Sunday, August 21, 2016

बचपन की गूंज

वो गूंजते दिन बचपन के
झूमते आंवले के पेड़
बचपन तोड़ता तेदू फल
और खंडहर हुये
किले में
छुपती किलकारी
सर्पीली सडको से दौड़
पहाड़ो पर चड़ना
जालपा मैया के
घंटे के लिए
घंटो मशक्कत करना
आज भी
भीड़ के सूनेपन में
मंदिर के घंटे
याद दिल ही देते है
बीते बचपन की।

Monday, August 15, 2016

लाल सलाम

तेदू पत्ता तुड़ान करते हुये एक दिन
मेरे ही धधकती जवानी से
ठेकेदार ने जब बीड़ी सुलगा ली तो
मैं नहीं बची
गुम हो मिल गई
दंडकारणय  की गुमनाम कहानियों में
लेकिन कहते है न
कुछ बचा रह जाता है
सो बची रही
नख भर उम्मीद  नख भर ताकत
उसी से ले हाथ में बगावत की विरासत
गांधी के न्यासिता के सिद्धांत को नकारा
लैण्ड माईन बिछाई लाल विचारों की
और कर दी घोषणा क्रांति की
उखाड़ फेका सत्ता, पुलिस, सेना को
हो कर खुश हवा में उठाया हांथ
मुठ्ठी बंद की और जोर से चिल्लाई
लाल सलाम
मैं आजाद थी
वर्ष बीते, बीते आजादी के ढंग
देख रही हूं हर तरफ
सिद्धांत परिभ्रमण का।
लोमड़ी जिसे मिली थी आजादी
बन के वो शेर शासक कहला रही है
अधोवस्त्र  फेक बीड़ी सुलगा रही है
मैं क्रांति की बात करने वाली
खुराक बन सत्ता की
कब की शेरों  के गले उतर चुकी हूं
मार्क्स तैयार है वर्ग संघर्ष के लिए
सलामी दे
हवा में हाथ लाल सलाम।

Tuesday, August 9, 2016

कविता का दिक् काल

युवा कविताएं उतार रही है कपडे
उन हिस्सों के भी
जिन्हें ढकने की कोशिश
में त्रावणकोर की महिलाओं ने
कटा दिये थे अपने स्तन
वो सुना रही है कहानी
उन पांच दिनों की
ये शायद टोटका है उनका
पुरस्कारों के वशीकरण का
कुछ कविताएं जो
चाहती है ज्यादा कुछ
उन्होंने स्त्री पुरुष के मिलन का
करा के पेटेंट कुछ भौडे शब्दों
के साथ खेलना शुरू कर दिया है
आ गये है विदूषक
उछाल रहे है पुरस्कार
ले रहे है खेल का मज़ा
दे रहे है आमंत्रण पुरस्कारों के साथ
उन्हें पता है ये कविताएं
अपने दिक् काल में है
वो जानते है इनको
मरोड़ा,खीचा,और सिकोड़ा
कैसे जा सकता है
युवा कविताएं हो कर खुश
अपनी टांगो के आस पास के क्षेत्र में
लगाती है गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत
लेकिन वो ये भूल जाती है वस्तुत:
गुरुत्वाकर्षण जड़ता का एक भाग मात्र है।