Saturday, January 27, 2018

सागर लहरी सा प्रेम

ले चल मुझे भुलावा दे कर मेरे नाविक धीरे-धीरे
जिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरी
निश्चल प्रेम कथा कहती हो तज कोलाहल की अवनि रे”
( जयशंकर प्रसाद) कभी कभी नाविक अकेला ही सागर पार किसी अनजाने गांव का दरवाजा खटखटा देता है💕❤🍁

किसी अनजाने गाँव में
अनजाने घर की कभी न कभी
सांकल खटकती ही है
खिड़की खुलती है तो शुरू होती है 
दास्ताने उल्फ़त
आँखों एहसास करती है दिल एतबार करता है
फिर दोनों का
न होने से टकराता है
शायद रूह ने साथ छोड़ा है जिस्म का
शुरू होता है रतजगा
ठिठुरी लम्बी रातों का
कहानी आगे बड़ती है
एक तारे की सिसकी 
ध्यान की कश्ती से दरिया पार करती है
उल्फ़त के तराने गूंजते है
साहिबान की दास्तान
अंगड़ाई लेती है 
चनाब से गंगा तक
फूलता है झरता है
महुआ घटवारिन के 
किस्से सा प्रेम
सदियों से बहता है।
💗💕

💟प्रेम आदि न अंत ,हज़ारों ख़्वाहिशें पे दम ।


3 comments:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २९ जनवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारी' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/
    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार', सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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  2. वाह!!बहुत खूब!

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  3. बहुत बढ़िया

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