लोकतंत्र में व्यवस्थापिका को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है इस रूप में इसका उत्तरदायित्त्व भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है . भारत में व्यवस्थापिका अपने वास्तविक उतरदायित्व की कोई छाप नही छोड़ पाया. व्यवस्थापिका की सर्वोच्च शक्ति के सन्दर्भ में उसके कर्तव्यों का आभाव है. यह अपनी गरिमा के अनुरूप भारतीय समाज में मूल्य एवं आदर्श स्थापित नहीं कर सका है .यह राजनीति , सत्ता,अधिकार एवं व्यक्तिगत सुख -समृद्धि के इर्द -गिर्द सिमट कर रहा गया है.परिणामस्वरूप भारतीय समाज में असंतोष,अराजकता, भ्रष्टाचार जैसी नकारात्मक प्रवृतिया आम हो चली है. आवश्यकता इस बात कि है कि विभिन्न उपायों एवं सुधारों के द्वारा व्यवस्थापिका के व्यापक एवं प्रभावी उत्तरदायित्व को सुनिश्चित किया जाये.वस्तुत: यहा वास्तविक लोकतंत्र को स्थापित कर सकता है .
किरण कोई व्यक्तिवाचक संज्ञा न होकर उन तमाम व्यक्तियों के रोजमर्रा की जद्दोजहद का एक समुच्चय है जिनमे हर समय जीवन सरिता अपनी पूरी ताकत के साथ बहती है। किरण की दुनिया में उन सभी पहलुओं को समेट कर पाठको के समक्ष रखने का प्रयास किया गया है जिससे उनका रोज का सरोकार है। क्योंकि 'किरण' भी उनमे से एक है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
-
धरती को चूमने के हजारों तरीके है सारी व्याख्याएं खत्म हुई दिल का ताप बड़ा मेरे दिल मे छिपे तारे ने सातो दिशाएं रोशन की ...
-
मैंने अलसाई सी आंखे खोली है.लेटे-लेटे खिड़की से दूर पहाड़ो को देखा पेड़ो और पहाडियों की श्रंखलाओ के पीछे सूर्य निकलने लगा है, हलकी - हलकी...
-
हिंदी कविता को एक नई भावभूमि और चेतना के उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित करनेवाली कवयित्री डॉ किरण मिश्र की चेतना प्रवाह शैली में लिखी कविताओं में...
-
बहती रूकती इस जिन्दगी में कभी हरियाली होती है तो कभी पतझड़ आता है लेकिन जिन्दगी कभी रूकती नहीं. बहती जा रही इस जिन्दगी में कभी प्यार के दीप...
-
बेजुबान लब्ज झुकी डाल ढीठ सी लाज चीरती जब मधुर भय को रचती अधलगी महावर तुम विवश मैं अवश बचपन में मालवा के बिताए सालों में मां...
No comments:
Post a Comment