Wednesday, May 1, 2013

...क्योकि जिन्दगी अभी बाकी है.

प्रिय मित्र समय!
तुम्हारे निकलने के 
पल पल का एहसास है,
लेकिन अभी बचे है  
मेरे अन्दर कुछ विचार,
और  क्रियांवित करने का आधार 
कुछ घटनाये जो अभी होना बाकी है,
क्योकि जिन्दगी अभी बाकी है.
तुम सुन रहे हो मित्र!
कुछ एहसास हुआ या नही 
एक बार फिर देना मेरा साथ,
बस अब मेरा लक्ष्य है बहुत पास 
प्रिय सखा तुम तो समय हो 
बीत जाओगे किसी तरह,
लेकिन मै बीती बात कैसे हो जाऊ 
बिना आदि से मिले 
अंत कैसे हो जाऊ?
कैसे ज़िन्दगी के पार चली जाऊ?
इसलिये अभी उस चित्र को पूरा करुंगी 
जिसके  किनारो मे अभी  
रंग भरना बाकी है.


13 comments:

  1. समय के संग दोस्ती शायद हमे उसके साथ कदम कदम साथ चलने के लिए उत्प्रेरित करेगा . बहुत सुन्दर शब्दों में भावनाओं को पिरोया है .

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    1. धन्यवाद आशीष भैया...

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  2. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 03-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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  3. आभार कुलदीप जी....

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  4. ये जिजिविषा बनी रहे।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (03-05-2013) के "चमकती थी ये आँखें" (चर्चा मंच-1233) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. बहुत आशान्वित कर गई कविता !

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  7. कुछ घटनाये जो अभी होना बाकी है,

    क्योकि जिन्दगी अभी बाकी है
    जोरदार

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