Wednesday, September 14, 2016

यात्रा

सुदूर अतीत के
मुर्दे टीले में बने
तालाब की आखरी सीड़ी पर
पड़ी हुई जली लाश
असल में फिनिक्स पक्षी है
जो अपनी ही राख से
पुन: जीवित
स्त्री बन
सभ्यताओं के आंसू से
लिख रही है विशिष्टता की दास्तां
सभाल रही है
विशिष्ट व्यवस्थाओं के दस्तावेज
जिसमे है रूमानियत की लाश
ज़ज्वातो की डिबिया
गीतों के मिसरें
कैदी मुस्कान
नफरतो के साय
धोखे की कहानी
बेपनाह दर्द
इलज़ाम का सन्दूक
आंसुओं से लिखा प्रेम पत्र
जिसमे लिखा है
पुरुष स्त्री के सम्मिलन की कहानी
और त्रिपथगा की यात्रा का मन्त्र
जिसे अपनी आत्मा के सुरों में डाल
पहुँचा रही है हर सभ्यता में।

Sunday, September 4, 2016

प्रेम बिंदू

सूक्ष्म खुशबू, भीनी गंध
ऐसा ही होता है प्रेम
प्रेम मतलब एक बिंदु पर खड़ा होना
या
अंतस से एक स्त्री का पुरुष होना , पुरुष का स्त्री होना
प्रेम, हर पल चलती सांसो का उत्सव
या अस्तित्व में समाई जीवन- मृत्यु
उल्लास,उमंग का जरिया
प्रेम मतलब उर्जा, सृजन, जीवन, आशा, विश्वास, उम्मीद
प्रेम, एक ऐसा झरना
जिसमे छपछापाना
या
चुम्बनों के साथ
रंग में लिपटना
आधी रात और होते हुये दिन के बीच
धुन, गंध, लय, ताल,  सुर, सुन्दरता
में समा जाना
प्रेम मतलब यायावर
निकल जाना  रास्ते से मिलने
भूरी मटमैली धूप या उठते धूल के गुबार
में रूहानी खुशबू लेना
किसी नूरी मछुआरिन या
महुआ घटवारिन की कहानी
को सुन सीने से लगा लेना
या
अनगिनत परिदों से भरे आसमान में भी
शोकगीत बजाती हवा से
दुःख साझा कर लेना
प्रेम मतलब मूक भाषा की लोरियां
सोधी रोटियां
प्रेम, झुके हुये लोग उनकी
पीठ पर रखे हाथ का स्नेह
रास्तो को बुहारती आंखें
प्रेम,अज्ञान-ज्ञान-विज्ञान
प्रेम
सत्यम शिवम् सुन्दरम

Sunday, August 21, 2016

बचपन की गूंज

वो गूंजते दिन बचपन के
झूमते आंवले के पेड़
बचपन तोड़ता तेदू फल
और खंडहर हुये
किले में
छुपती किलकारी
सर्पीली सडको से दौड़
पहाड़ो पर चड़ना
जालपा मैया के
घंटे के लिए
घंटो मशक्कत करना
आज भी
भीड़ के सूनेपन में
मंदिर के घंटे
याद दिल ही देते है
बीते बचपन की।

Tuesday, August 16, 2016

लाल सलाम

तेदू पत्ता तुड़ान करते हुये एक दिन
मेरे ही धधकती जवानी से
ठेकेदार ने जब बीड़ी सुलगा ली तो
मैं नहीं बची
गुम हो मिल गई
दंडकारणय  की गुमनाम कहानियों में
लेकिन कहते है न
कुछ बचा रह जाता है
सो बची रही
नख भर उम्मीद  नख भर ताकत
उसी से ले हाथ में बगावत की विरासत
गांधी के न्यासिता के सिद्धांत को नकारा
लैण्ड माईन बिछाई लाल विचारों की
और कर दी घोषणा क्रांति की
उखाड़ फेका सत्ता, पुलिस, सेना को
हो कर खुश हवा में उठाया हांथ
मुठ्ठी बंद की और जोर से चिल्लाई
लाल सलाम
मैं आजाद थी
वर्ष बीते, बीते आजादी के ढंग
देख रही हूं हर तरफ
सिद्धांत परिभ्रमण का।
लोमड़ी जिसे मिली थी आजादी
बन के वो शेर शासक कहला रही है
अधोवस्त्र  फेक बीड़ी सुलगा रही है
मैं क्रांति की बात करने वाली
खुराक बन सत्ता की
कब की शेरों  के गले उतर चुकी हूं
मार्क्स तैयार है वर्ग संघर्ष के लिए
सलामी दे
हवा में हाथ लाल सलाम।

Tuesday, August 9, 2016

कविता का दिक् काल

युवा कविताएं उतार रही है कपडे
उन हिस्सों के भी
जिन्हें ढकने की कोशिश
में त्रावणकोर की महिलाओं ने
कटा दिये थे अपने स्तन
वो सुना रही है कहानी
उन पांच दिनों की
ये शायद टोटका है उनका
पुरस्कारों के वशीकरण का
कुछ कविताएं जो
चाहती है ज्यादा कुछ
उन्होंने स्त्री पुरुष के मिलन का
करा के पेटेंट कुछ भौडे शब्दों
के साथ खेलना शुरू कर दिया है
आ गये है विदूषक
उछाल रहे है पुरस्कार
ले रहे है खेल का मज़ा
दे रहे है आमंत्रण पुरस्कारों के साथ
उन्हें पता है ये कविताएं
अपने दिक् काल में है
वो जानते है इनको
मरोड़ा,खीचा,और सिकोड़ा
कैसे जा सकता है
युवा कविताएं हो कर खुश
अपनी टांगो के आस पास के क्षेत्र में
लगाती है गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत
लेकिन वो ये भूल जाती है वस्तुत:
गुरुत्वाकर्षण जड़ता का एक भाग मात्र है।