Sunday, April 9, 2017

जीवन दर्शन

हम भारतीयों की चेतना शक्ति जहां से प्रभावित होती है वो क्या है ? ये एक बड़ा प्रश्न है क्या वो हमारा धर्म यानी हिंदू धर्म है मतलब हमारे वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और शायद हद तक हमारा लोक जीवन वो लोक जीवन जिसका भाव भिन्न पूजा पद्धति ,भिन्न जीवन विधि होने पर भी परस्पर विरोधी तत्वों, सिद्धांतो और वृत्तियों को बटोर कर एक समाज में समेटने का कार्य करता है । विपरीत विश्वासों, रीतिरिवाजों,साधनाओं, उपासनाओं और सामाजिक प्रबंधों उत्तराधिकार आदि की योजनाओं को हिन्दू धर्म स्थान देता है।

हिंदू जीवन दर्शन के वैदिक दर्शन में हिंदुओं का जीवन के प्रति क्या दृष्टिकोण था
वो ये था कि मनुष्य पूर्णरूप से इच्छाओं का बना हुआ है जैसी उसकी इच्छाएं होगी वैसी उसकी विचारशीलता होगी जैसी उसकी विचारशीलता व समझ होगी वैसे उसके कर्म होंगे और जैसे उसके कर्म होंगे वैसे उसका भाग्य । इसे ऐसे भी सकते है

सिक्रोनिसिटी अर्थात तुल्यकालिक या संक्रमिक घटनाचक्र

संपूर्ण विश्व में चीजें एक दूसरे से जुडी होती है और उनमें एक विशिष्ट तालमेल बना होता है ऐसे कई नियम सृष्टि में अविरत काम करते है। नियमों का हिस्सा हम सभी है जाने-अनजाने अगर हमारे विचार,   वाणी या आचरण इन तत्वों या नियमों के विपरीत अभिव्यक्त हो रहे हो तो वही ख्वाहिशों के रास्तों, रुकावटें अवश्य पैदा करेंगी।

दा लॉ ऑफ़ कॉज एंड इफेक्ट भी यही है । हमारे कर्म तीन स्तरों पर होते है विचार, वाणी, आचरण इन तीनों स्तरों से निर्माण होता है जब इन तीनों में संपूर्ण एकरूपता होती है तब निर्माण की गति न सिर्फ तेज होती है, बल्कि आविष्कार का तरीका भी अनूठा होता है। कर्म और इच्छाओं के बीच एक सयोजन होता है वर्तमान का अतीत के साथ निरंतरता में विशवास वर्तमान को भविष्य में अभिव्यक्त करना  ये सब हिंदू जीवन दर्शन के पक्ष है।

हम पश्चिम की तरह देहवादी नहीं आत्मवादी है इसलिए हम अधिक भावुक और संवेदनशील है ये हमारी शक्ति है और कुछ मायनो में कमजोरी भी शायद इसीलिए भौतिकता का विकास धीमी गति से हमारे यहां हुआ है लेकिन खुशियों में विकास और उमंगो में गति है। हम जीवन को गहराई से जीते है,संबंधों को तरजीह देते है और आत्मोत्थान में लगे रहते है।
कामिहि नारी पिआरी जिमि, लोभिहिं प्रिय जिमि दास
तिभि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागंहु मोहि राम
इन पंक्तियों में भारतीय दर्शन की मूल अवधारणा छिपी है। भारतीय जीवन भोग से योग तक विस्तृत एक विराट जीवन दर्शन है।
भारतीय जीवन दर्शन सिर्फ संन्यास युक्त नहीं है उसमें अर्थ,धर्म और काम भी है संन्यास तो अंतिम अवस्था जीवन विकास की है । हमारे यहां का संन्यास व्यक्ति को समाज से न तो पलायनवादी बनाता है और न ही अकर्मण्य, वो तो व्यक्ति के जीवन को बहुजन हिताय के सर्वोच्च शिखर तक उठा देते है। संन्यास का मतलब व्यक्ति के जीवन की अंतिम अवस्था का सुन्दर विन्यास।
हमारे देश के साथ-साथ हमारे जीवन दर्शन जिसमे धर्म भी शामिल है लोकतान्त्रिक है हमने हमारे धर्म को तानाशाह नहीं बनाया बल्कि हमारे धर्म और दर्शन में वसुधैव कुटुम्बकम रचे-बसे है हमने वनस्पतियों से लेकर अंतरिक्ष तक को अपनी प्रार्थना में शामिल किया है।
भारतीय दर्शन इतना व्यापक है जिसमे न जाने कितनी साधना पद्धतियां,अनुष्ठान,अवधारणाओं का प्रावधान है कई-कई मार्ग है भक्ति और मोक्ष  जिसने हमें सहिष्णु बनाए रखा है तभी तो हम सर्वे भवंतु सुखिनः की बात पुरे मन से करते है। यही हमारी मौलिकता है यही हमारा दर्शन का मूल स्वरूप एवं यही भारतीयता है।

3 comments:

  1. विस्तार से अपने धर्म और जीवन दर्शन को रखा है आपने ...
    शायद यही वजह है की हस्ती मिटी नहीं हमारी ... कितने आये गए ....

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  2. आभार आप का ,ये दर्शन ही भारतीय जीवन पद्धति है दिगम्बर जी।

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन परमवीर - धन सिंह थापा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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