Saturday, December 5, 2015

महत्वकांक्षी लेखनी

ओं मेरी कविता तुम दुखी हो पर क्यों
क्योंकि तुम जीना चाहती हो ऐश्वर्य में
जिनके पेट खाली पर मन भरे हैं प्रेम में
दर्द उनका बाट तुम खुश क्यों नहीं
तुम अपनी कीमत लगाना चाहती हो क्यों
अपने को बैच ऐश्वर्य नहीं आता पगली
अरे ये समय है लाभ लोभ का
तुमसे  हानी नहीं इसलिए लाभ क्या
तुमसे टका भी नहीं मिलेगा
और बैचने के लिए कला के साथ कारी होती है
वो भी नहीं तुम्हारे पास
बाज़ार की नजर में तुम खोटा सिक्का
जिसकी कीमत नहीं
हैं तुम बिक सकती हो
लाश बन जाओ
मृत लोगो बेशकीमती होते है
लेखनी ये सब छोड़ो
तुम ने लगा दी अगर अपनी कीमत
तब हम कहाँ सुन पाएंगे
प्रेम के गीत
जीवन संगीत
गरीबो का दर्द
बच्चो की पुकार
न देख पाएंगे
झूमते पहाड़
लहलराते खेत
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मैं ऐश्वर्य माय लेखनी
मैंने संवेदनाओं को मार
हर्द्धय को कर सक्त
हटा लिया है अन्दर से
असहयो गरीबों का दर्द
अब समर्थक हूँ पूंजीवाद की
कर रही हूँ चाटुकारिता महराज की
जय बोल रही हूँ व्यवस्था की
जय जय जय
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आत्मा बैच कितना जगमगा रही हो
धन से लदी भदी तुम कितना इतरा रही हो
सर झुकाते लोग तुम्हे अपना इष्ट बता रहे है
पर तुम्हारा दमान कुछ और कहानी सुना रहा है
अहसयो गरीबों के आसू दिखा रहा है
अब तुम प्रेम प्यार की  कविता नहीं
ऐश्वर्य में लिपटी लाश हो
आओ मैं तुम्हे शांति दू
आज मैं तुम्हारी अन्तेष्टी  कर दू
ओम शांति शांति शांति 

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