स्वतंत्रता का आलोक
हर तरफ फैला ही था कि
अपनी- अपनी पताका के साथ
अपने -अपने उदघोष हुए
द्वार पर ही स्वतंत्रता ठिठक गई
प्रकाश की किरणें धीरे- धीरे काट दी गई
स्वतंत्रता का सूर्य खंडित हो
क्षत विक्षत हो गया
कुछ उत्साही जाग्रत हुए
अब सत्ता के शिखरों पर
अवतार जन्म लेने लगे
अवसरवाद के पालने में झूलते वो
अँधेरी सदियों के सपने देखने लगे
सारे आदर्शो को सुरिक्षित कर
अवसरवाद को गले लगाया गया
एक मूर्च्छित युग की शुरुआत हुई
और होती ही चली गई
मूर्छा का संरक्षण कर
बुद्ध के मौन को नष्ट कर
स्वतंत्रता का अनुष्ठान आरम्भ किया गया।
किरण कोई व्यक्तिवाचक संज्ञा न होकर उन तमाम व्यक्तियों के रोजमर्रा की जद्दोजहद का एक समुच्चय है जिनमे हर समय जीवन सरिता अपनी पूरी ताकत के साथ बहती है। किरण की दुनिया में उन सभी पहलुओं को समेट कर पाठको के समक्ष रखने का प्रयास किया गया है जिससे उनका रोज का सरोकार है। क्योंकि 'किरण' भी उनमे से एक है।
Friday, August 14, 2020
Wednesday, April 22, 2020
पृथ्वी का रुदन
🌻🐝रात का फक्कड़
आवाज देता है पृथ्वी को
शांति का प्रकाश सिर्फ एक लहर है
जो रोष के तूफान में खो जाती है,
असहाय पृथ्वी
निर्दयी आत्माओं से करती है रुदन
जरा ठहरो मेरे दर्द को साझा करो
बांसुरी बजाता मनुष्य
ओट में हो जाता है
मैं समय ,समुद्र का एक बेड़ा
अपने डूबने के इंतज़ार में हूं।
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🌻🐝पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं🌻🐝
आवाज देता है पृथ्वी को
शांति का प्रकाश सिर्फ एक लहर है
जो रोष के तूफान में खो जाती है,
असहाय पृथ्वी
निर्दयी आत्माओं से करती है रुदन
जरा ठहरो मेरे दर्द को साझा करो
बांसुरी बजाता मनुष्य
ओट में हो जाता है
मैं समय ,समुद्र का एक बेड़ा
अपने डूबने के इंतज़ार में हूं।
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🌻🐝पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं🌻🐝
Monday, March 30, 2020
ठहराव
और एक दिन जब
मनुष्य ने ईश्वर को फड़
पर बैठने को कहा
ईश्वर ठिठका
मनुष्य की बिछाई बिसात देख,
पहली चाल मनुष्य ने चली
विकास
सारे अर्थहीन, खतरनाक मुद्दे
उठ खड़े हुए
दूसरी चाल
विज्ञान
ह्रदय हीन हुए मनुष्य
ईश्वर हँसा
अब आखिरी चाल उसकी थी
उसने पासे फेंके
दौड़ते मनुष्यों के पैरों में उसके पासे थे
अब ईश्वर के सामने मनुष्य था
और मनुष्य के सामने उसकी छाया
यह देख
पृथ्वी फिर से उठ खड़ी हुई।
मनुष्य ने ईश्वर को फड़
पर बैठने को कहा
ईश्वर ठिठका
मनुष्य की बिछाई बिसात देख,
पहली चाल मनुष्य ने चली
विकास
सारे अर्थहीन, खतरनाक मुद्दे
उठ खड़े हुए
दूसरी चाल
विज्ञान
ह्रदय हीन हुए मनुष्य
ईश्वर हँसा
अब आखिरी चाल उसकी थी
उसने पासे फेंके
दौड़ते मनुष्यों के पैरों में उसके पासे थे
अब ईश्वर के सामने मनुष्य था
और मनुष्य के सामने उसकी छाया
यह देख
पृथ्वी फिर से उठ खड़ी हुई।
Thursday, February 20, 2020
निस्तब्ध
धरती को चूमने के हजारों तरीके है
दिल का ताप बड़ा
मेरे दिल मे छिपे तारे ने
सातो दिशाएं रोशन की
गिर जाने पर हाथ बढ़ाकर उठा देना
ऐसे शख़्स का मिल जाना
इस धरती की सबसे अद्भुत घटना है
कि ईश्वर को पता है ये दुनिया कैसे चलती है।
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Painting by william quincy
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Painting by william quincy
Wednesday, December 4, 2019
दास्तान-ए- इश्क
उस दिन गहन निस्पंद आधी रात में अचानक टहनियों की फुनगी पर पढ़ी बदली से निकलते चांद की रोशनी उतार लाई थी, अतीत का स्वप्न
अहा! कैसे तो स्वप्न थे बारम्बार बांधते थे मन के सुने द्वार पर पंखों के तोरण
आज फिर मादल की थाप कानो में गूंज रही है....
पलाश के फूल तारों भरे सफेद दुपट्टे पर गिर रहे है । उधर कुछ दूर बंदिशें अपनी मुस्कान लिए बिखर- बिखर जा रही है।
पलकों की कोरें बंदिशों की छांव बन अपनी आंखों से काजल का टीका लगा रहीं है।
काजल का टीका आत्माओं के अंधेरों से कहां कभी बचा पाया है?
बिखरे शब्द जंगल के रास्ते शहर की धूप भरी सड़को पर पहचाने गये लाल स्याही से गोले लगाए जाने लगे.....
बंदिशें भूल गई थी मात्राओं का खेल निराला है इसलिए राजा है तभी न उसकी नीति व अनीति का साया है।
पलाश तो स्वच्छंद उगता है.... इसलिए जंगल मे ही फलता फूलता है...जंगल मे शब्द नही होते सिर्फ ध्वनि होती है,हर राजा कहां समझ पाता है हर ध्वनि गुरुत्वाकर्षण का भेदन नही करती....।
आज भी निस्पंद रात में जब कभी बादलों की ओट से चांद की रोशनी टहनियों की फुनगियों पर पड़ती है तो न जाने क्यूं मन के नक्शे पर एक हराभरा जंगल बंदिशें गाने लगता है।
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अहा! कैसे तो स्वप्न थे बारम्बार बांधते थे मन के सुने द्वार पर पंखों के तोरण
आज फिर मादल की थाप कानो में गूंज रही है....
पलाश के फूल तारों भरे सफेद दुपट्टे पर गिर रहे है । उधर कुछ दूर बंदिशें अपनी मुस्कान लिए बिखर- बिखर जा रही है।
पलकों की कोरें बंदिशों की छांव बन अपनी आंखों से काजल का टीका लगा रहीं है।
काजल का टीका आत्माओं के अंधेरों से कहां कभी बचा पाया है?
बिखरे शब्द जंगल के रास्ते शहर की धूप भरी सड़को पर पहचाने गये लाल स्याही से गोले लगाए जाने लगे.....
बंदिशें भूल गई थी मात्राओं का खेल निराला है इसलिए राजा है तभी न उसकी नीति व अनीति का साया है।
पलाश तो स्वच्छंद उगता है.... इसलिए जंगल मे ही फलता फूलता है...जंगल मे शब्द नही होते सिर्फ ध्वनि होती है,हर राजा कहां समझ पाता है हर ध्वनि गुरुत्वाकर्षण का भेदन नही करती....।
आज भी निस्पंद रात में जब कभी बादलों की ओट से चांद की रोशनी टहनियों की फुनगियों पर पड़ती है तो न जाने क्यूं मन के नक्शे पर एक हराभरा जंगल बंदिशें गाने लगता है।
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धरती को चूमने के हजारों तरीके है सारी व्याख्याएं खत्म हुई दिल का ताप बड़ा मेरे दिल मे छिपे तारे ने सातो दिशाएं रोशन की ...
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मैंने अलसाई सी आंखे खोली है.लेटे-लेटे खिड़की से दूर पहाड़ो को देखा पेड़ो और पहाडियों की श्रंखलाओ के पीछे सूर्य निकलने लगा है, हलकी - हलकी...
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हिंदी कविता को एक नई भावभूमि और चेतना के उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित करनेवाली कवयित्री डॉ किरण मिश्र की चेतना प्रवाह शैली में लिखी कविताओं में...
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बेजुबान लब्ज झुकी डाल ढीठ सी लाज चीरती जब मधुर भय को रचती अधलगी महावर तुम विवश मैं अवश बचपन में मालवा के बिताए सालों में मां...
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वो जहाँ हम मिलते थे खेत कितने होते थे हरे पीले और किसान कितने होते थे खुश गुड की मीठी खुशबू हवा में तैरती चिपक जाती थी हमारे चेहरे पर ...


