Thursday, August 18, 2011

तृष्णा की है सारी दुनिया

तृष्णा की है सारी दुनिया 
प्रलोभन का इसमे वास 
नहीं मिलेगा कोई यहाँ 
जिस पर कर तू विश्वास

क्यों व्याकुल हो मन भटकता
क्यों सहता ये प्रलाप
हर और घात ही घात 
निराशा का भीषण आघात 

शव जैसी ये भौतिक उपलब्धि 
व्यर्थ का सारा विज्ञान
उन्माद जैसी ये प्रगति 
करती मानव को परेशान 

भटक- भटक तू जीवन में फसता
दिन- रात दोड़ता, कमाता तू
अब आया जीवन संध्या काल 
तब जाना ये है मायाजाल 

Wednesday, August 17, 2011

अभिलाषा

आँखों की कोरों से कुछ गीला -गीला गिरता है
दिल से भी कुछ रुकता- रुकता झरता है
कसक सी उठती है दिल में,
बसंत में पतझड़ सा लगता है
आँखों की कोरों.................................
हर बार कहा हर बार रहा 
उनसे मेरा जो नाता है,
ना माना मीत मेरा वो सब,
उसे बंधन , जकड़न सा लगता है
आँखों की कोरों................................
ना जाने वो प्यार की भाषा 
ना जाने मन की अभिलाषा
कसक सी उठती है दिल में
ये शहर अंजाना लगता लगता है
आँखों की कोरो..................................
ना समझ सकी अब तक उनको 
ना समझ सकी अब तक अपने को 
ये प्यार बेगाना लगता है
ये रोग पुराना लगता है
आँखों की कोरों. ...................................

Sunday, August 7, 2011

ना बांधू उनसे मैं मन को

सब कहते है मन बंधता है , ना बांधू  उनसे मैं मन को
बंधी गाठ खुल जाये ,वो  तो ना घुल पाए 
ना बांधू .............................................
जग में तो सब बंधते है , बंधन से  ही सब चलते है 
ऐसा जग में सब कहते है, में ना मानू इन सब को  
ना बांधू ....................................................
अगर तू सुनता है मौला, इतनी फ़रियाद मेरी सुन ले 
उनके मन से मेरा मन ,ऐसे घुल जाये 
नदिया सागर में जैसे मिल जाये 
ना बांधू .......................................
बंधन में विश्वास नहीं , ऐसे जीने की आस नहीं 
बंधी - बंधाई ये परिभाषा , मेरी समझ में ना आये 
ना बांधू .......................