Wednesday, March 16, 2016

दिमाग की सलाखों में कैद स्त्री

 उन्नीस सौ साठ के दशक से या यूं कहें कि उत्तर-आधुनिकता के आगमन से विश्व के सामाजिक,राजनितिक चिंतन और व्यवहार में कुछ नए आयाम जुड़े है। परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष से मानव समाज के सामाजिक जीवन एवं व्यवहार में बदलाव होता जा रहा है। सामाजिक व्यवहार तथा मूल्यों में हो रहे बदलाव अच्छे भी है और नहीं भी । इसका निर्णय जितना अच्छा भविष्य देगा उतना वर्तमान नहीं।
इस बदलते हुए समय का सबसे ज्यादा अगर किसी पर प्रभाव पढ़ा है तो वो है स्त्री। आज स्त्री पश्चिमी रंग में रंग कर उसमे ढली है परन्तु अपने दिमाग की सलाखों में वो आज भी कैद है इसलिए वह सहज और शांत नहीं वो अपनी स्वतंत्रता को अपना आत्मविश्वास नहीं बना पा रही है। स्त्री - सशक्तिकरण नारे सिर्फ जुमले बन हवा में तैर रहे है और वो प्रश्न अनुत्तरिण है कि स्त्री समाज के लिए क्या है?और समाज उसे कैसे देखता है?
क्या स्त्री -पुरुष समान है ? या समाज स्त्री को द्धितीयक मानता है या आज भी गुलाम या दासी मानता है। क्या समाज स्त्री को लेकर आज भी कुंठित है ?
ये यक्ष प्रश्न है इन सवालों के उत्तर के साथ ही समाज में मनुष्यता स्थापित हो जाएगी । इसलिए ये जरुरी है कि समाज इन सवालों को हल करे और स्त्री पुरुष संतुलन को कायम करे।
स्त्री सृजनकर्ता रही है । हमेशा से उसने जीवन को रचा है उसे सवारा है। सभ्यता का मानवीय विकास स्त्री की ही देन है । उसने गुलामी और प्रताड़ना से हमेशा समाज को मुक्त कराया है, उसने मानव जीवन का रूपांतरण कर समाज को सभ्य बनाया है।(सम्राट अशोक कलिंग युद्ध और गोप)।
आज बदलते हुए समय में सारे समाज की जिम्मेदारी बदल रही है इस बदलते समाज में स्त्री की जो सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वो है उसका अपने प्रति जिम्मेदार होना ऐसा जिम्मेदार होना जिसमे भ्रम न हो ।
उसे संतुष्टिकारण का शिकार नहीं होना है उसे अपने दोषों और कमजोरियों पर भी नजर रखनी होगी और अपना आंकलन खुद ही करना होगा। उसे खबरदार भी रहना होगा कि वो प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल  तो नहीं हो रही है।
समाज में अपने स्थान को बनाने के लिए अपने संघर्ष को  देह-विमर्श  में उसे नहीं बदलने देना है और उन स्त्रियों से भी सावधान रहना है जो देह-विमर्श के नाम पर स्त्रियों की जिन्दगी को और कठिन बना अपने को चमकाने में लगी है।
विभिन्न सम्प्रदाय,धर्म,जाति में फैले हमारे देश में स्त्रियों के संघर्ष बहुत अलग-अलग है जिनकी जड़े गहरे से गढ़ी है स्त्रियों को उन गढ़ी हुई बेशर्म जड़ो को निकाल कर अपने लिए उपयोगी बनाना है ताकि उस पर संस्कृति, मानवता, नैतिकता का पौधा लहरहा सके और स्त्री स्वतंत्रता के फल उस पर आ सके।
अगर स्त्री हमारे देश में फैली समस्याओं जाति,धर्म आदि को नजरंदाज करती है तो उनकी मुक्ति की आस बेमानी होगी।
स्त्री को अपने संघर्ष में चाहे घर हो या बाहार स्वलाम्भी  होना होगा उसे चाहें पारिवारिक शोषण को तोडना हो या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना हो दोनों ही सूरत में परिवार में पारिवारिक लोकतंत्र व कार्य स्थल में अपने हुनर का इस्तेमाल करना होगा न कि स्त्री होने का इस्तेमाल।
स्त्री का सवतंत्रता के संघर्ष को लक्ष्य उसके चरित्र की द्धढता से मिलेगा और हर न्याय तभी मिलेगा। वो खुद भी अपने साथ तभी न्याय कर पाएगी जब वो अपने स्त्री होने को पीछे कर मनुष्य होने के बोध को जगाएगी।
अन्तत: इस संकटग्रस्त मानवीय संबंधो के समय जब की रिश्ते पल-पल बदल रहे है लोग भ्रमित है उलझे है परेशान हो मशीन बन भाव और संवेदना खो रहे है विगत की भूल ने रिश्तो की नीव कमजोर की है ऐसी दशा में स्त्रियों को मानवीय संबंधो को पुन:स्थापित करने में अहम् भूमिका निभानी होगी उसे अपनी अंतरात्मा की कसौठी पर खुद अपने को पुरुष को और उन बच्चों को कसना होगा जो कल पुरुष बन स्त्री-पुरुष के संबंधो को जीयेंगे।लेकिन जीवन मुल्य को चलने के लिए गति को लय में चलन ही होगा पुरुष गति है शिव है और स्त्री लय है शक्ति है शिव बिना गति के शव है और स्त्री बिना लय के शक्तिहीन अर्धनारीश्वर के रूप में पुरुष समानताओं और विपरीतताओं से परे स्रष्टि को गति और लय देते है तभी सुन्दर और शांत स्रष्टि की रचना हो सकती है।
ये सम्बन्ध संतुलित हो जीवन में गुणवता बनी रहे समाज में सकारात्मकता और सृजनात्मकता बनी रहे इसलिये ये जरुरी है कि स्त्री हर बार नए सिरे से खुद को और पुरुष  के साथ उसके रिश्ते को परिभाषित करती रहे।
आने वाली सदी में स्त्री-पुरुष के संबंधो में उर्वरता बनी रहे और बुद्ध के दर्शन सम्यक जीवन का आधार स्त्री-पुरुष जीवन का आधार हो हम ये कामना तो कर ही सकते है।  

Monday, March 7, 2016

पुकार

सुनो कृतिवासा
मैं तुम्हारी ही एक अंश
तुम मुझे जोड़-जोड़ कर
दे सकते हो जीवन,
या मुझे कण-कण में बिखेर कर
कर सकते हो विलुप्त ।
ओ शम्भू
तुम मुझे दे सकते हो उर्जा
भर सकते हो मेरे अन्दर प्रकाश
इतना की अंधकार में मैं
नक्षत्र की तरह चमकूँ,
अरे ओ स्मरहर
तुम मुझे फेक सकते हो
घनघोर अंधकार में
हमेशा के लिए खोने को
ओ मृत्युञ्जय
दिखा सकते हो रास्ता
बन के प्रकाश की किरण
ताकि में भेद सकूं
अन्धकार में भी लक्ष्य को ।
शंकर
जगा दो मेरी वो ऊर्जा
जो पढ़ी है मेरे ही अंतस में
ताकि उसे लेकर मैं
अपनी ही पद प्रदर्शक बन जाऊ।
सृष्टिहरता वृषध्वज
सहारा दो
ताकि लेकर शांति का ध्वज
सब से एक रूप हो जाऊ।

Wednesday, February 17, 2016

वसुधैव कुटुम्बकम

अंधेरे तुम कितने खूबसूरत हो
जो आशा देते हो उजाले की
रास्ते तुम कितने सच्चे हो
जो मंजिल देते लक्ष्य की
पहाड़ तुम कितने दयावान
जो ऊंचे हो कर भी सुरक्षा देते हो
ओ बहती नदियां तुम कितनी प्यारी हो
जो बिना रुके बिना थके चलना सिखाती हो
अरे ओ दरिया तुम से मिल कर
हमने विराट होना सीखा है
और झरने तुम ने हमें देना सिखाया है
माँ वसुंधरा तुम कितनी सहनशील हो
जो हमारे पांवों की चोट सह कर
भरती हो हमारे अंदर सुन्दरता
सिखाती हो हमें बिना रुके सृजन
ओ माँ हम तुम्हारे प्यारे बच्चे तुम्हें क्या दें?
हाथों में हाथ ले कर सम्मलित हंसी दे
या माँ तोड़ दे सारी सरहदे जो तुम्हें
तुमसे ही अलग करती है
या लिख दे तुम्हारे दिल पर
वसुधैव कुटुम्बकम

Wednesday, January 20, 2016

बेजुबान प्रेम

तुमसे प्रेम है ,
ये बतलाने के लिए
नहीं चाहिए कोई शब्द,
और न ही चाहिए
कोई बहाना
जिसमे बातें हो
धरती से आसमान की,
मेरे शब्द
हो कर मौन
आ बैठे है
मेरी सांसो से
पलकों में
और मुस्कराते है
होंठो से
फिर एकांत का लेकर सहारा
मेरी अंगुलियों से
तुम्हारी अंगुलियों में समा ,
बदल जाते है
प्रकाश पुंज में।
(प्रेम की बेजुबानी भी गजब की जुबां रखती है । वाह रे अलहदा प्रेम )

Wednesday, January 6, 2016

अब और नहीं

अभी-अभी तो शरद ने अपनी खुमारी छोड़ी थी अंगड़ाई ले कर दिल में कुछ सरगोशियां कि ही थी की बीते बरसो का धुँआ आँखो में सामता चला गया।
अहसासों के मंजर में ये कौन से अहसास है जो शब्द छीन कर आंसू थमा गए।
कहां से लाए वो पल जो सजा दें मेंहदी लगे हाथो में हसीन सपने। कोई उन परियों को बुला भी दो जो अपने आगोश में ले मायूस सी मासूम को कोई ऐसी कहानी सुना दे जिससे वो कुछ पल के लिए पापा को भूल जाए।
हलांकि जो चले गए है वो नहीं लौटेंगे पर उन सभी के दरवाजे कभी बंद नहीं होंगे ये सोच कर कि उनके साथ बिताए लम्हों की शायद आहट ही आ जाए।
मोमबत्तीयां लिए हम खड़े तुम्हें इतिहास होता हुआ देख रहे है दुःख इसका नहीं दुःख तो इसका है कि सभ्यता के बदलाव की लडाई का अंत नजर नहीं आता। हर जगह आंसू ठहर गए है। ये कौन सा मिजाज़ है जो फीकी रंगत वाला है। फिजाओं हम न उम्मीद नहीं होंगे अब चाहे सफेद फूल खिल दे सरहद के पार या तिरंगा पर अब और नहीं।