Tuesday, May 31, 2016

स्वर्ण भस्म और जिन्दगी

प्रसिद्ध कहानी के गड़रिए युवक की तरह छुपे खजाने को दुनिया में खोजते हम या काल्पनिक रासायनिक क्रियाओं के द्वारा जिन्दगी को स्वर्ण बनाने की कला का सपना देखते समूची जिन्दगी  संयोगों, चमत्कारों की आशा में काट देते है ।
हर बार हमारी आशा का सूरज घबराकर अंधेरो की सीढियां खोजते हुए भरमाया सा एक कोने में बैठ जाता है और हम गीली लकड़ी से सुलगते सारी जिन्दगी बिता देते है।
तो फिर इसका हल क्या है ? वर्तमान में जीये और खूब जीये किसी चीज को पाने के लिए  कोशिश करे लेकिन इस हद तक जिसमे आप का स्वस्थ आप के रिश्ते और आप की जिन्दगी प्रभावित न हो।
हर व्यक्ति का अपना स्टेट्स होता है उसी से वो थोडा आगे पीछे जीता है उसे बना कर रखने की कोशिश अच्छी है पर यूं प्यारे से लम्हों की कीमत पर प्रसिद्धि का सपना या धनवान बनने का सपनों के पीछे भागना अंधी सुरंग में जीवन भर की भटकन है। जो है उस में खुश रहते हुये खुशनुमा आगे बढ़ने की कोशिश अच्छी है लेकिन किसी भी कीमत पर आगे बढ़ने की कोशिश  जिन्दगी के अंत में आप को काश शब्द के साथ   बिताने को मजबूर कर देती है सो चले दौड़े नहीं वैसे भी तेज चलना स्वस्थ के लिए अच्छा होता है और जिन्दगी के लिए भी दौड़ भी ठीक है पर उसके बाद चलना भी मुश्किल हो जाता है यकीन मानिए जिन्दगी बहुत खूबसूरत है और उसे आप की जरुरत है।

Thursday, May 19, 2016

चेहरे की किताब

चेहरे की किताब से
आ जाते है न जाने कितने चेहरे
देने सन्देश
महान आत्माओं के
बन जाते है एक साथ
बुद्ध,महावीर और ईश
ज्ञान बाटते बाटते
एक दिन
दबी कामनाएं उतर आती है मन से
फिर करते है बातें
शब्दकोश से बाहर के शब्दों से
ये पुरुष है आभासी दुनियां के
स्त्री बन
बन जाते है मीत
दमित कामनाओं की
बंदिशों के पार जाने को।

Thursday, May 12, 2016

गुमनाम घाटी में कोयल

सभ्य शहरी उदासी के बीच पेड़ों ने गुलाबी दुकूल ओढ़ने का साहस कर ही लिया जिन्हें देख कर बालकनी में लगे गमलों के फूलों ने अपने जन्म स्थान की कहानी सुनना शुरू कर दिया जिसे सुनकर कोयल को अपनी कुहू-कुहू याद आई पर ये क्या कोई एक भी प्रसन्न चेहरा नहीं दिखता और उसकी नक़ल उतरने वाला बचपन कहां गया ? अरे वो तो है पर ये तो बुड़ापे से सीधे लुढकता हुआ आया लग रहा है।
कुहू-कुहू करती हुई कोयल ने अपनी सांसे फुला ली है वो खुश रहने के सारे रहस्य एक ही सांस में बता रही है । वो सपनो के देश की बात नहीं करती वो खुद से खुद को रचने की बात कहती है। पर शायद उसे पता नहीं दुनिया अब पास नहीं आई है दूर हो गई है और इतनी बड़ी भी हो गई है कि हम सब एक दूसरे के होने को महसूस ही नहीं कर पा रहे है। हम सब कविता की डायरी के वो पन्ने है जो गुम हो चुके है। हम सुनते है लोगों को उनकी अनुपस्थिति में क्योंकि उपस्थिति में हम ख़ामोश ही नहीं रहते ।लोगो के जाने के बाद हम उनके शब्द उठा कर उसे महान बताते बताते फिर उसे भूल जाते है । अब धूप नृत्य नहीं करती क्योंकि अँधेरा ज्यादा है और क्यों न हो सूरज उजाले और अँधेरे के बीच भटक रहा है ,बेफिक्र विचारों से भेट करने के लिया पर ये मुमकिन नहीं क्योंकि हमारा मन  खोये अतीत और वर्तमान के बीच ठहर गया है और हम भाग रहे है चाँद के पीछे फिर लुढ़कते है धन की फिसलपट्टी से मौत के पहले मिलने वाली गुमनाम घाटी में।
रुको सुनो मुझे मेरी कुहू कुहू कुछ कहती है वो तुम्हें अँधेरे की कायनात से निकाल कर रोशनी के कहकशां के बीच ले जाने आई है। तो चलो चले खुद से खुद को समझने हँसने और हँसाने ।
कागला से पूछो क्या कोयल मदभरी है सभ्य समाज में ऐसा ही होता है ?