Friday, April 10, 2015

संभावनाओं के गीत



तुम्हे सुना था मैं ने
सावन की गीली हवाओं में
जब रोपती थी तुम कोई गीत नया
जब साँझ पड़े अँधेरा हाथ पसारे
भर रहा होता बाँहों में दिन को 
दिया जला प्रकाश को रस्ता दिखाती
वो तुम ही थी
अशोक को साक्षी बना
अस्तित्व की रक्षा करती
वो भी तुम थी
इतिहास में मानवता की लाज बचाती
तुम ही थी कोई और नहीं
फिर आज तुम क्यों भूल बैठी हो खुद को
तोड़ दो वक्त की बाड़ें
बिछा लो समय को अपने लिए
विकसित करो अपने अन्दर
जीवन कर्म का सौन्दर्य
फिर से सुनाओ संभावनाओं के गीत

Wednesday, April 8, 2015

सूखे मनुपुत्र



मै मनुपुत्र!
साफ करता हूँ
जिन्दगी के धुंधलके को,
सारे नाजुक जज्बे सर्द पड़ गए
अन्दर का बैल थक कर जुगाली करता है
और तब तक करता रहता है
जब तक बातो की डचकरों से,
तानो की ठोकरे उस पर प्रहार नहीं होते
मुझे फिर से बैल बनाने के लिए।
मेरे सामने होती है
एक लम्बी फेरिस्त
जिसमे होता है
ख्वाहिशों का लम्बा सिलसिला
जो मेरे सींगो पर रख दिया जाता है
काश मैं ख्वाहिशों को सींगो से नीचे रख पाता,
मोड़ पाता पीछे गर्दन
देख पाता गुजरे गुबार को,
पतझड़ सावन में भेद कर पाता
समेट पाता जिन्दगी के बिखराव को
और बता पाता कि,
ऐसा दरिया हूँ जिसके किनारे सूखे हैं
मैं मनुपुत्र
अभिशापित हूँ देखने के लिए
सामने प्रलय होते हुए,
समंदर के हर कतरे को अंतस में जब्त करने को।

Monday, April 6, 2015

शून्य

अभी अभी लौटाये है मैंने सांसों के आमंत्रण को
तोड़ा है प्रेम के घेरे को
कोई इंतजार नहीं
नहीं चाहिए मुझे कोई देवदूत

मैं अपनी ज्योति और साथी स्वयं हूँ
मैं खीचूंगी एक समान्तर रेखा
जो इतनी गहरी हो जितनी मैं
पर हो हम अकेले अकेले

क्योंकि ये अकेलापन मुझे ले जायेगा मेरे ही अन्दर
और तभी भेद सकूंगी सच और सपने के अंतर को
ये यात्रा तब तक होगी जब तक शून्य न आ जाये

Thursday, April 2, 2015

अग्रदूत

कितना अच्छा हो
मन के रेगिस्तान को
कोई फूलों के गीत सुनाए

थके हुए इन पग को
कोई शीतल जल धो जाए

पतझर वसंत में अटकी दुनियां
की कोई गांठ खोल जाए


कितना अच्छा हो
कोई निराला मिल जाये
और वो फिर से वसंत अग्रदूत बन जाए

Tuesday, March 31, 2015

माया

जैसे आत्माएँ दबी हो आकांक्षाओं में
और कामनाएँ अपने नुकीले नाखूनों से
फाड़ रही हों बुद्ध के साधन चातुष्टय को
माया डोर ले हाथों में
बना कर कठपुतली
दिग्भ्रमित करती है दुनिया के पथिक को
भ्रमित पथिक कहाँ सुन पता है
आत्मा की वेदना और कहा देख पता है
माया के खेल को
वो मगन रहता है अहम् ब्रह्मास्मि में