Tuesday, August 9, 2016

कविता का दिक् काल

युवा कविताएं उतार रही है कपडे
उन हिस्सों के भी
जिन्हें ढकने की कोशिश
में त्रावणकोर की महिलाओं ने
कटा दिये थे अपने स्तन
वो सुना रही है कहानी
उन पांच दिनों की
ये शायद टोटका है उनका
पुरस्कारों के वशीकरण का
कुछ कविताएं जो
चाहती है ज्यादा कुछ
उन्होंने स्त्री पुरुष के मिलन का
करा के पेटेंट कुछ भौडे शब्दों
के साथ खेलना शुरू कर दिया है
आ गये है विदूषक
उछाल रहे है पुरस्कार
ले रहे है खेल का मज़ा
दे रहे है आमंत्रण पुरस्कारों के साथ
उन्हें पता है ये कविताएं
अपने दिक् काल में है
वो जानते है इनको
मरोड़ा,खीचा,और सिकोड़ा
कैसे जा सकता है
युवा कविताएं हो कर खुश
अपनी टांगो के आस पास के क्षेत्र में
लगाती है गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत
लेकिन वो ये भूल जाती है वस्तुत:
गुरुत्वाकर्षण जड़ता का एक भाग मात्र है।

7 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 11 अगस्त 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. धन्यवाद यशोदा जी

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  2. हर ढकी चीज जैसे आतुर है खुद ही खुलने के लिये नये नियमों के हिसाब किताब से । बहुत सुन्दर ।

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  3. लेकिन वो ये भूल जाती है वस्तुत:
    गुरुत्वाकर्षण जड़ता का एक भाग मात्र है।
    ..न खेल कभी ख़त्म होता है न पुरस्कार बाँट ...

    बहुत सार्थक सामयिक प्रस्तुति

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  4. सभी का बहुत-बहुत आभार।

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