Tuesday, January 27, 2015

मैंने सिर्फ मुहब्बत की

हवायें बदली बदली हैं ये मौसम बहका बहका है
मैंने सिर्फ मुहब्बत की तो फिर ये जादू कैसा है।
नज़्मों के बादल घिरे थे कुछ गज़लें भी बरसी थीं
मेरी कच्ची धरती से उठी भाप में चंदन महका है।
उस रात चाँद से तुमने क्या कह दिया बता देना
आजकल मुझसे जानें क्यूँ वो उखड़ा उखड़ा रहता है 

तुम्हे जब याद करती हूँ तो होंठ मुस्कानें लगते हैं
ये दुनिया वाले कहते हैं मुझे शायद कुछ हुआ सा है।

Saturday, January 24, 2015

वसंत ! क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर.

ये मेरा सौभाग्य है की डिग्री कॉलेज में पहला चयन मेरा निराला की धरती गढ़ाकोला निकट उन्नाव में हुआ. गढ़ाकोला माँ सरस्वती के वरद पुत्र महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी का पैत्रिक गाँव  है वैसे उनका जन्म वसंत पंचमी के दिन 21फरवरी 1896 को मिदनापुर पश्चिमी बंगाल में हुआ था.बंगला, हिंदी,संस्कृत,और अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले महाप्राण ने अपनी छाया से  हिंदी साहित्य में वसंत  के अग्रदूत बने.… किंतु  दुर्भाग्य से वो अपने जीवन को पतझड़ से अलग नहीं कर सके.

ये निराला का ही प्रताप है की आज भी वहां की धरती में कुछ ऐसी अनुभूति  है की आप की लेखनी रचियता बन भाव को शब्दों में पिरोने लगती है .वो भाव जो अब स्थाई भाव है के साथ मेरी रचना।।

वसंत देखा तुम्हे था
निराला की रचना में
कवि की कल्पना में
उस घाट  पर बाधी थी नाव जहाँ कवि ने
अब तुम क्यों नजर नहीं आते
प्रेम गीत अब क्यों नहीं गाते
क्यों रूक गये पतझड़ पड़ाव पर
सुस्ताना था वहां तुम्हे पल भर
अभी भी शाखों में फूल खिलते हैं
प्रेमी अब भी यहाँ मिलते है
व्यथा से मेरी बौराया वसंत
फिर बोला कुछ सकपकाया वसंत
रोज मिलते तो है प्रेम की सौगात लिए
फिर धुंधले हो जाते है उनकी आँखों के दिये
अब प्रेम में वो रंग नहीं मिलते
अब ख़्वाबों के कंवल नहीं खिलते
इसलिए पतझड़ की तरह आता हूँ
रस्म अदायगी   कर चला जाता हूँ
अब न रहूँगा इस ठावं बंधु
पूछे चाहे सारा गाँव बंधु 

Tuesday, December 23, 2014

हिन्दू जीवन दर्शन

हिन्दू जीवन दर्शन सिर्फ एक बकवास है छात्रों के एक समूह ने आवाज को थोडा तीखा करते हुए कहा दुसरे समूह ने उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया हिन्दू जीवन दर्शन के पक्ष में दि . मेरे शिक्षक जीवन में ऐसी कई बहस को मैंने सुना है और सुनकर आश्चर्य हुआ है कि हम हमारे जीवन दर्शन को ठीक से नहीं जानते जबकि दर्शन  किसी भी राष्ट के संस्कार और संस्कृति  को गड़ता है हमारे देश के साथ भी ऐसा ही है .

हम भारतीयों की चेतना शक्ति जहा से प्रभावित होती है वो हमारे वेद,उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और हमारा लोक जीवन है . हिन्दू जीवन दर्शन के वैदिक दर्शन में कहा गया है कि मनुष्य पून्यरूप से इच्छाओ का बना हुआ है जैसी उसकी इच्छाएं होगी वैसी उसकी विचारशीलता होगी जैसी उसकी विचारशीलता व समझ होगी वैसा ही उसका कर्म होगा और जैसे उसके कर्म होंगे वैसा उसका भाग्य . इच्छाओ से छुटकारा प्राप्त कर मनुष्य अमर हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है .

ये हिन्दू दर्शन का एकमात्र द्रष्टिकोण नहीं है गीता में कर्म का दर्शन है असल में ये नवीन हिन्दू दर्शन है जो कर्म का आधार बना कर पुनर्जन्म और इच्छाओ के बीच एक सयोजन करता है

हिन्दू दर्शन वर्तमान की अतीत के साथ निरन्तरता में विश्वास करता है ये एक पक्ष है और दुसरी तरफ वर्तमान को भविष्य में अभिव्यक्त करता है. हिन्दू दर्शन कुछ आधात्मिक विचारो में भी विश्वास रखता है जैसे 'पाप', 'पुण्य', धर्म आदि लेकिन भारतीय जीवन दर्शन सिर्फ संन्यास युक्त ही नहीं है उसमे अर्थ,धर्म,कर्म,मोक्ष भी हैं हमारे यहा का संन्यास व्यक्ति को समाज से न तो पलायनवादी बनाता है और न ही अकर्मण्य वो तो व्यक्ति के जीवन को बहुजन हिताय के सर्वोच्च शिखर तक उठा देता है .चाहे हमारा धर्म हो या दर्शन उसमे वसुधैव कुटुम्बकम रचे-बसे है तमाम तरह की साधना पद्धतिय ,अनुष्ठान और अवधारणाओ के होने पर भी हम सहिष्णु है और सर्वे भवतु सुखिन : की बात करते है .

निम्न पंक्तियों में भारतीय जीवन दर्शन की मूल आवधारणा छिपी है ........
कामिहि नारी पिआरी जिमी,लोभिहिं प्रिय जिमी दाम .
तिमी रघुनाथ निरंतर प्रिय लगांह मोहि राम
   

Wednesday, October 29, 2014

सृजन और जीने का संघर्ष देह -विमर्श नहीं ।

हमारी  नारी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि जब हम पश्चिमी जीवन शैली अपनाते है तो हमें अल्टा मॉर्डन  कहा जाने लगता है हम पर फब्तियां कसी जाने लगती है और जब हम भारतीय संस्कृति अपनाते है तो हमें रूढ़िवादी कहा जाने लगता है। कुछ लोग कहते है कि हमने पुराने जरुरी बंधनो को खोल दिया है जो समाज के लिए बहुत घातक है। हमारी अभिव्यक्ति  को समाज अपनी पूरी कुंठा के साथ कट्टरता से देखता है और समय-समय पर हमें दंड भी देता है कभी निर्भया बना कर कभी मलाला  बना कर।

मानते है हम में भी समाज के दूसरे लिंग की ही तरह कुछ कमिया है और हम उन कमियों पर नजर भी रखे है ये हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है हम उससे पार पाने की भी कोशिश भी कर रहे है। कोशिश है कि हमें धर्म,लिंग, अति महत्वकांक्षा की आड़  कोई इस्तेमाल न करे पर ये कोशिश हम स्त्री ही करना चाहती है हमें कोई सशक्तिकरण नहीं चाहिए हमें हमारी समस्या के लिए खुद ही हल खोजने दे ये हमारी शारीरिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है तभी तो हम अपनी ऊर्जा को बेहतर ढंग  से बेहतर कार्यो के लिए इस्तेमाल कर पाएंगे।   स्त्री सशक्तिकरण जैसे शब्दों से हमारी समस्या कुछ स्त्री प्रश्न या स्त्री मसलो तक ही सीमित  कर दी है हमारा प्रश्न तो विराट है वो किसी सशक्तिकरण के दायरे में  नहीं  आ सकता। 

हमारा पहला व अंतिम प्रश्न है हमें मनुष्य क्यों नहीं समझा जाता और जहां कही ऐसा समझा भी गया है वह हमें नियंत्रित रखा जाता है कि हमें कभी-कभी मनुष्य होने पर भ्रम होता है हम मनुष्य की सीमित नसल  है। 
हमने  जीवन का सृजन किया है  हम जीवन रचियता है हमने न जाने सृजन के कितने-कितने गीत लिखे है तब हमें गरिमा के साथ जीने का हक़ क्यों नहीं?

हमारे सृजन को हमारे त्याग को देवीत्व और गरिमा से जीने के संघर्ष को देह -विमर्श में मत बदलो बस हम इतना ही चाहते है अगर पुरुष  ऐसे कर सके तो हम वादा करते है कि सदियों से आप की दुनिया  का हिस्सा बनी सामाजिक व्यवस्था  और परम्परागत सोच को हम आप से दूर कर देंगे उन रूढ़िगत संस्कारों से आप को बचा लेंगे जिनके शिकार होकर सदियों से आप पुरुषवादी अहंकार के नीचे दबे ठीक से सांस नहीं ले पा रहे है।

सदियों से पुरुष वादी चोले को उतरने का समय आ गया है पुरुष तुम रूढ़िग्रस्त संस्कारों से मुक्त हो और सभ्य बनो हम स्त्री जाती तुम्हारे साथ है आओ दोनों मिलकर उत्तर फेके चोले उन साढ़े- गले कु संस्कारो के और  पूर्ण करे मनुष्यता को। 



Friday, October 17, 2014

जीने की कला

ये आप को तय करना है की आप को कैसा जीवन जीना है वो जीवन जिसमे बाहरी उन्नति है जिसे हम भौतिक उन्नति भी कहा सकते है या फिर वो जीवन जिसमें आंतरिक उन्नति हो . क्या ये अच्छा नहीं हो कि हम ऐसा जीवन जीये जिसमे हमारी अंतरज्योति हमेशा जीवित रहे प्रकाशमान रहे।
जीवन जीना एक कला है और ये कला पूरब के पास बर्षो से थी। भारत की धरती पर जीवन की ये कला बिखरी हुई थी तभी तो जीवन के सही अर्थ के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण रहा. जीवन के बाद जीवन की अवधारणा की बात सिर्फ हम ही करते है। हम कौन है ? हमारे जीवन को जीने का क्या उद्देश्य है ....? ये हमारी संस्कृति में लाखों वर्षो से है।

हमारे देश में तमाम ऐसे योगी हुए जिन्हें आध्यात्मिक जागृति की कला का पूर्ण ज्ञान था। कुछ ने उसे बटा भी इस आशा में कि मानव उन्हें अपने जीवन जीने में लागू कर सके और ऐसा हुआ भी परंतु दुर्भाग्य से जीवन जीने की कला सब को नहीं मिल पाई।
हम में से बहुत सारे लोग जीवन में चमत्कार की आशा करते हुए पूरा जीवन काट देते है ऐसा करके लोग अपने जीवन में सिर्फ गतिरोध ही उत्पन्न करते है और निराशा के साथ अपने जीवन का अंत करते है।
जीवन कैसे जीये इस पर बात फिर कभी, अभी तो बस ये की आप अपने जीवन को क्या जी रहे है ? और क्यों जी रहे है ?