Friday, August 14, 2020

स्वतंत्रता का अनुष्ठान 🇮🇳

स्वतंत्रता का आलोक
हर तरफ फैला ही था कि
अपनी- अपनी पताका के साथ
अपने -अपने उदघोष हुए
द्वार पर ही स्वतंत्रता ठिठक गई
प्रकाश की किरणें धीरे- धीरे काट दी गई
स्वतंत्रता का सूर्य खंडित हो
क्षत विक्षत हो गया

कुछ उत्साही जाग्रत हुए
अब सत्ता के शिखरों पर
अवतार जन्म लेने लगे
अवसरवाद के पालने में झूलते वो
अँधेरी सदियों के सपने देखने लगे

सारे आदर्शो को सुरिक्षित कर
अवसरवाद को गले लगाया गया
एक मूर्च्छित  युग की शुरुआत हुई
और होती ही चली गई

मूर्छा का संरक्षण कर
बुद्ध के मौन को नष्ट कर
स्वतंत्रता का अनुष्ठान आरम्भ किया गया।

Wednesday, April 22, 2020

पृथ्वी का रुदन

🌻🐝रात का फक्कड़
आवाज देता है पृथ्वी को

शांति का प्रकाश सिर्फ एक लहर है
जो रोष के तूफान में खो जाती है,

असहाय पृथ्वी
निर्दयी आत्माओं से करती है रुदन
जरा ठहरो मेरे दर्द को साझा करो

बांसुरी बजाता मनुष्य
ओट में हो जाता है

मैं समय ,समुद्र का एक बेड़ा
अपने डूबने के इंतज़ार में हूं।
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🌻🐝पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं🌻🐝

Monday, March 30, 2020

ठहराव

और एक दिन जब
मनुष्य ने ईश्वर को फड़
पर बैठने को कहा
ईश्वर ठिठका
मनुष्य की बिछाई बिसात देख,

पहली चाल मनुष्य ने चली
विकास
सारे अर्थहीन, खतरनाक मुद्दे
उठ खड़े हुए

दूसरी चाल
विज्ञान
ह्रदय हीन हुए मनुष्य

ईश्वर हँसा
अब आखिरी चाल उसकी थी

उसने पासे फेंके
दौड़ते मनुष्यों के पैरों में उसके पासे थे

अब ईश्वर के सामने मनुष्य था
और मनुष्य के सामने उसकी छाया

यह देख
पृथ्वी फिर से उठ खड़ी हुई।

Thursday, February 20, 2020

निस्तब्ध

धरती को चूमने के हजारों तरीके है



सारी व्याख्याएं खत्म हुई

दिल का ताप  बड़ा

मेरे दिल मे छिपे तारे ने

सातो दिशाएं रोशन की



गिर जाने पर हाथ बढ़ाकर उठा देना 

ऐसे शख़्स का मिल जाना

इस धरती की सबसे अद्भुत घटना है

कि ईश्वर को पता है ये दुनिया कैसे चलती है।

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Painting by william quincy

Wednesday, December 4, 2019

दास्तान-ए- इश्क

उस दिन गहन निस्पंद  आधी रात में अचानक टहनियों की फुनगी पर पढ़ी बदली से निकलते चांद की रोशनी उतार लाई थी, अतीत का स्वप्न

अहा! कैसे तो स्वप्न थे बारम्बार बांधते थे मन के सुने द्वार पर पंखों के तोरण

आज फिर मादल की थाप कानो में गूंज रही है....
पलाश के फूल तारों भरे सफेद दुपट्टे पर गिर रहे है । उधर कुछ दूर बंदिशें अपनी मुस्कान लिए बिखर- बिखर जा रही है।
पलकों की कोरें  बंदिशों की छांव बन अपनी आंखों से काजल का टीका लगा रहीं है।

काजल का टीका आत्माओं के अंधेरों से  कहां कभी बचा पाया है?

बिखरे शब्द जंगल के रास्ते शहर की धूप भरी सड़को पर पहचाने गये   लाल स्याही से गोले लगाए जाने लगे.....
बंदिशें भूल गई थी मात्राओं का खेल निराला है इसलिए राजा है तभी न उसकी नीति व अनीति का साया है।

पलाश तो स्वच्छंद उगता है.... इसलिए जंगल मे ही फलता फूलता है...जंगल मे शब्द नही होते सिर्फ ध्वनि होती है,हर राजा कहां समझ पाता है हर ध्वनि  गुरुत्वाकर्षण का भेदन नही करती....।

आज भी निस्पंद रात में जब कभी बादलों की ओट से चांद की रोशनी टहनियों की फुनगियों पर पड़ती है तो न जाने क्यूं मन के नक्शे पर एक हराभरा जंगल बंदिशें गाने लगता है।
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