Wednesday, October 15, 2014

नहीं बीतती साँझ



गोधूली की इस बेला में 
नहीं बीतती साँझ 

व्योम मौन है 
धरा चुप है 
मन का खग भी ठहरा है 
ऐसी है शिशिर  की ये साँझ 

गोधूली की इस बेला में 
नहीं बीतती साँझ 

मन रीता जैसे हो निशा 
पर नयनों में है मनो उषा 

नयनों के इस वीराने में 
नहीं बीतती साँझ 

1 comment:

  1. सुन्दर रचना !
    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा !
    आपका ब्लॉग फॉलो कर रहा हूँ
    कृपया मेरे ब्लॉग पर आएं और फॉलो कर अपने सुझाव दें

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