Tuesday, October 28, 2014

सृजन और जीने का संघर्ष देह -विमर्श नहीं ।

हमारी  नारी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि जब हम पश्चिमी जीवन शैली अपनाते है तो हमें अल्टा मॉर्डन  कहा जाने लगता है हम पर फब्तियां कसी जाने लगती है और जब हम भारतीय संस्कृति अपनाते है तो हमें रूढ़िवादी कहा जाने लगता है। कुछ लोग कहते है कि हमने पुराने जरुरी बंधनो को खोल दिया है जो समाज के लिए बहुत घातक है। हमारी अभिव्यक्ति  को समाज अपनी पूरी कुंठा के साथ कट्टरता से देखता है और समय-समय पर हमें दंड भी देता है कभी निर्भया बना कर कभी मलाला  बना कर।

मानते है हम में भी समाज के दूसरे लिंग की ही तरह कुछ कमिया है और हम उन कमियों पर नजर भी रखे है ये हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है हम उससे पार पाने की भी कोशिश भी कर रहे है। कोशिश है कि हमें धर्म,लिंग, अति महत्वकांक्षा की आड़  कोई इस्तेमाल न करे पर ये कोशिश हम स्त्री ही करना चाहती है हमें कोई सशक्तिकरण नहीं चाहिए हमें हमारी समस्या के लिए खुद ही हल खोजने दे ये हमारी शारीरिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है तभी तो हम अपनी ऊर्जा को बेहतर ढंग  से बेहतर कार्यो के लिए इस्तेमाल कर पाएंगे।   स्त्री सशक्तिकरण जैसे शब्दों से हमारी समस्या कुछ स्त्री प्रश्न या स्त्री मसलो तक ही सीमित  कर दी है हमारा प्रश्न तो विराट है वो किसी सशक्तिकरण के दायरे में  नहीं  आ सकता। 

हमारा पहला व अंतिम प्रश्न है हमें मनुष्य क्यों नहीं समझा जाता और जहां कही ऐसा समझा भी गया है वह हमें नियंत्रित रखा जाता है कि हमें कभी-कभी मनुष्य होने पर भ्रम होता है हम मनुष्य की सीमित नसल  है। 
हमने  जीवन का सृजन किया है  हम जीवन रचियता है हमने न जाने सृजन के कितने-कितने गीत लिखे है तब हमें गरिमा के साथ जीने का हक़ क्यों नहीं?

हमारे सृजन को हमारे त्याग को देवीत्व और गरिमा से जीने के संघर्ष को देह -विमर्श में मत बदलो बस हम इतना ही चाहते है अगर पुरुष  ऐसे कर सके तो हम वादा करते है कि सदियों से आप की दुनिया  का हिस्सा बनी सामाजिक व्यवस्था  और परम्परागत सोच को हम आप से दूर कर देंगे उन रूढ़िगत संस्कारों से आप को बचा लेंगे जिनके शिकार होकर सदियों से आप पुरुषवादी अहंकार के नीचे दबे ठीक से सांस नहीं ले पा रहे है।

सदियों से पुरुष वादी चोले को उतरने का समय आ गया है पुरुष तुम रूढ़िग्रस्त संस्कारों से मुक्त हो और सभ्य बनो हम स्त्री जाती तुम्हारे साथ है आओ दोनों मिलकर उत्तर फेके चोले उन साढ़े- गले कु संस्कारो के और  पूर्ण करे मनुष्यता को। 



Thursday, October 16, 2014

जीने की कला

ये आप को तय करना है की आप को कैसा जीवन जीना है वो जीवन जिसमे बाहरी उन्नति है जिसे हम भौतिक उन्नति भी कहा सकते है या फिर वो जीवन जिसमें आंतरिक उन्नति हो . क्या ये अच्छा नहीं हो कि हम ऐसा जीवन जीये जिसमे हमारी अंतरज्योति हमेशा जीवित रहे प्रकाशमान रहे।
जीवन जीना एक कला है और ये कला पूरब के पास बर्षो से थी। भारत की धरती पर जीवन की ये कला बिखरी हुई थी तभी तो जीवन के सही अर्थ के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण रहा. जीवन के बाद जीवन की अवधारणा की बात सिर्फ हम ही करते है। हम कौन है ? हमारे जीवन को जीने का क्या उद्देश्य है ....? ये हमारी संस्कृति में लाखों वर्षो से है।

हमारे देश में तमाम ऐसे योगी हुए जिन्हें आध्यात्मिक जागृति की कला का पूर्ण ज्ञान था। कुछ ने उसे बटा भी इस आशा में कि मानव उन्हें अपने जीवन जीने में लागू कर सके और ऐसा हुआ भी परंतु दुर्भाग्य से जीवन जीने की कला सब को नहीं मिल पाई।
हम में से बहुत सारे लोग जीवन में चमत्कार की आशा करते हुए पूरा जीवन काट देते है ऐसा करके लोग अपने जीवन में सिर्फ गतिरोध ही उत्पन्न करते है और निराशा के साथ अपने जीवन का अंत करते है।
जीवन कैसे जीये इस पर बात फिर कभी, अभी तो बस ये की आप अपने जीवन को क्या जी रहे है ? और क्यों जी रहे है ?

Wednesday, October 15, 2014

नहीं बीतती साँझ



गोधूली की इस बेला में 
नहीं बीतती साँझ 

व्योम मौन है 
धरा चुप है 
मन का खग भी ठहरा है 
ऐसी है शिशिर  की ये साँझ 

गोधूली की इस बेला में 
नहीं बीतती साँझ 

मन रीता जैसे हो निशा 
पर नयनों में है मनो उषा 

नयनों के इस वीराने में 
नहीं बीतती साँझ