Monday, September 8, 2014

एक अंधेरी रात और..........वो

एक अंधेरी रात समय १२. ४० दिल्ली का बाहरी इलाका हर तरफ सन्नाटा झिंगृर भी निशब्द.... बड़े-बड़े प्रेत की तरह झूलते दरख़्त तेज बारिश गाड़ी ख़राब। मैं गाड़ी से उतरती हूँ बारिश और तेज हो जाती है मैं पैदल ही चल पड़ती हूँ मैकनिक की तलाश में....

इतनी रात में मैकनिक कहा मिलेगा मैं बड़बड़ती हू दूर बहुत दूर पर एक मैकनिक है तभी आवाज आती है मैं डर जाती हूँ जी आप कौन........ उत्तर मिलता है मैं 'बेचैन आत्मा' मेरा डर कम होता है अच्छा वो फेसबुक वाले मैं तो आप को वाले ही समझी थी और अपनी आदतनुसार हस पड़ती हूँ उधर से बहुत ही डरावनी हसी सुनाई पड़ती है नहीं मैं सचमुच की बेचैन आत्मा हूँ अब फिर से डरने की बारी मेरी है मेरे हाथ पैर कांपने लगते है उधर से पूछा जाता है क्या में भी फेसबुक ज्वाइन कर सकती हूँ? मेरी डर से आवाज ही नहीं निकलती बेचैन आत्मा कहती है क्या है न वो हमारे यहाँ भी फेसबुक है पर उस पर इतने सारे भूतों ने भूतनीय बन के एकाउंट खोल दिए है की पता ही नहीं चलता की सही कौन और गलत कौन है खैर छोडो और बताओ.... 

मैं डरते -डरते पूछती हूँ आप कहां रहती है वो कहती है हमारे अपने बगले थे अब बिल्डरों ने तोड़ कर फ्लेट बना दिए है जी जी मै अपने कदम और बाते दोनों ही नहीं रोकना चाहती क्योंकि कुछ भी हो सकता है मैं पूछती हूँ आप में से कुछ लोग पेड़ पर भी रहते है न मेने टी वी पर देखा था फिर भयंकर हसी के साथ वो कहती है अरे में ही तो थी झूला झूल रही थी क्यों आप के फ्लेट के पास पेड़ नहीं अब मैं निडर होने लगती हूँ वो एक गहरी सांस लेती है पेड़ तो कई थे पर उनको काट-काट कर शॉपिंग मॉल बना दिए है इस लिए में झूला झूलने उधर ही निकल जाती हूँ गहरी उदासी के साथ वो बोलती है वहां मेरी सहेली भी रहती है जिसके साथ कुछ लोगो ने अनहोनी करके उसे पेड़ पर टांग दिया था।....


मैं ने कहा कड़कड़डूमा कोर्ट में भी तो आप के कुछ लोग है वो फिर हसी अबकी उसकी हसी डरावनी नहीं थी। अरे उनको तो हमारी भूतों की पंचायत ने सजा दी है वो क्या है न वो लोग जब जिंदा थे तो हमेशा कम्प्यूटर पर ही सारा समय निकाल देते थे अपने पारिवारिक सदस्यों को टाइम ही नहीं देते थे इसलिए हमारी पंचायत ने उनकी सज़ा ये दी है की वो रात ११ से सुबह ३ बजे तक कम्प्यूटर खोलेंगे और बंद करेंगे अब बिचारे वही करते है जी मैं ने मन ही मन प्रॉमिस किया अब से छोटा आर्टिकल भी लिखूँगी नहीं .......

क्या सोचने लगी उसने पूछा मै होले से मुस्कुरा दी अब हम दोस्त बन गए थे। वो बोली तुम यही सोच रही हो न की मैं इतनी खुश क्यों हूँ मैने धीरे से सर हिलाया उसने कहा क्योंकि यहाँ भूत समाज में कोई भेड़िये नहीं है जो हमारी इज्ज़त को तार -तार कर सके हमें यहाँ पर खुशियो का परित्याग नहीं करना पड़ता है. हम यहाँ पर जिंदगी को जीते है घसीटते नहीं ये कहा कर उसने बिदा ली में ने देखा उसके चेहरे पर असीम आनंद था...... मै सोच रही थी काश हमारे यहाँ पर भी महिलाओं को इतनी सुरक्षा और स्वतंत्रता मिले।

Friday, September 5, 2014

पति -पत्नी आनंदोत्सव

जीवन पति -पत्नी का 
नहीं चलता ये एक सीधी रेखा में 

हमारे और तुम्हारे बीच 
वाचा के उग्रबाण होते है 

जो रूपांतरित होते है 
ये रूपांतरण हमेशा धनात्मक होता है

भरता है हमें 
एकात्मकता व आनंदोत्सव में 

प्रेम को प्रखर करता है 
तरंग -आवृत में स्पंदन 
बदल देता है आनंदोत्सव वसंतोत्सव में 
आनंदोत्सव वसंतोत्सव में 




Monday, September 1, 2014

नारी और सौंदर्यबोध

उन्होंने कहा हम परतंत्र है और
उतार दिया सुहाग चिन्ह 
फेक दिए रीतिरिवाज 
उन्होंने कहा हम रचेंगे तंत्र 
उठा लिए हथियार 
सीख ली गाली 
उन्होंने कहा अब हम स्वतंत्र है 
पहन लिए अल्प वस्त्र 
उतार दिए संस्कार 

मेरी ये रचना आज की कुछ स्त्री का आंशिक सच ही हो पर है तो। आज के समाज में सौंदर्य की यही परिभाषा है। आज के समाज में किसी भी अन्य विचार से ज्यादा सौंदर्य के मिथक है जो की जीवन के सभी क्षेत्रों में फैले है। क्यों क्योंकि कुछ स्त्रियों को लगता है कि
बदन दिखाना सौंदर्य है और इस तरह के सौंदर्य से लोग उसे गंभीरता से लेने लगेंगे। उसे अन्य लोगो से ज्यादा बढ़ावा मिलेगा उसे लोग विशेष समझेंगे। इस तरह की सोच को बाजारवाद ने और बड़ा दिया है और उसकी शिकार स्त्री आसानी से हुई है।

कोचिंग, कॉलेज अन्य सार्वजनिक स्थलों पर घूमती हुई लडकिया जीता जगता उदहारण है इस दिखावे का ये संस्कार हीनता है । कम से कम कपड़ो में अपनी शरीर की नुमाइस करती ये लडकिया किस सशक्तिकरण को दर्शना चाहती है मुझे आज तक नहीं मालूम हो सका। लडकिया तो लडकिया बड़े शहरों में उम्रदराज महिलाओं को जब अल्प कपड़ो में देखती हूँ तो सोचती हूँ क्या इनके लिए यही स्वतंत्रता है.वह रे नारी गजब है तेरी मुक्ति।
शरीर को उघाड़कर अपने ऊपर उठती अश्लील निगाहों से तथाकथित इन महिलाओ का पुरुष बराबरी का ये तरीका मेरी समझ के परे है। अगर ये पुरषो से बराबरी नहीं सिर्फ खूबसूरती दिखने का तरीका है तो शायद उन्हें खूबसूरती की परिभाषा पता नहीं। ब्यूटी लाइज इन दी आईज ऑफ बिहोल्डर --खूबसूरती देखने वाले की नज़र में होती है। 

ये सही है कि सौंदर्य का एक मनोविज्ञान होता है और मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार का संबंध उसकी दमित -भावनाओं से होता है और शायद सौंदर्य पर भी उसकी सोच इसी सोच के आस-पास घूमती है पर जब ये सोच सार्वजानिक हो जाती है और सामाजिक मर्यादाएं को लांघती है तो सौंदर्यबोध ख़त्म हो कर आश्लीलताबोध का एहसास होता है। ये नहीं भूलना चाहिए की हम समाज का ही प्रतिनिधित्व करते है और व्यक्ति का सौंदर्यबोध,समग्र -रूप से समाज का सौंदर्यबोध है। 

अल्प कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन इंसान इसके पार है. मानव हो तो आंतरिक सुंदरता को पहचानो अपनी योगता और कार्य करने की क्षमता को पहचान कर उसे एक नया रूप दो। खूबसूरत शरीर एक दिन ख़त्म हो जाना है जो असल है वह पहुचने की कोशिश होनी चाहिए। भारतीय संस्कृति को आत्मसात करे जीवन जीने की यही सही रीत है। यकीन मानिये आपकी और आप के जेहन की भी खूबसूरती इससे बढ़ जाएगी।