Saturday, January 24, 2015

वसंत ! क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर.

ये मेरा सौभाग्य है की डिग्री कॉलेज में पहला चयन मेरा निराला की धरती गढ़ाकोला निकट उन्नाव में हुआ. गढ़ाकोला माँ सरस्वती के वरद पुत्र महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी का पैत्रिक गाँव  है वैसे उनका जन्म वसंत पंचमी के दिन 21फरवरी 1896 को मिदनापुर पश्चिमी बंगाल में हुआ था.बंगला, हिंदी,संस्कृत,और अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले महाप्राण ने अपनी छाया से  हिंदी साहित्य में वसंत  के अग्रदूत बने.… किंतु  दुर्भाग्य से वो अपने जीवन को पतझड़ से अलग नहीं कर सके.

ये निराला का ही प्रताप है की आज भी वहां की धरती में कुछ ऐसी अनुभूति  है की आप की लेखनी रचियता बन भाव को शब्दों में पिरोने लगती है .वो भाव जो अब स्थाई भाव है के साथ मेरी रचना।।

वसंत देखा तुम्हे था
निराला की रचना में
कवि की कल्पना में
उस घाट  पर बाधी थी नाव जहाँ कवि ने
अब तुम क्यों नजर नहीं आते
प्रेम गीत अब क्यों नहीं गाते
क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर
सुस्ताना था वहां तुम्हे पल भर
अभी भी शाखों में फूल खिलते हैं
प्रेमी अब भी यहाँ मिलते है
व्यथा से मेरी बौराया वसंत
फिर बोला कुछ सकपकाया वसंत
रोज मिलते तो है प्रेम की सौगात लिए
फिर धुंधले हो जाते है उनकी आँखों के दिये
अब प्रेम में वो रंग नहीं मिलते
अब ख़्वाबों के कंवल नहीं खिलते
इसलिए पतझड़ की तरह आता हूँ
रस्म अदायगी   कर चला जाता हूँ
अब न रहूँगा इस ठावं बंधु
पूछे चाहे सारा गाँव बंधु 

2 comments:

  1. सुन्दर रचना मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत ह

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  2. बहुत उत्तम भाव ...

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