Thursday, March 8, 2018

पुरुषों के नाम पत्र

पुरुषों के नाम पत्र
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एक पत्र जो आप को वो पात्र बना देगा जिसकी कोशिश आप एक युग से कर रहे है....

सारी दुनिया औरत के इर्द गिर्द
औरत की दुनिया चूल्हे के इर्द गिर्द।

आप श्रेष्ठ है और हम हीन इस भावना से मुक्त हो...
जरुरी है बेहतर समाज के लिए

श्रम की परिभाषा मानवीय मूल्यों पर आधारित नहीं है। अगर होती तो निःसंदेह स्त्री के योगदान को पहचान मिलती और उसका मूल्यांकन भी होता।
जाने दीजिए हम मांग नहीं रहे लेकिन हमारे श्रम को उचित सम्मान तो दीजिए अगली बार जब आप से कोई पूछे की आप के घर की महिलाएं क्या करती है तो ये मत कहिए कुछ नहीं , पत्नी से तो बिलकुल भी नहीं कि तुम्हारा क्या ? दिन भर घर पर ही रहती हो...मैं काम करके आया हूं ।
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शुभकामनाएं हम आपस में ले - दे लेंगे आप तो बस अपना एटीट्यूड बदलो
#किरण

Monday, March 5, 2018

तुतलाते बोलों में मौत की आहट

एक अंतहीन रात में
एक औरत तोडना चाहती है दुस्वप्न के जालों को

वो छाती की दर्दनाक गांठ में दबे
उस शून्य को निकाल देना चाहती है
जो हर चीख के साथ बढ़ता जाता है
और हटाना चाहती है
इर्द गिर्द जमा डर की बीट को

वो रखना चाहती थी जिंदा
सत्य, न्याय, प्रेम की कहानियों को भी
जो पिछली रात उसने सुनाई थी
उस फूल को जिसे
टिड्डियों ने तबाह कर दिया

अब किलकारियों के साथ
कहानियां भी दफ़न है

हिंसा से बचने के नुस्खे खोजना चाहती है वो औरत
हर उस फूल के लिए जो अभी खिले नहीं
हालाँकि पिछली रात टैंकों के नीचे
एक नन्नी धड़कन दबा दी गई है

गर्भ धारण करने वालियों को नहीं पता
कंस ने फूलों पर हिंसा की शुरुआत
उसी दिन कर दी थी
जिस दिन वो देवकी के गर्भ में छुपे थे।
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Monday, February 12, 2018

कविता का दिक्‌ काल

कुछ ठेके पर उठी कविताएं
अपने आप पर रश्क़ कर सकती है उनके मालिक कुछ ख़ास किस्म के होते है। दुनिया उन्हें सलाम करती है।
वैसे सजदा करते उनकी भी उम्र बीत रही है।

कुछ इतनी खुशकिस्मत नहीं
वो फुटपाथ पर ही जन्म लेकर वही मर जाती है हालाँकि मुझे ख़ुशी है कि वो उनकी तरह नहीं जिनकी रूह तक बजबजा रही है ।

ऐसी कविताएं अक्सर नज़र आ जाती है जो प्रेम को याद करती है बार-बार और फिर आहे भरती है हालाँकि प्रेम को फ़ना हुए एक युग बीत गया

कुछ कविताएं ऐसी जादू की टोपी पहनातीे है बस एक हाथ हिलाया और तमाम नामजद पुरस्कार उनकी जादू के झोली में।

इंसानी हांथों में बिछी दरारों की तरह कुछ कविताएं हर उस दरार में घुस झांकती है जिसमे वर्षो से थकी रूह सांस लेना भी भूलती जा रही है।

नतीजा दरारों में ही दम तोड़ती है

कुछ तो अजीब अहमक (लोग उन्हें ऐसा ही कहते है) किस्म की कविताएं है कभी -कभी अपनी धौंकनी सी सांसों से तमाम अंगारे गिराती है, और उन पर अपने फूंक का मंतर मार-मार कर दफन हुई बातों को जिन्दा करने की कोशिश करती है ,क्योंकि उन्हें लगता है कुछ बातें दफन नहीं हुई जबरदस्ती जिन्दा दफना दी गई है।

कुछ कविताओं का ये भी शौक भी है वो कब्र खोद दुर्घटनाओं को निकालती और घटना बना लोगो के बीच सनसनी फैला कर चर्चा में रहना चाहती है ।

लेकिन एक दर्द है एक कविता का (जब दर्द गहरा हो तो प्रश्न बन जाता है )वो ये कि जब सब कविता है तो वो साथ क्यों नहीं ?

वैसे ये समय क्या है ? कविता का लोकतंत्र, भेड़तंत्र, तानाशाही या तमगाशाही ?
जो भी हो कुछ कविताएं सर को उठाए न्याय मांग रही है.... मिलेगा क्या?

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Tuesday, January 30, 2018

घनघोर अंधेरे में

घनघोर अंधेरे में जो दिखती है,
वो उम्मीद है जीवन की

हिंसक आस्थाओं के दौर में प्रार्थनाएं डूब रही है
अन्धकार के शब्द कुत्तों की तरह गुर्राते
भेड़ियों की तरह झपट रहे है
उनकी लार से बहते शब्द
लोग बटोर रहे है उगलने को

जर्जर जीवन के पथ पर पीड़ा के यात्री
टिमटिमाती उम्मीद को देखते है
सौहार्द्र के स्तंभ से क्या कभी किरणें फूटेंगी

उधेड़बुन में फँसा बचपन
अँधेरे  की चौखट पर ठिठका अपनी उँगली से
मद्धिम आलोक का वृत खींचना चाहता है

एक कवि समय की नदी में
कलम का दिया बना कविताओं का दीपदान कर रहा है।
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#यहदेशहैवीरजवानोंका
कैसे -कैसे सपन सँजोय,
टुकड़ा-टुकड़ा गगन समोय।

Saturday, January 27, 2018

सागर लहरी सा प्रेम

ले चल मुझे भुलावा दे कर मेरे नाविक धीरे-धीरे
जिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरी
निश्चल प्रेम कथा कहती हो तज कोलाहल की अवनि रे”
( जयशंकर प्रसाद) कभी कभी नाविक अकेला ही सागर पार किसी अनजाने गांव का दरवाजा खटखटा देता है💕❤🍁

किसी अनजाने गाँव में
अनजाने घर की कभी न कभी
सांकल खटकती ही है
खिड़की खुलती है तो शुरू होती है 
दास्ताने उल्फ़त
आँखों एहसास करती है दिल एतबार करता है
फिर दोनों का
न होने से टकराता है
शायद रूह ने साथ छोड़ा है जिस्म का
शुरू होता है रतजगा
ठिठुरी लम्बी रातों का
कहानी आगे बड़ती है
एक तारे की सिसकी 
ध्यान की कश्ती से दरिया पार करती है
उल्फ़त के तराने गूंजते है
साहिबान की दास्तान
अंगड़ाई लेती है 
चनाब से गंगा तक
फूलता है झरता है
महुआ घटवारिन के 
किस्से सा प्रेम
सदियों से बहता है।
💗💕

💟प्रेम आदि न अंत ,हज़ारों ख़्वाहिशें पे दम ।