Tuesday, April 30, 2019

वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास❤

आगाही कार्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास
मेरे  ही  सीने  में  उतरे  हैं  ये  खंज़र सारे

बशीर फ़ारूक़ी जी ने शायद हम जैसो का दिल पढ़ कर ही ये शेर कहा होगा....

दो महीने की घर से बाहर व्यस्ता के चलते अव्यवस्थित घर से रूबरू होते ही सबसे पहले गर्म- ठंडी के कपड़े रखते उठते बेटी अपनी घाघरा- चोली दिखा कर बोली देखो मां मेरी ये ड्रेस कितनी छोटी हो गई है, इस बार में नई लुंगी और हैं इस बार मे ये भी लुंगी कहा कर उसने एक फोटो मेरी तरफ बड़ाई..

डिजाइनर पायल की फ़ोटो जिसे देख कर में अतीत मैं खो गई...

पहली बार इसे जब देखा तो उम्र रही होगी मात्र 22-23 साल,एक दिन अपनी सहेली के साथ सुनार की दुकान पर गई उसने वहां सुंदर से इयररिंग लिया लेकिन मेरी नज़र तो वहां रखी डिजाइनर पायल पर अटक गई, दाम पूछे तो अपने पर्स में सौ रु कम...

सहेली ने लाख समझाया अरे 100 रु की ही बात है मुझसे ले ले लेकिन न अपने सिद्धान्त आड़े आ गये। घर आकर सहेली ने मां को बताया तो माँ ने कहा ये ऐसी ही है ,जानती हूं ले ये रु और जाकर इसके लिए वही वाली पायल ले आ, मैं ने सुना तो, माँ को मना कर दिया मां कल आप ही ले आना बोल कर अपने कमरे में चली गयी ,बात आई- गई हो गयी ।

कुछ सालों बाद शादी तय हो गई घर वालो ने जो जेवर दिया अपन ने बिना पसंद किए भाई पर पसंद की जिम्मेदारी डाल कर इतिश्री कर ली।
ससुराल आकर देखा मायके से सुंदर सी पायल मिली पर डिजाइनर नही..
मन की ख़्वाहिश मन मे ही दबी रही ।
पहली होली पर घर गई तो मां ने पिता से कहा गुड़िया के पैर सुंदर से छोटे से है, देखिए इस तरह की पायजेब लाकर दीजिए, मेरा बहुत मन है उसके पैरों पर सुंदर लगेगी और पिताजी पायजेब लेने चले गये।
आलता लगे पैरो पर सात लड़ी की पायजेब जिसने मेरे पैरों को ढक लिया था और मेरे पैरों की शोभा भी बड़ा रही थी लेकिन मन मे फिर वही डेलिकेट सी डिजाइनर पायल दस्तक दे रही थी...।
वैसे भी मुझे डेलिकेट से ही जेवर पसंद है ।
नई- नई शादी के बाद एक दिन हम गृहस्थी सजाने के लिए शॉपिंग कर रहे थे, कि एकाएक मेरी नज़र पास ही दुकान पर लटकी डिजाइनर पायल पर पड़ी ...
मैं ने जल्दी से दाम पूछे दुकानदार ने बताए पर्स में देखा फिर से सौ रु कम थे, मन मसोस कर मैं चलने को हुई कि पतिदेव आ गये बोले कुछ लेना है अपनी संकोची प्रवति से शायद पर्दा हटाती तभी पतिदेव के शब्द सुनाई पड़े सब तो है और क्या करोगी लेकर और मैं चुपचाप उनके पीछे चल पड़ी ...।

आज जब बेटी ने डिजाइनर पायल की फ़ोटो दिखाई तो एक बार फिर से अपने पैरों पर नज़र गई समय की धूल ने चाहें  वैसा रूप रंग न रहने दिया हो पैर भी शायद उतने सुंदर न रह पाये हो लेकिन ख़्वाहिश आज भी वैसी ही है नई सी ...
लेकिन संकोच का पर्दा आज भी नही उठा सच कहा था पिता ने विदा के समय मेरी बेटी ने हम से कभी कुछ मंगा नही ये इसका अहं नही संकोच है वो कभी कुछ मांगेगी नही ये बात ध्यान रखना।
पिछले 14 सालों में कितनी बार संकोच को परे हटाने की भरपूर कोशिश की लेकिन अपने लिए कुछ मांगना ....।

 हजारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले...

3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 30/04/2019 की बुलेटिन, " राष्ट्रीय बीमारी का राष्ट्रीय उपचार - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सुंदर और सहज भाव से लिखा आप का ये लेख दिल को छू गया ,सच कुछ ख्वाहिशे अधूरी ही रह जाती हैं ,सादर नमस्कार

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