Saturday, July 25, 2015

रिश्ते, बंधन , मुक्ति

मुक्ति कोई क्षणिक बात नहीं है. वह एक जीवन अनुभव होती है और उसे बार –बार अनुभव करना पड़ता है .जिन्हें मुक्त होने की इच्छा है या जो मुक्त होना चाहते है बे स्वयं के मन को जाने बौध्द – साहित्य की ये शिक्षा उसकी विशेषता है और हमारे मन का प्रतिबिंब भी है .

जितनी तरह के लोग उतनी ही तरह के दिमाग उतनी ही तरह के दिल और उतनी ही तरह के इश्क .....रिश्ते भी ऐसे ही होते है हर रिश्ते में सूत्र , दर्शन, तर्क, आत्मा, समर्पण, द्वन्द है जो कभी नजर आता है कभी नहीं, पर होता तो है ही मुश्किल तब होती है जब कुछ रिश्ते चेतना ही नहीं अंतश्चेतना तक को अपने अधीन चाहते है और यहीं आकर HE या SHE विस्तार की चाह में निरंकुश हो जाते है और अपने अंह से दुसरे के स्वाभिमान को चुनौती देते है . बिना ये समझे बिना ये जाने कि इससे रिश्ते में आकर्षण खत्म होगा और अपकर्षण ही पैदा होगा जो सामाजिक प्रतिपालनाओं के प्रति कोई एक बावरा विद्धोह करेगा और प्रेम, लक्ष्य, सपने के लिए मुक्त हो देहरी लांघेगा .


अपकर्षण जहां शुरू हो जाता है वह हमेशा पलायन ही होता है तभी तो गौतम बुद्ध हो मुक्त हुए. अगर आप अधिकाधिक प्रतिदान की मांग अपने रिश्ते से करते है तो एक न एक दिन रिश्ता ठंडा पड़ता है और आप रिश्ते से दूर हो जाते है . मूलभूत प्राकृतिक व आदिम प्रवृतियों से न प्रेमी न दांपत्य और न ही माँ जैसे पवित्र रिश्तों को बांधा जा सकता है इसलिए मुक्त हो बंधन से रिश्तों से नहीं.             

Monday, July 20, 2015

मैं एक स्त्री





मैं एक स्त्री ईमानदारी से अपने सारे दोष को स्वीकार करती हूँ और उनकी जाँच - पड़ताल करती हूँ तो ये पाती हूँ हर बार पुरुष जाति पर लगा के तोहमत और बन कर अबला मैंने अपने उन दोषों को खूबसूरती से छिपाया है जिन्होंने मुझे हमेशा कमजोर किया है . इन दोषों को मैंने मेरे अन्दर खुद ही पैदा किया सदियों से उन्हें पोषा और वक्त आने पर उन दोषों को बिचारी , अबला, त्याग की देवी और ना जाने कितने नाम देकर अपने वजूद के साथ ऐसा आत्मसात किया कि सतयुग से लेकार आज तक मैं उनका इस्तेमाल अपनी सुविधा अनुसार करती आ रही हूँ और जब कभी मैं इसमे सफल नहीं हो पाती तो लगा कर पुरुषों पर दोषारोपण अपने दोष को जस्टिफाई करती रही हूँ .
परम्पराएँ , रीति -रिवाज , संस्कार सब को बनाने में मेरा साथ था और उन्हें समाज को सिखाने में मेरी भूमिका पुरुष से ज्यादा थी फिर भी मेने ही उन परम्पराओं की दुहाई दे दे कर अपने आप को कमजोर करने में जुटी रही क्यों ....? क्योकि मैं अपने ही बनाए खोल से बाहर नहीं निकलना चाहती थी .
मैं एक स्त्री आज ईमानदारी से ये स्वीकार करती हूँ कि हमारी दुनिया कि क्रांति सिर्फ और सिर्फ हमारे दोषों को स्वीकार करने में है खुद को खुद से बचाने में है शायद ये प्रतिक्रांति ही हमें हमारे आत्मसम्मान , आत्मविश्वास से मिला सकती है जिसे हमने अपने खोल में जिसमे हम वर्षो से बंद है उसके बाहर कही दूर फेक दिया हैं .

Saturday, July 4, 2015

मैं और मेरा विश्वास


अपने पुरे वजूद के साथ 
मेरे वजूद का हिस्सा 
वो मेरा है और मैं उसकी 
अजीब सा है हमारा गठजोड़ 
शायद गठजोड़ नहीं हम घुल गए है एक दुसरे में 
मिश्री और दूध की तरह
उसने न जाने कितने दुखो को
मेरे सुखो में बदला है
मेरी ख्वाहिशों को हक़ीकत में
कभी जो थोडा सा इधर उधर हुआ भी
अपनी तेज सांसो को भर कर
होठों पर मुस्कान सजाये
मैंने लिपटा लिया अपने दामन में
और हम फिर साथ साथ थे
मैं और मेरा विश्वास