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Thursday, March 8, 2018

पुरुषों के नाम पत्र

पुरुषों के नाम पत्र
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एक पत्र जो आप को वो पात्र बना देगा जिसकी कोशिश आप एक युग से कर रहे है....

सारी दुनिया औरत के इर्द गिर्द
औरत की दुनिया चूल्हे के इर्द गिर्द।

आप श्रेष्ठ है और हम हीन इस भावना से मुक्त हो...
जरुरी है बेहतर समाज के लिए

श्रम की परिभाषा मानवीय मूल्यों पर आधारित नहीं है। अगर होती तो निःसंदेह स्त्री के योगदान को पहचान मिलती और उसका मूल्यांकन भी होता।
जाने दीजिए हम मांग नहीं रहे लेकिन हमारे श्रम को उचित सम्मान तो दीजिए अगली बार जब आप से कोई पूछे की आप के घर की महिलाएं क्या करती है तो ये मत कहिए कुछ नहीं , पत्नी से तो बिलकुल भी नहीं कि तुम्हारा क्या ? दिन भर घर पर ही रहती हो...मैं काम करके आया हूं ।
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शुभकामनाएं हम आपस में ले - दे लेंगे आप तो बस अपना एटीट्यूड बदलो
#किरण

Sunday, March 8, 2015

आ धर्म निभाये

मैंने कहा नदी से
तू और मैं एक जैसे
मैं प्रीत का तूफान यादों की कश्ती  से खेती
तू भी कितने तो तूफान सहती
तू मिटती- बनाती लहरों के खेल में
मैं भंवर  में रहती गिरस्ती  के जेल में
तू खामोश बहती लहरों के साथ
मैं भी  बहती जिन्दगी के बहाव के साथ
तू नि:शब्द हो समेट लेती है सब कुछ अन्दर
मैं समेट लेती हूँ सबके दुःख अंतस
तू बंधी  है किनारो की बाधा  से
मैं बंधी हूँ समाज की मर्यादा से
नदी  तेरा मेरा सुख दुःख एक है
किनारों के पार विध्वंस  है
आ धर्म निभाये
किनारों के भीतर ही रहा जाये
सृजन धरा पर करा  जाये