Monday, February 10, 2014

अरावली, पन्ना धाय और मैं

अरावली  से मेरा पहला परिचय शायद कक्षा चार या पांच की हिन्दी की किताब के नाटक “पन्ना धाय” मे हुआ था. पन्ना धाय  नाटक के पात्र सोना के मुंह से सुना कि पन्ना धाय राजमहल मे अरावली पर्वत की तरह अडी खडी है, इस वाक्य ने  मेरे नन्हे मन मे ये विचार पैदा किया कि निश्चित ही अरावली पर्वत बहुत ही विशाल और वन तथा वनजीवो से भरा होगा उस दिन से मेरा सपना उस पर्वत को देखने का बना रहा. सन 1998 मे इसे देखने का सौभाग्य मिला जब आगरा के रास्ते मैने राजस्थान मे प्रवेश किया मुझे सोना कि बात बिल्कुल सही लगी सच पन्ना धाय ना सिर्फ राजमहल मे इतिहास मे जिस त्याग, समर्पन और हिम्मत से आज भी खडी है और हम भारतीय नारियो को गर्व से भर देती है उसी हिम्मत से मुझे तो अरावली राजस्थान की सीमा मे अडा हुआ दिखा उसकी विशालता मे सुरक्षित होने के अहसास को मैने राजस्थान की धरती पर महसूस किया. हमारी व्यवस्था मे ना जाने कितने “बलबीर” आते जाते रहते है पर एक पन्ना धाय राजवंश को ना सिर्फ जिन्दा रखती है बल्कि उन्हे देती है श्रेष्ठ परम्पराये, संस्कार और त्याग. अरावली को देखते हुये भी मुझे इसी परम्परा का अहसास हुआ उसे देख कर लगा मानो घर के बुजुर्ग जिसने अपने श्रम से ना सिर्फ परिवार को परम्परा संस्कार व त्याग की सौगात दी है बल्कि अपनी कठोरता का दिखावा भले ही बाहर से किया हो घर के लोगो की कोमलता को बचाया है राजस्थान के नागरिको को अरावली ने कुछ ऐसा एहसास कराया है तभी तो मेरी उस राजस्थान की यात्रा मे पास मे बैठी मेरी सहयात्री अरावली पर्वत को हाथ जोड कर कहती है ये तो हमारे बुजुर्ग है ना जाने कब से खडे है हमारी सुरक्षा मे मैने भी उनके साथ हाथ जोड लिये और एहसासो से भर उठी. विषम परिस्थितियो मे वो क्या था जिसने पन्ना धाय् को थामा था अरावली भी राजस्थान के विषम मौसम को थामे रहता है तभी तो हरियाणा गुडगांव जैसे शहर मे राजस्थान हवाओ की रेत को छान कर भेजता है लेकिन कब तक? दैनिक जागरण मे पढी एक खबर ने मुझे चौंका दिया. अब अटल अविचल खडे अरावली पर होटल काम्पलेक्स बनेगे ............  क्या भूमंडलीकरण ने हमारी नैतिक सम्पदा को बिल्कुल ही समाप्त कर दिया है अरावली कोई भौतिक सम्पदा नही है उसे छिन्न भिन्न करने का मतलब हमारी परम्परओ हमारे संस्कारो को छिन्न भिन्न करना है राजस्थान की धरती पर पन्ना धाय के साथ खडे इस प्रहरी को समाप्त मत करिये हमारी श्रेष्ठ परम्पराये तो यही कहती है.              

Tuesday, December 17, 2013

क्या तू फिर से हमारी दुनिया मे नही आयगी?












तुझे गीता से समझा बाइबिल से जाना
बचपन से पढ़ा  गांधी  से माना
नरेन्द की बातो मे तू  थी
कुरान की आयतो मे तू  थी
टेरेसा तक तू  हमारे साथ थी
मानो कितने  हमारे पास थी
पर हे इंसानिय
हो गई उस दिन तू शर्मसार 
दिसम्बर की थी वो काली रात
अब कभी कभी ही करती   
हम से आंखे दो चार
तू  क्या अब नही सखी बनेगी हमारी
तेरी कितनी कमी खलेगी प्यारी
तुझे सखी कहा है तो छोड  के जाना नही
कोई  गांधी  कोई  जीसस  फिर लाना यही
इस  दुनिया  मे तेरी बहुत जरुरत है
हमसे ही तुझे हमने अलग कर दिया है
पर क्या  तू  फिर से हमारी दुनिया मे नही आयगी
एक बार फिर से माँ  मरियम नही बन पायगी
आ जा आ भी जा हमे तेरी जरुरत है
हर बच्चो को इंसान  बनाने की हसरत  है
इन बच्चो को बेहतर दुनिया दे जा
बस अब अमन  प्यार मुस्कान से इनका दामन भर जा         

Wednesday, May 1, 2013

...क्योकि जिन्दगी अभी बाकी है.

प्रिय मित्र समय!
तुम्हारे निकलने के 
पल पल का एहसास है,
लेकिन अभी बचे है  
मेरे अन्दर कुछ विचार,
और  क्रियांवित करने का आधार 
कुछ घटनाये जो अभी होना बाकी है,
क्योकि जिन्दगी अभी बाकी है.
तुम सुन रहे हो मित्र!
कुछ एहसास हुआ या नही 
एक बार फिर देना मेरा साथ,
बस अब मेरा लक्ष्य है बहुत पास 
प्रिय सखा तुम तो समय हो 
बीत जाओगे किसी तरह,
लेकिन मै बीती बात कैसे हो जाऊ 
बिना आदि से मिले 
अंत कैसे हो जाऊ?
कैसे ज़िन्दगी के पार चली जाऊ?
इसलिये अभी उस चित्र को पूरा करुंगी 
जिसके  किनारो मे अभी  
रंग भरना बाकी है.


Monday, January 7, 2013

कर लो ह्र्दय मे तुम संकल्प











तुम्हारी मृत्यु ने मुझे रुलाया
पर मन मे एक जज्बा भी जगाया

तुम लायी मन मे दृढ़ता
दुविधा को मैने निकाल फेका

वो कभी अब पास ना फटके
नारी बन जाओ तुम अपराजेय

बन्द कर लो खुली मुट्ठी
कर लो ह्र्दय मे तुम संकल्प

ना रुकेगे ना झुकेगे
अब हर हिंसा का विरोध करेगे

हम नया इतिहास रचेगे
हर मुश्किल अन्धेरो से लडेगे

असम्भव कुछ भी नही
कुछ कदम चल के देखो

हम मे सामर्थ्य भले कम,
संकल्प मे शक्ति बहुत है
 

Friday, September 7, 2012

मेघ अब दूत नही












उस भीगी रात मे
बादल से मैने कहा
इस बार मेरा एक काम कर दे
प्यार की महफिल मे
मेरा भी नाम कर दे
मेरा  भी एक पैगाम पहुंचा दे
इस भीगी रात मे  उन्हे मेरे पास बुला दे
कुछ देर उलझन मे ठहरा बादल
फिर ठुमक कर बोला,
ना वो यक्ष है ना तुम यक्षिणी
तुम्हारा पैगाम तुम्हारे प्रिय तक
क्यो पहुचाऊँ
उनको तुमसे क्यो मिलवाऊँ
तुम लोगो ने इन हवाओ मे जहर घोला
मै कभी पानी का था आज धुयें  का गोला
अब मै ना किसी का सन्देश ले जाऊंगा
ना किसी  यक्षिणी का डाकिया कहलाऊंगा