किरण कोई व्यक्तिवाचक संज्ञा न होकर उन तमाम व्यक्तियों के रोजमर्रा की जद्दोजहद का एक समुच्चय है जिनमे हर समय जीवन सरिता अपनी पूरी ताकत के साथ बहती है। किरण की दुनिया में उन सभी पहलुओं को समेट कर पाठको के समक्ष रखने का प्रयास किया गया है जिससे उनका रोज का सरोकार है। क्योंकि 'किरण' भी उनमे से एक है।
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मैंने अलसाई सी आंखे खोली है.लेटे-लेटे खिड़की से दूर पहाड़ो को देखा पेड़ो और पहाडियों की श्रंखलाओ के पीछे सूर्य निकलने लगा है, हलकी - हलकी...
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मुझे भी साधना के पथ पर चलना सिखा दो तुम , मेरे " मैं " को मेरे मन से हटा दो तुम मैं अब इस संसार में रुकना नहीं चाह रही हूँ , ...
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बेजुबान लब्ज झुकी डाल ढीठ सी लाज चीरती जब मधुर भय को रचती अधलगी महावर तुम विवश मैं अवश बचपन में मालवा के बिताए सालों में मां...
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पीड़ा की नीव में दबी वासना सुखी हो उठी जब जब स्त्री कराही ,चिल्लाई और इस तरह बर्बर दंड ने जन्म लिया इस पृथ्वी पर हर कराहने के बाद शिकारी...
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प्रिय मित्र समय! तुम्हारे निकलने के पल पल का एहसास है, लेकिन अभी बचे है मेरे अन्दर कुछ विचार, और क्रियांवित करने का आधार ...
ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 04/05/2019 की बुलेटिन, " इसलिए पड़े हैं कम वोट - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
ReplyDeleteशुक्रिया शिवम्।
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteशुक्रिया ओंकार जी।
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