Monday, March 30, 2015

माया

जैसे आत्माएँ दबी हो आकांक्षाओं में
और कामनाएँ अपने नुकीले नाखूनों से
फाड़ रही हों बुद्ध के साधन चातुष्टय को
माया डोर ले हाथों में
बना कर कठपुतली
दिग्भ्रमित करती है दुनिया के पथिक को
भ्रमित पथिक कहाँ सुन पता है
आत्मा की वेदना और कहा देख पता है
माया के खेल को
वो मगन रहता है अहम् ब्रह्मास्मि में

Sunday, March 29, 2015

प्रादुर्भाव


मन की इस धरती पर ग्लोबल वार्मिंग के बाद
प्रकट होता है ग्लेशियर
जिससे निकलते हैं
प्रेम उमंग अनुभूतियाँ
और इस तरह मौसम बदलता रहता है
लेकिन इस बदलाव के
टाइम स्केल का रखना पढता है ध्यान
क्योकि हर बार ग्लेशियर से निकले पदार्थ
प्रेम उमंग अनुभूतियों का
नए तरीको से होता है प्रादुर्भाव

Thursday, March 26, 2015

सृजन के जीन



प्रेम की भाषा, अपनत्व के छंद
सुकून के पल ,
मैंने जमा कर के रख लिए है
ये सोच कर
तकनीकी के बाजार में इनकी जरुरत किसे
आने वाला कल एंटी एजिंग साइंस का है
ये मैं रख जाउंगी उन पीढियों के लिए जो
आधे मशीन बने असंतुष्ट अवसाद में घिरे
खोज रहे होंगे संतुष्टि और सृजन के जीन को

Monday, March 23, 2015

गीत



मैंने आवाज दी वसंत को
जंगली हवाएं क्यों आई
घोटना चाहती है मेरे गीत
कुछ प्रेम के गीत कुछ शांति के गीत,
गीत कुछ सृजन के
गीत जो मेरी पहचान है
ले जाना चाहती है उन्हें उड़ा कर
बंद करना चाहती हैं उन्हें गुफा में
लगा देगी चट्टान का ताला
गीत फिर भी गूंजेगे
क्योंकि उनमे बसे है नौ स्त्रियों के सातों सुर

Wednesday, March 18, 2015

अध्याय पाक मोहब्बत


मैं बैठी हूँ आज भी
खिजा की बहारों के लिए
तू शायद फिक्रमंद है रोटी के लिए

++
 जब ख़ामोशी में तुम सुनने लगो
पतझर में जब बहार बुनने लगो
नजर आए चाँद आईने जैसा
तब समझना अध्याय पाक मोहब्बत है ये
++
 एक शरारा सा भड़का है दिल में मेरे
की उसकी तपिश का एहसास हुआ
मैं कहा मुझे पता
वो कहां उसे पता
++
 समंदर से यारी बहुत की हमने
पर कही किनारा नजर नहीं आया
आज इस शहर में हर गरीब
मोहब्बत में हारा नजर आया 


Sunday, March 15, 2015

क्यों

क्यों कोई -कोई दिन
इतना बोझिल होता है
कि खिड़की से गुजरती हवा
खुले कपाट बंद कर देती है
और दिन अधेरों में सहम कर छिप जाता है
क्यों सूरज खिड़की के कपाट नहीं खोलता
ठिठक कर आँगन में खड़ा रहता है
और  हर ख़ुशी किनारे के पार नज़र आती है
क्यों ये बोझिल दिन
सिद्धार्थ की सीमओं से निकल कर बुद्ध नहीं बन जाता ? 

Wednesday, March 11, 2015

शब्दार्थ

सभी शब्दों के अर्थ सामने थे
अनर्थ से दूर भी
शब्द खुश थे अपने -अपने अर्थो के साथ
जैसे ही मैंने  प्रेम का अर्थ जानना चाहा
कुछ फ़रेब के जाल मुझ पर गिरे
कुछ छीटे तोहमत के
फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी
उन्हें बताये मैंने मेरी मीरा सी लगन को
मैंने कहा शब्द तो भावना है आत्मा के
अर्थ हँसा उसने की देह की बात
मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी
क्योकि मुझे थी प्रेम के सही अर्थ की तलाश
अबकी बार उसने मेरे वजूद को भिगोया
एसिड के साथ
तब आग की लपटों के साथ
शब्द  भी जलाने  लगा
प्रेम भी मरने लगा
अब गठरी बना प्रेम पडा  है
हर चौराहे  हर नुक्कड़ हर द्वार
हो रही है उसकी  चीड़ -फाड़

Saturday, March 7, 2015

आ धर्म निभाये

मैंने कहा नदी से
तू और मैं एक जैसे
मैं प्रीत का तूफान यादों की कश्ती  से खेती
तू भी कितने तो तूफान सहती
तू मिटती- बनाती लहरों के खेल में
मैं भंवर  में रहती गिरस्ती  के जेल में
तू खामोश बहती लहरों के साथ
मैं भी  बहती जिन्दगी के बहाव के साथ
तू नि:शब्द हो समेट लेती है सब कुछ अन्दर
मैं समेट लेती हूँ सबके दुःख अंतस
तू बंधी  है किनारो की बाधा  से
मैं बंधी हूँ समाज की मर्यादा से
नदी  तेरा मेरा सुख दुःख एक है
किनारों के पार विध्वंस  है
आ धर्म निभाये
किनारों के भीतर ही रहा जाये
सृजन धरा पर करा  जाये


Friday, March 6, 2015

पूरब के कंधे पर

तुम्हारे साथ को
मैं ने अपने भीतर बूंद बूंद समेटा है
ये एक जादुई एहसास है
जो मेरे अन्दर सिहरन छोड़ जाता है 
ये तो वसंत का आगाज है 
अरे ओ अनमने दिन बाँध  लो अपनी गठरी 
एकांत की चादर मैं ने समेट जो दी है 
अरे ओ दरिया की लहरों मुझे किनारा मिल गया है 
मेरा ये अनायास दुखी और बेचैन होना 
और एक ही पल में बेवजह मुस्कुराहटों का पिटारा खोल देना 
असल में अनजाने  से  आगत की गंध है 
जो पूरब से आ रही है 
अरे मेरी रूह आज तुम मिलोगी 
खुद से और मिलोगी पूरी कायनात से 
आओ चले टिका दे
अपनी उम्र और अकेलापन पूरब के कंधे पर 

Thursday, March 5, 2015

मालवा की होली और मेरा बचपन

मेरा बचपन मालवा में बीता है हर होली पर मैं वही पहुच जाती हूँ इस होली आप भी चले। 
मालवा में बसंत ऋतु की शुरुवात में होली को त्यौहार मनाया जाता है।  होली के एक महीना पहले पूनम पर डंडा रोप दिया जाता है ठीक एक महीना बाद होली मनाने का रिवाज है।  होली वहां जिन सामान से बनाई जाती थी उस सामान का उपयोग नहीं होता था।  मोहल्ला के लोग कंडा,लकडी,टूटी फूटी खाट ,खेती बाडी का टुटा फुटा सामान के साथ कस्लो नाम की घास भी होली के डंडे पर बाँध देते हैं (जिसको जानवर भी नहीं खाते हैं ) कोई भी काम कि चीज होली में नहीं जलाई जाती थी लोग स्वेछा से अपने घर के बेकार सामान को होली के लिए देते थे | लेकिन हमारी बानर सेना को ये कहां मंजूर था हमें तो अपनी होली बहुत ही ऊंची करनी थी सो घर के पास बने हुए गराज के टूटे दरवाजे से घुस कर सलीम भाई की सारी बल्ली पार कर दी गई ये आईडिया इस नाचीज का था, शिकायत भी मेरी ही हुई सजा क्या मिली लिखने वाली बात नहीं है लेकिन हम तो हम ही थे मन में विचार आया अरे अब शिकायत ही होनी थी तो क्यों थोड़ी सी बल्ली छोड़ी चलो अगली होली पर
मालवा क्षेत्र में युवा लड़कियों के समूह द्वारा गाये जाने वाले गीत, लोक संगीत एक पारंपरिक मधुर और लुभावना उत्सव है। समृद्धि और खुशी का आह्वान करने हेतु लड़कियां गाय के गोबर से संजा की मूरत बनाती है और उसे पत्ती और फूलों के साथ सजाती है तथा शाम के दौरान संजा की पूजा करती है। 18 दिन के बाद, अपने साथी संजा को विदाई देते हुए यह उत्सव समाप्त होता है। 
बस हमारी काम वाली बाई की बेटी को देख कर हमारा भी मन डोल गया पहले तो माँ ने मना किया की ये स्थानी लोगो का उत्सव है तुम इसका आनंद इसे देख कर लो पर नहीं हम तो अड़ ही गए गोबर को कैसे छुए ये एक समस्या थी पर संजा खेलने का भी मन था फिर शुरू हुआ गोबर से आकृती बनाना अठारह दिनों तक चाँद, सुरज, तारे, लड़की, लड़का, सीडी ,बैलगाड़ी आदि बना बना कर उसे रंगबिरंगी पन्नी मोटी फूल पत्ती से सजाते -सजाते न जाने कब हम कला में इतने दक्ष हो गए की फैशन डिज़ाइनिग करते हुए ड्रेस डिज़ाइनिग में फस्ट पुरूस्कार मिला .(संजा के 18 दिनों वाली आकृति बना दि थी ) .


मालवा में पहली बारिश के लिए बाकायदा उत्सव होता है मालवा क्षेत्र के गीत सुनना मन को बेहद भाता है। हिड गायन में कलाकार पूर्ण गले की आवाज के साथ और शास्त्रीय शैली में आलाप लेकर गाते हैं। मालवा क्षेत्र में मानसून के मौसम के दौरान ‘बरसाती बरता' नामक गायन आमतौर पर होता है। संजा गीत भी बारिश के पहले गया जाता है .होली के आठ दिन के बाद तक फाग गाते हैं | होली गीत को अपनों महत्व है इन गीतों में देवी देवता और आपसी रिश्तो के गीत गये जाते हैं | इसमे मुख्य रूप से जो गीत गए जाते हैं वो है -गोरा थारो भाग बड़ा शिवशंकर खेले होली ......,होली खेलत हे नन्दलाल .......जमना जल भरन चली रे गुजरी जमना जल ....म्हारी बाई सा होली खेलना आई.... .होली दिवाली दुई बहना ...रंग गुलाल घना खेलो रे होली , दे दो चिर मुरारी अजी कान्हा हम जल माहि उघारी... |

अब की बार आप समझ ही गए होंगे की कौन सा रंग चढा था माँ ने गाना सीखने के लिए एक टीचर की व्यवस्था कर दी थी भाई बोला किरण मालवा में कुश्ती भी होली में होती है वो नहीं सीखेगी और मेरे नादान बचपन ने मासूमियत से हाँ कर दिया था सब हस पढ़े थे . आज माँ नहीं कितना तो कुछ है जो मैं सीखना और अपनी बेटी को सिखाना चाहती हूँ . इस होली में आप सब को शुभकामनाएं देते हुए भगवान विष्णु से यही मांगती हूँ बेटियों की लाज बचाने एक बार फिर फिर चले आए बेटियां अपना बचपन तो जी लेंगी .

Tuesday, March 3, 2015

जिंदगी की न टूटे लड़ी .......प्यार कर ले घडी दो घडी



 मशहूर गीतकार संतोष आनंद डॉ.कुवर बेचैन ऐसे ही कई साहित्य के सितारों के बीच मिला 'निराला सम्मान 2015' ने अभिभूत कर दिया. ये सम्मान मेरे लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण था पहला कारण मेरे प्रिय गीतकार संतोष आनंद जी द्वारा दिया जाना दूसरा मेरे हमसफर डॉ पवन विजय को ' ऋतुराज सम्मान 2015' मिलना तीसरा महान कवि श्री सूर्यकान्त निराला की स्मृति में दिया गया. निराला स्मृति में बने कॉलेज में मेरा पहला चयन प्रवक्ता पद पर उन्नाव में हुआ था जो निराला की जन्म भूमि है बस वही से मेरे लेखन की भी यात्रा शुरू हुई थी . बस ईश्वर से इतना ही मांगती हूँ कि मैं आगे भी मैं सत्यम, शिवम् और सुन्दरम लिखती रहूँ. इस दौरान अनेक साहित्य विभूतियों से मिलने का मौक़ा मिला. पद्मभूषण गोपालदास नीरज से मिलना सुखद था, बेबाक जौनपुरी जी का स्नेह और मार्गदर्शन हम दोनों लोगों को मिला. कार्यक्रम की सफलता के लिए भाई अमरेन्द्र जी बधाई के पात्र हैं .