Wednesday, August 17, 2011

अभिलाषा

आँखों की कोरों से कुछ गीला -गीला गिरता है
दिल से भी कुछ रुकता- रुकता झरता है
कसक सी उठती है दिल में,
बसंत में पतझड़ सा लगता है
आँखों की कोरों.................................
हर बार कहा हर बार रहा 
उनसे मेरा जो नाता है,
ना माना मीत मेरा वो सब,
उसे बंधन , जकड़न सा लगता है
आँखों की कोरों................................
ना जाने वो प्यार की भाषा 
ना जाने मन की अभिलाषा
कसक सी उठती है दिल में
ये शहर अंजाना लगता लगता है
आँखों की कोरो..................................
ना समझ सकी अब तक उनको 
ना समझ सकी अब तक अपने को 
ये प्यार बेगाना लगता है
ये रोग पुराना लगता है
आँखों की कोरों. ...................................

11 comments:

  1. ना समझ सकी अब तक उनको
    ना समझ सकी अब तक अपने को
    ये प्यार बेगाना लगता है
    ये रोग पुराना लगता है
    आँखों की कोरों.....

    kya bat hai.....

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  2. बहुत ही बढ़िया।

    सादर

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  3. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  4. ना समझ सकी अब तक उनको
    ना समझ सकी अब तक अपने को
    ये प्यार बेगाना लगता है
    ये रोग पुराना लगता है
    आँखों की कोरों. .............बहुत ही खुबसूरत कविता....

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  5. बसंत में पतझड़ सा लगता है
    आँखों की कोरों..........
    sunder abhivyakti.
    shubhkamnayen.

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  6. आपकी पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

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  7. खूबसूरती सहेजे हैं मन के भाव

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  8. आँखों की कोरों. ......ने हर बात खूबसूरती से बयाँ कर दी जी अब कुछ कहने को बाकि कहाँ रहा |
    सुन्दर रचना |

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  9. सुन्दर भावाव्यक्ति.............

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