Monday, August 8, 2011

ना बांधू उनसे मैं मन को

सब कहते है मन बंधता है , ना बांधू  उनसे मैं मन को
बंधी गाठ खुल जाये ,वो  तो ना घुल पाए 
ना बांधू .............................................
जग में तो सब बंधते है , बंधन से  ही सब चलते है 
ऐसा जग में सब कहते है, में ना मानू इन सब को  
ना बांधू ....................................................
अगर तू सुनता है मौला, इतनी फ़रियाद मेरी सुन ले 
उनके मन से मेरा मन ,ऐसे घुल जाये 
नदिया सागर में जैसे मिल जाये 
ना बांधू .......................................
बंधन में विश्वास नहीं , ऐसे जीने की आस नहीं 
बंधी - बंधाई ये परिभाषा , मेरी समझ में ना आये 
ना बांधू .......................

12 comments:

  1. हमारी भी शुभकामनायें है की आप उनके मन में समायी रहें चाहें नदी या पवन .........

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  2. बंधन में विश्वास नहीं , ऐसे जीने की आस नहीं
    बंधी - बंधाई ये परिभाषा , मेरी समझ में ना आये...बहुत बहुत खुबसूरत....

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  3. बहुत ही बढ़िया।
    ---------
    कल 09/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  5. sahi baat...bandhan mein vishwaas bhii nahin hona chaahiye...

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  6. अगर तू सुनता है मौला, इतनी फ़रियाद मेरी सुन ले
    उनके मन से मेरा मन ,ऐसे घुल जाये
    नदिया सागर में जैसे मिल जाये

    Kya kamaal ki baat kahee hai aapne!!

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  7. वाह ...बहुत ही बढि़या ... ।

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  8. .



    किरण जी
    सादर अभिवादन !

    सुंदर रचना है आपकी -
    मौला, इतनी फ़रियाद मेरी सुन ले
    उनके मन से मेरा मन ,ऐसे घुल जाये
    नदिया सागर में जैसे मिल जाये

    आमीन ! परमात्मा आपकी मनोकामना पूर्ण करे :)

    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !


    रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस की मंगलकामनाओ के साथ

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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