Monday, March 12, 2018

सुनो परदेसी !

वो जहाँ हम मिलते थे
खेत कितने होते थे हरे पीले
और किसान कितने होते थे खुश

गुड की मीठी खुशबू हवा में तैरती
चिपक जाती थी हमारे चेहरे पर
उसका जायका जैसे कच्ची उम्र का हमारा प्रेम

खेत के बीचो बीच खड़ा वो बिजूका
जिसके न जाने कितने नाम रख छोड़े थे तुमने
जिसे देख कर हमारे साथ साथ
धान लगाती बालाएं कितना हँसी थी परदेसी

गेंहूँ की हरी हरी बालियाँ जब झूमती थी
तब मैं भी इठलाकर वैसी ही
चूनर लाने की तुमसे जिद्द करती थी
और बदले में तुम हँस कर
लगा के एक चपत
दिखा के फूल चंपा का कहते
वैसी चूनर होनी चाहिए तेरे लिए
और लजा के मैं
तुम्हारी लाई हरी पीली चूड़ी कलाई में घुमाने लगती

पर अब परदेसी
यहाँ के खेत धानी चूनर नहीं ओढते
न मिलती है किसी गोरी को चंपई चूनर
और गुड की मिठास सिर्फ रह गई है यादों में
किसान  मुरझाए हुए पीले चेहरे के साथ
विजूका हो गए हैं
अपनी फ़सल का मुआवजा मांगते मांगते
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7 comments:

  1. परदेसी क्या करे, यही सब यादें कांक्रीट के शहर में जैसे खुश रहने के लिए उसके सहारा बन बैठे हों,
    बहुत अच्छी मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दांडी मार्च कूच दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बहुत बढ़िया कविता। परदेशी के उलाहने से सच्ची बात कही आपने

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  4. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १९ मार्च २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' १९ मार्च २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीया 'पुष्पा' मेहरा और आदरणीया 'विभारानी' श्रीवास्तव जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

    अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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    1. ध्रुव जी लिंक दे दिया कीजिए रचना देखने एवं कॉमेंट देने में आसानी होती है।

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  5. आदरणीय किरण जी -- प्रणय की उदास कहानी कहती रचना बहुत मर्मस्पर्शी है | किसान उदास है तो खेत खलिहान कहाँ हंस पाएंगे ? गोरी का मन कैसे खिल पायेगा ?सादर

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