालम परदेश।

■■■


Saturday, June 11, 2022

तपती धरती बदलता मौसम

सत्यम वृहदृमुग्नम दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवी धारयन्ति सा नो भूतस्य भव्यस्य पल्युमरू लोक प्रथिवी नः कृनोती ।

(पृथ्वी ने भूत काल में जीवों का पालन किया था और भविष्य काल में भी जीवों का पालन करेगी। इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के लिए विशाल स्थान प्रदान करे। ) 

आह्वान करते ऋषियों ने कहां सोचा था कि हम जिन पीढ़ियों के निवास के लिए पृथ्वी पर विशाल स्थान मांग रहे है उन्हें इस स्थान की कद्र ही नही होगी। वो पृथ्वी को अपना अस्थाई घर ही मानेंगे। आज सारी पृथ्वी रोष में है पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी, आकाश, जल,जंगल को प्रदूषित कर दिया है। पेड़- पौधे कट रहे है, वनस्पतियां खत्म हो रही है, कीट- पतंगे तितलियां गायब हो रहीं है। गौरैया मर रहीं है।

सावन में धमक नही ,फागुन में महक नही, , वसंत हताश है , भादों में बारिश की आस है।गंगा निराश है, यमुना उदास है । विकास के उद्योग से प्रकृति का विनाश है।

सयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार जीवाश्म ईंधन पर वर्तमान समाज की निर्भरता पृथ्वी को इस तेजी से गर्म कर रही है जो पिछले दो हजार वर्षों से अभूतपूर्व है। इसके प्रभाव के कारण वर्षा की कमी यानी सूखा, जंगल की आग, बाढ़ के रूप में देख सकते है।

आईपीसीसी के आंकलन के अनुसार ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन के कारण स्थितियां और भी गंभीर होने वाली है।  1850- 1900 के औसत की तुलना में पृथ्वी की वैश्विक सतह के तापमान में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है।

 जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं।कई प्रभाव अपरिहार्य हैं और दुनिया की सबसे कमजोर आबादी को सबसे ज्यादा प्रभावित करेंगे। तो पृथ्वी की जलवायु मानव अनकूल करने के लिए क्या किया जाए ? ये जानने के पहले आइए ये जान लें कि जलवायु परिवर्तन क्या है ?

जलवायु परिवर्तन मौसमी दशाओं के बदलाव को कहते है जो दीर्घ कालीन होता है । यानी  किसी विशेष स्थान के लिए आमतौर पर कम से कम 30 वर्षो के मौसम  का औसत पैटर्न होता है। मुख्य रूप से, सूर्य से प्राप्त ऊर्जा के कारण ही पृथ्वी की जलवायु का निर्धारण एवं तापमान का संतुलन निर्धारित होता है। यह ऊर्जा हवाओं, समुद्र की धाराओं एवं अन्य तंत्र द्वारा विश्व भर में वितरित हो जाती है तथा अलग- अलग क्षेत्रों की जलवायु को प्रभावित करती है।

 पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करती है और यही ऊर्जा इसकी सतह को गर्माती है। इस ऊर्जा का लगभग एक तिहाई भाग पृथ्वी को घेरने वाले गैसों के आवरण, जिसे वायुमंडल कहा जाता है, से गुजरते वक्त तितर-बितर हो जाता है। इस प्राप्त ऊर्जा का कुछ हिस्सा धरती और समुद्र की सतह से टकराकर वायुमंडल में परावर्तित हो जाता है। शेष हिस्सा, जो लगभग 70 प्रतिशत होता है, धरती को गर्माने के लिए रह जाता है। इसलिए, संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सौर ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी से वापस वायुमंडल में परावर्तित हो, वरना धरती असहनीय रूप से गर्म हो जाएगी। 

वायुमंडल में भी जलवाष्प और कार्बन डाइऑक्साइड सरीखी कुछ गैसें इस परावर्तित ऊर्जा के कुछ अंश को सोख लेती हैं जिससे तापमान का स्तर ‘सामान्य सीमा’ में रखा जा सके । इस ‘आवरण प्रभाव’ की अनुपस्थिति में पृथ्वी अपने सामान्य तापमान से 30 डिग्री सेल्सियस अधिक सर्द हो सकती है।

चूंकि जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें हमारे विश्व को गर्म रखती हैं, इसलिए इन्हें ‘ग्रीनहाउस गैसें’ कहा जाता है। यहां यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण हैं कि इस प्राकृतिक ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ की अनुपस्थिति में हमारे ग्रह का औसत सतही तापमान यहां जीवन के लिए प्रतिकूल होता और इस ग्रह पर भी जीवन की संभावना नही रहती।

जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरे--

◆ विश्व ने अपना कार्बन स्पेस दो तिहाई इस्तेमाल कर लिया है, जबकि पैतीस प्रतिशत जीवाश्म ईंधन के भंडार की खपत एवं वैश्विक जंगलों के एक तिहाई हिस्से को काटा गया है ।

◆ वर्ष 1750 के बाद से विकसित देशों ने ऐतिहासिक उत्सर्जन का 65 फीसदी के आस- पास उत्सर्जित किया है ।

◆कीप द क्लाइमेट, चेंज द इकोनॉमी के अनुसार पारम्परिक जीवाश्म ईंधन भंडार का उपयोग करके एवं जंगलो को एक तिहाई काटते हुए विश्व वातावरण से 2,000 Gtco2e बाहर निकाल चुका है।

◆हर साल लगभग दस बिलियन मैट्रिक टन कार्बन वायुमंडल में छोड़ा जाता है।

भारत में होने वाले खतरे---

◆वर्ष 2018 में एचएसबीसी ने दुनिया की 67 अर्थव्यवस्थाओं पर जलवायु परिवर्तन के खतरे का आंकलन किया उसमें कहा गया कि मौसम के बदलाव का भारत मे व्यापक रूप से असर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को क्षति हो सकती है जो कई लाख करोड़ तक जा सकती है।

◆जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव कृषि पर होगा क्योंकि भारतीय कृषि मानसून पर आधारित है । जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून में अनिश्चितता उत्पन्न होगी असामान्य  मानसून के कारण कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसी स्थितियों का सामना करना होगा ।

◆भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार प्रति एक सेंटीग्रेट तापमान बढ़ने पर गेहूं के उत्पादन में चार से पांच मिलियन टन की कमी होती है। इसके साथ ही परागणकरी कीटों जैसे तितलियों, मधुमक्खियों की संख्या में कमी से कृषि उत्पादन नकारात्मक रूप में दिखाई देगा।

◆ जलवायु परिवर्तन पर भारत सरकार की अब तक की पहली रिपोर्ट कहती है कि सदी के अंत तक ( 2100 तक) भारत के औसत तापमान में 4. 4 डिग्री की बढ़ोतरी हो जाएगी जिसका सीधा असर लू के थपेड़ों और चक्रवर्ती तूफानों की संख्या बढ़ने के साथ समुद्र के जल स्तर के उफान के रूप में दिखाई देगा। मौसम विस्मित है और शायद रूठा हुआ भी । हवा में co2 का स्तर बढ़ रहा है तापमान में वृद्धि हो रही है, ग्लेशियर पिघल रहें है। ढेरों प्रजातियां खतरें में है। सांस को आस नही है, तो अब क्या करें ? आइए छोटी- छोटी कोशिशों से इस खतरनाक प्रक्रिया को धीमा करें और उम्मीद रखें कि मौसम एक बार फिर खुशगवार होगा। 

◆कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने, हवा की गुणवत्ता में सुधार करने, तापमान को कम करने, जैव विविधता को सरंक्षित करने के लिए पेड़ लगाइए। ये साधारण लग सकता है लेकिन ये पर्यावरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 

◆कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए और तापमान को कम रखने के लिए महासागरों को संरक्षण दें। समुद्र तटों को प्रदूषित न करें। मछली को खाद्य रूप में कम अपनाएं। 

◆ ऊर्जा दक्षता में सुधार करें। फोटोवोल्टिक सौर पैनलों का उपयोग करें, एलईडी बल्बों का चयन , पुराने उपकरणों को बदलना आदि। 

◆हरित ऊर्जा का उत्पादन 

◆हाइब्रिड या इलेक्टिक कार,परिवहन के लिए सार्वजनिक साधनों का उपयोग,कम दूरी के लिए साइकिल जैसे वाहन का उपयोग। 

◆प्लास्टिक के उत्पादन का कम उपयोग। 

◆कचरे का सही ढंग से निपटान। 

◆अक्षय ऊर्जा बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

◆शाकाहार अपनाएं । 

◆स्थाई आदतें विकसित करें।छोटे और स्थानीय व्यवसायों का विकल्प चुनें, शिल्प उत्पाद खरीदें और गुणवत्ता और स्थायी वस्तुओं में निवेश करें। प्रकृति की सभी शक्तियां एक सुनिश्चित विधान में चलती है। ऋत नियमों से बड़ा कुछ भी नही । आज जीवन- मरण के प्रश्न में उलझे हम भूल ही गये लोक रीति तुलसी पूजा, पीपल पूजा और वटवृक्ष की पूजा के तत्व वन संरक्षण से ही जुड़े हुए हैं। गांवों में आज भी पेड़ काटने को पाप और वृक्षारोपण को पुण्य बताया जाता है। नदियों के दीपदान का अर्थ नदी का सम्मान करना है। यज्ञ हवन के कर्मकाण्ड रूढ़ि नहीं हैं, इनमें प्रकृति की प्रीति और वातायन शुद्धि की ही आकांक्षा है। पर्यावरण संतुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थियों के बीच पूर्ण सामंजस्य। ऐसा सामंजस्य जिसमें कुछ भी अवांछनीय न हो ताकि जल वायु भूमि के प्रदूषण की समस्या न हो। हमारे भौतिक शरीर मूल रूप से पाँच तत्वों - मिट्टी, पानी, हवा, आग और आकाश - से मिल कर बने हैं पर मिट्टी इन सब में एकदम मूल और स्थिर तत्व है इस स्थिर तत्व की गुणवत्ता को बनाए रखिए ये जीव के लिए बेहद जरूरी है। 

प्रकृति में रूप है, रास है, गंध है, ध्वनियां है उन्हें अवध्वस्त न होने दें।जल, जंगल, जमीन, वनस्पति, हवा सभी मे स्वच्छता हो मधुरता हो ये आह्वान जरूरी है पृथ्वी को अकक्षुण रखने के लिए जीव को बचाने के लिए।

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥8॥

मधुमान् नः वनस्पतिः, मधुमान् अस्तु सूर्यः, माध्वीः गावः भवन्तु नः ।





Sunday, May 1, 2022

लोरी

अँधेरे समय ने तुम्हारे हाथों  से छीन कर 
पतंग की डोर और फेक कर कंचे
रख दिये कुछ निशान गाँठों की शक्ल में, 
खेल के मैदान से दूर तुम अब कैद हो 
अब नहीं सुनाई देते तुम्हें स्कूल के घंटे 
बस सुनाई देती है सायरन की आवाज 
जो तुम्हारे दिमाग की अंधेरी गुहा में फोड़ा बन तुम्हें टीसता है 

यातना का सांघातिक प्रभाव लेकर अपने मन में
तुम अपने आप से भी बोलते नहीं 
तुम्हारा दुःख अब तुम्हारी भाषा है 
और तुम्हारी देह जिह्वा है 

तुम्हारी ढेर  सारी  जिज्ञासा तुम्हारे हथोड़े  के नीचे दम तोड़ गई है 
और तुम्हारा हँसना तुम्हारे पिता की बोतल में कैद, 

तुम्हारे हाथ पकड़ना चाहता है बचपन 
लेकिन हर बार काम से अटे होते है हाथ
आँखे देखना चाहती है रंग-बिरंगे सपने पर थकान से बोझिल होती है, 

धीरे-धीरे तुम्हारे सपने को ले उदास निराश बचपन 
समा जाता है एक और अंधेरी गली में 
जहां दिनों दिन दिन के उजाले में तुम 
थामे बैठे हो अंधेरे का हाथ

खांसते खखारते तुम अपनी आंखो पर फेरते हो हाथ 
छूना चाहते हो अपने  फूले  हुये गाल 
पर वो अब हड्डियों की शक्ल में यम को न्योता दे रहे है, 

अब तुम्हारी आँखों में हर चीज धुंधली हो रही है 
तुम नींद के मुहाने पर खड़े अपनी शिथिल देह को देख रहे हो 

सो जाओ बचपन 
तुम मुक्त हो हर मजदूरी से हर मजबूरी से 
कभी न जगाने के लिए सो जाओ 
तुम्हारे सारे सपने मैं तुम्हारे साथ विसर्जित करती हूँ 
इस अंधे युग की हर पीढ़ा से हो कर मुक्त चैन से सो जाओ।

Friday, April 23, 2021

कोरोना महामारी चुनोतियाँ और भारतीय समाज

कोई भी खतरा विनाश में परिवर्तित हो इससे पहले मनुष्य इसे रोक सकता है ,कारण सभी आपदा मनुष्य द्वारा उत्पन्न होती है। मानवीय असफलता का परिणाम ये आपदाएं अनुचित आपदा प्रबंधन के कारण न सिर्फ अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाती है बल्कि समाज मे असन्तुलन व अफरा- तफरी की असामान्य स्थिति को भी जन्म देती है। आपदा मानव निर्मित वो जोखिम है जो समाज को नकारात्मक रूप से न सिर्फ मानसिक, शारीरिक बल्कि आर्थिक रूप से ज्यादा प्रभावित करती है, जैसा कि अभी कोविड- 19 में हमने देखा और अब 21 में भी देख रहे है। इस बीमारी ने पूरी दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलेकर रख दी है। जाहिर है स्वास्थ्य को लेकर ढुलमुल रवैया अपनाने वाले देश भारत की भी स्थिति विश्व स्वास्थ्य स्थिति से अलग नही। शीर्ष वित्तीय संस्थान अभी भी कोरोना वायरस महामारी के वास्तविक नतीजे का आकलन कर रहे है । नजरिया अत्यधिक अनिश्चित है, संभावनाएं इस पर निर्भर करती हैं कि स्वास्थ्य संकट की अवधि और महामारी के आर्थिक प्रभावों को कम करने वाली नीतियों की प्रभावशीलता कितनी होगी। कोविड महामारी एक गहरी वैश्विक घटना है। यह बंद सीमाओं पर नहीं रुकता है और यह बताता है कि हम कितने असहाय हैं। महामारी से निपटने में एक दूसरे देश का सयोग बेहद महत्वपूर्ण है। यह चिकित्सा और प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में निश्चित रूप से सच है, वायरस की बेहतर समझ तक पहुंचने के लिए, चिकित्सा उपचार में सुधार, और वैक्सीन होना कितना जरूरी है। वैश्विक संकट के रूप में, कोविड-19 महामारी ने संभावनाओं के क्षितिज खोले हैं और यह एक अलग तरीके से दुनिया को फिर से आकार देने का अवसर हो सकता है। कई सामाजिक वैज्ञानिकों ने दुनिया के लिए मनुष्य के प्रति अधिक संवेदनशील, देखभाल, और सामाजिक असमानताओं और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ की आवश्यकता पर जोर दिया। हालाँकि, ये संकट अन्य सामाजिक मॉडल के लिए भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है। अब तक, संकट के प्रबंधन में नई प्रतिस्पर्धाओं में वृद्धि हुई है। व्यापक आर्थिक मदद पैकेजों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के बजाय राष्ट्रीय निगमों को बचाने पर ध्यान केंद्रित किया है। महामारी एक नए सत्तावादी युग का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है, जिसमें नई प्रौद्योगिकियों के साथ बायोपॉलिटिक्स की भूमिका होगी। इस बीमारी के बाद कुछ सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं मसलन स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा सुधार और वैश्वीकरण का तेज़ होना, क्यूंकि एक बात तो तय है कि जब दुनिया इस बीमारी से उबरेगी तो वैसी नहीं रह जायेगी , जैसी अभी है। कोरोनोवायरस ने विज्ञान को सार्वजनिक स्थान के केंद्र में वापस ला दिया है, यहां तक ​​कि उन देशों में भी जहां अंधविश्वास की जगह गहरी थी। सामाजिक वैज्ञानिक ऐसे तथ्यों के साथ आए हैं जो उतने ही कठिन और निर्विवाद हैं जबकि वायरस स्वयं हम में से किसी को भी संक्रमित कर सकता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां और सामाजिक असमानताएं कम से कम उतनी ही मायने रखती हैं, जितनी हमारे शरीर के वायरस के घातक परिणाम के कारण। महामारी के असली माहौल ने मनुष्यों के बीच, देशों के बीच और नागरिकों और सरकारों के बीच विश्वास में बहुत सी दोषपूर्ण चीजों को उजागर किया है । यह समाज, नीति निर्माताओं और नागरिकों पर भी निर्भर करेगा कि वे इस संकट से कैसे निपटें। ये महामारी न केवल एक सैनिटरी संकट है। यह एक सामाजिक, पारिस्थितिक और राजनीतिक संकट भी है इसलिए इस महामारी को न सिर्फ वैज्ञानिक बल्कि मनोवैज्ञानिक तरह से निपटने की जरूरत है। यह तय है कि ये समय हमें अपने बारे में, हमारे सामाजिक संबंधों और जीवन के बारे में आम तौर पर बड़े सवाल उठाने के लिए प्रेरित कर रह है । यह संकट केवल सार्वजनिक और पर्यावरणीय स्वास्थ्य या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, हम जो देख रहे हैं, वह आधुनिकता के संकट और व्यापक, पैमाने पर उसकी पूंजीवादी व्यवस्था के संकट का एक सच है। इस संकट से गुजरने के बाद, हम हमेशा की तरह "काम " पर वापस लौटने में शायद वैसे सक्षम नहीं होंगे। कोरोना आपदा ने हमें परिवार, समुदाय के महत्व पर , और प्रेम, आतिथ्य, और देखभाल एवं नैतिकता, और फिर एक पूरे राष्ट्र-राज्य और मानवता के स्तर तक पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है। भारत जैसे देश में लोगों के बीच भौतिक सुविधाओं की होड़ भी एक बड़ा प्रश्न है एक से ज्यादा गाड़ियां, बड़े घर, ज्यादा कमरों के घर इस मानसिकता को भी बदलने का समय आ गया है। प्रकृति के संसाधनो का अन्धाधुंध दोहन ने भी परिस्थियों को और प्रतिकूल बनाया है। भारत जैसे देश में तो स्थिति और भी ज्यादा विकट है. नदियों का दैवियकरण कर के हमने उन्हें समाप्त ही कर दिया है। पूरे विश्व मे खानपान को जो प्रवत्ति है जिसमे लोग आधा खाना खाकर आधा फेंक देते हैं, आज के समय में अनाज कि किल्लत शायद इस सोच को बदलने को प्रोत्साहित करे। हमें अपने खान- पान की आदतों पर भी नज़र डालनी होगी ये सिर्फ किसी देश तक सीमित नही है बल्कि पूरे विश्व को इस पर ध्यान देना होगा । हाल ही हमनें देखा कि जानवरों के माध्यम से मानव में वायरस किस तरह फैला। क्या इस तरह का खाना वास्तव में इतने स्वादिष्ट हैं? सबसे पहले, कोरोना काल की स्थिति में ये बात बहुत अच्छे से स्पष्ट हुई है कि दुनिया वास्तव में कैसे परस्पर जुड़ी हुई है। एक वैश्विक गांव की छवि को एक रूपक से एक वास्तविकता में बदल देती है, लेकिन हमें अभी भी अधिक वैश्विक एक जुटता और अधिक मानवतावादी वैश्वीकरण उत्पन्न करने की आवश्यकता है । ऐसा करने के लिए सफलतापूर्वक एक बहु-स्तरीय अवधारणा की आवश्यकता होती है , जो अंततः अधिक स्वास्थ्य मुसीबतों, महामारी, मृत्यु और आपदाओं के लिए प्रभावी त्वरक के रूप में कार्य करता है। इन बहु-स्तरीय संबंधों की जांच व्यक्ति, समाज और प्रकृति को फिर से जोड़े बिना नहीं की जा सकती है। उदाहरण के लिए, जलवायु परिवर्तन और राजनीतिक आर्थिक प्रणाली को संबोधित करते हुए लोगों को पृथ्वी और मानवता के संबंधों पर सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के बिना ये नहीं किया जा सकता है। ये सही है कि इस वैश्विक संकट ने शोषण, फैलाव और नवउदारवादी पूंजीवाद को सुदृढ़ करने के लिए नई रणनीतियों को प्रेरित किया और हमारे लालच और स्वार्थ की पहुंच को बढ़ाया, लेकिन इसने हमें अपने सामाजिक न्याय को समझने और पुनः प्राप्त करने के नए तरीकों का पता लगाने और प्रदान करने का अवसर भी दिया है। हम जानते हैं कि पर्यावरण के लिए संघर्ष हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था की पसंद से अविभाज्य है, और हमारी वांछित आर्थिक प्रणाली की प्रकृति से - और ये मानव और प्रकृति के बीच के संबंध कभी भी तत्काल या अंतरंग रूप से नहीं जुड़े हैं जैसा कि वे अब हैं। चिंता करने के लिए बहुत कुछ है। इस महामारी के संकट के बारे में कुछ भी अच्छा नहीं है।इससे हजारों लोगों को जान से हांथ धोना पड़ा है, जिससे लाखों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, और अरबों लोगों को महत्वपूर्ण बुनियादी अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा हैं। यह महामारी जितनी अधिक समय तक रहेगी, संस्कृति, समाज और अर्थव्यवस्था पर इसके विनाशकारी प्रभाव उतने ही गंभीर होंगे। इसलिए, समाज को सरकार को अपनी सोच को व्यापक ढंग से बदलना होगा । सरकार को बड़ी और छोटी कंपनियों पर कुछ ऐसे नियम लागू करना चाहिए जिसमे कोई अतिरेक नहीं, बल्कि अधिमानतः अस्थायी छंटनी की सब्सिडी व सामान्य तौर पर, रोजगार की सुरक्षा महत्वपूर्ण होगी। कोरोना के बाद, दुनिया - और काम की दुनिया - अलग होगी। हाल के दशकों में आर्थिक नीति के प्रभावी मानक ढह गये है । महामारी के बाद यह बदलाव जारी रहेगा। यह अतिदेय था और कोरोना संकट ने इसे तेज कर दिया है। हम सभी के लिए यह तय करना भी आसान होगा कि हमें वास्तव में क्या चाहिए। यहां तक ​​कि हम क्रिकेट के बिना पूरी तरह से अच्छी तरह से रह सकते है। लेकिन हम बेकर्स, किसानों, चिकित्सा सहायकों,ड्राइवरों और सहायक पड़ोसियों के बिना नहीं रह सकते थे। इससे पता चलता है कि हम सभी को एक अच्छी तरह से काम करने वाले सामाजिक बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है। यदि आप पेशेवर क्रिकेट खिलाड़ी की मासिक आय की तुलना चिकित्सा नर्स से करते हैं, तो यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि हमारे समाज में कुछ सही नहीं है। वैदिक धर्म से निःसृत हिन्दू जीवनशैली जो व्यष्टि से ले कर समष्टि तक तथा सृष्टि से ले कर परमेष्टि तक के समस्त जीवों के प्रति सह अस्तित्व पर कायम है हमें पुनः उसे समझना ही होगा ये हमारे समाज,स्वास्थ्य, पर्यावरण के लिए उसे बचाने के लिए बेहद जरूरी है। --------------------------------------------------------------------------------

Thursday, March 11, 2021

शिवोऽहम् शिवोऽहम्

मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥🙏 शिव अनन्तता, अपरिमितता और सवोच्चता के परिचायक है । शिव शिवोहम् है - शुभ मंगलकारी । वो गृहस्थ है, गुरु है, आदियोगी है, आदिगुरु है, काल है तो कालतीत भी, वो परब्रह्म है, निराकार है। शिव कालभैरव है, किराट है तो वानर रूप में हनुमान भी। शिव विराट है, शिव पूर्ण है। वो समस्त गन से युक्त , समय काल, जीवन- मृत्यु, राग- द्वेष, पाप- पुण्य, सुख- दुख, बहुत- भविष्य, भौतिकता- लौकिकता से परे स्वयंभू है। वो शिव है वो शून्य है, शिव अंतरात्मा है, शिव ॐ है ,शिव ज्योति है। यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ज्ञानमय, विज्ञानमय, धृतिशील प्राणियों में जो रहा करता सदा है ज्योति बनकर नहीं किंचित् कर्म होता बिना जिसके वही मेरा मन सदा शिव संकल्पकारी हो ।