Wednesday, July 17, 2019

सात कदम

वायुहीन नि:श्वास के परे
शून्य से उभरे जगत में
सत असत् रज भी अस्तित्व में नहीं था,
न ही उसके परे  आकाश
उष्मा ने न  उत्पन्न किया था जल,
न जल ने उत्पन्न किया था अन्न,
न अंडज हुआ था न अकुंर
न मृत्यु न अमरत्त्व ,
न रात न दिन

तब स्वरोदय के साथ
प्रकट होती हूं मैं

निर्बंध भ्रमण करती
रचती हूं सात लोक,

अचानक समा उठता है मुझमे
आकाश का महाकंपन

सात स्वर के इंद्रधनुषी जाल में  बंधी मैं
धरती हूं कदम
एक सिहरन फिर रहस्यमय गति

तुम्हें सिर्फ याद रहता है छठवां कदम
जबकि चले थे हम सात कदम

मैं भावपूर्ण लालसा भरी कामना के साथ
जोहती रही बाट
सातवें कदम के पूर्ण होने की,
लेकिन माहअज्ञान के सीमान्त क्षेत्र
कभी न ख़त्म हुये
स्वात्मा सर्वोच्च गहराई में पड़ी निद्रा में लीन ही रही
धरती की चीख चूक गई ,

अब सिर्फ मौन था बिना हर्ष

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युग बीते
मुहूर्त आया शून्य के रूपांतर का
परिवर्तन हुआ और प्रवर्तन भी

अमानवीय ऊंचाइयों ने विशाल पंख फैलाए
उदासीनता की एकांत ध्वनियां का ,
जमा हुआ वैभव मेरे इर्द-गिर्द सिमट आया

मैं फिर भी अनिच्छुक चुप्पी के साथ अकेली थी
मन की खिड़कियां,
महाशून्य में उलटना चाहती थी अँधेरे को

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युग बीते
मैं याद करती हूँ
महाप्रयाण के दिन को
रोका था मैं ने दक्षिण दिशा जाते तुमको
और उलट दिया था जन्म मृत्यु के चक्र को।

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युग बीते 
अचानक एक दिन तुमने मांगी थी मुझसे परिक्षा
मनो सारी धरती आत्मा की अभिव्यक्ति का घर हो गई।
एक बेसुध पृथ्वी की मौन छाती पर,
नाग बन संशय लिपट गया 

बलिदान की वैदिक अवधारणा शुरू हुई
'प्रेम' इस अमर शब्द से स्पंदन ख़त्म हुआ
जड़त्व के मौन ने आत्मा को तोड़ दिया।

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युग बीते
समय के पहिए पर,
कर रही थी गति मैं फिर भी,
सामंजस्यपूर्ण लय के साथ

अचानक भीषण विवाद के नैराश्य केंद्र में
दिलासाहीन खाई में गिरी मैं
मौन की गहरी दरार के अंदर,

अपने चीर को संभाले हटा रही थी
समय के संकरे आवास से
आप्लावित सीमित प्राण

पासे उलट गये थे ,तुम फिर भी मौन थे

एक त्रुटिहीन मन घटनाओं को गढ़ता रहा
और मैं घटना बनती रही।
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युग बीतते रहे
मैं प्रेम करने को शापित थी

अंत का प्रतीकात्मक मोड़ आ पहुंचा

जीवन और विचार पर
अकेली खड़ी में चकित सोचती हूं
मैं क्या सिर्फ चिन्ह हूं
सृष्टि की आत्मोपलब्धि का ?
जिसे पढ़कर तुम अपने रास्ते खोजते हो

उत्तर तुम नहीं दोगे न देगी सृष्टि

लेकिन मैं ने अब
अमर्त्य होंठो से ज्ञान की की रास खीच ली है।

चलूंगी मैं अब साथ साथ 

तुम शायद भूल गये
सातवा कदम मित्रता के लिए था।
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Thursday, July 11, 2019

प्रकृति संवर्धन और संरक्षण

'स्नो पियर्सर' के अमेरिकी डिस्ट्रीब्यूटर टॉम क्विन का कहना है, जलवायु परिवर्तन के बाद की स्थितियों को दिखाने वाली फिल्म नई पीढ़ी को प्रभावित करें तो शायद बहुतायत में लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो ।

 गॉडजिला बनाने वाले एडवड्रस का कहना है, 'गॉडजिला' जैसी फिल्म हमने जो कुछ किया है, उसका काल्पनिक दंड है। अगर हम ऐसा ही करते रहे तो वास्तविक दंड मिलेगा।

बात सही भी है जिस तेजी से पर्यावरण में बदलाव देखने को मिल रहा है, तब वो दिन दूर नही कि सारे मौसम  अपना रास्ता ले लेंगें, सिर्फ एक को छोड़ कर, चाहे वो हिम युग हो, जल युग हो या तपता सूरज।

स्टीफ़न हॉकिंग कहते है- 'मानव समुदाय इतिहास के सबसे ख़तरनाक समय का सामना कर रहा है ।

हमारे पास पृथ्वी की बरबादी की तकनीकें तो बड़ी संख्या में आ गई हैं, लेकिन इनसे बचने की तकनीकों का विकास नहीं हो सका है ।

यदि ज़ल्दी ही पर्यावरण और तकनीकी चुनौतियों से निपटने का तरीक़ा ईज़ाद नहीं किया गया तो परिस्थितियाँ बदतर हो जाएँगी और पृथ्वी के बरबादी के निकट होगी ।
इसलिए अब विश्व को उच्चतर जीवन शैली को त्यागना होगा, क्योंकि आजीविका के संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं ।'' 
अपनी भौतिकवादी प्रवत्तियों से किनारा कीजिए ।
पर्यावरण को लेकर जागरूक हो और दूसरे को भी करें।

पर्यावरण पर जागरूकता मिशन पर लगी पत्रिका प्रकृति दर्शन है । ये त्रैमासिक पत्रिका है ,जो मुरादाबाद से निकलती है ।
इसके संपादक संदीप कुमार शर्मा जी है, जिन्होंने इस पत्रिका के द्वारा प्रकृति दर्शन अभियान चला रखा है ।
जिसको इन्होंने नाम दिया है "आओ सुधारें अपनी प्रकृति" जिसमे इन्होंने प्रमुख बिंदु पर अपनी पत्रिका 'प्रकृति दर्शन के माध्यम से आवाज़ उठाई है।
जिसमे इन्होंने कहा है-

1. नेशनल वाटर एक्ट बनाया जाए
2.वाटर-हार्वेस्टिंग एक्ट के गठन किया जाए
3. राष्ट्रीय वैन सरंक्षक, अंकेक्षण अधिनियम व आयोग का गठन हो।
4. पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य की जाए।

ये पर्यावरण संतुलन के लिए अहम सुधार है जिसमे हमारी, आपकी भागीदारी जरूरी है अगर आप भी पर्यावरण बेहतर बनाना चाहते है तो आदरणीय प्रधानमंत्री जी को इस संदर्भ में जरूर लिखें।
प्रकृति यशस्वी हो ये कामना के साथ उसके यशस्वी होने के उपाय भी करें।