Tuesday, February 21, 2017

हम


जीवन
नयन, मन तार
बज उठा सितार
लीन हुई मैं
तुम में।

अंग सिहरन
रहस्मय गति
तुम सत्य ज्ञान
मैं जड़ सी पड़ी।

सात लोक
सात स्वर
सप्तसदी
बिन तुम्हारे
मैं शून्य हो खडी।

अभिमान, स्वाभिमान हुए आलिंगित तब सभ्यता हुई नूतन

Monday, February 20, 2017

वसंत के बहाने

हर काबिल हर कातिल तक अपनी महक अपना हरापन फैलाते वसंत स्वागत है तुम्हारा....

मधुमास लिखी धरती पर देख रही हूँ एक कवि बो रहा है सपनों के बीज । किसके सपने है महाकवि मैं पूछती हूं और ग्रीक देवता नहीं अपोलो नहीं.. बोल पड़ा चतुरी चमार । ये कैसा मेल महाप्राण ? कोई मेल नहीं कोई समानता नहीं लेकिन साथ-साथ जैसे पतझर के साथ वसंत।
मैं स्तब्ध !!
लाल रेखाओं से पूर्ण समस्त मानव समाज में फैले हुई रुढियों को तोड़ते नेत्र जो वसंत की दस्तक से बेखबर चला जा रहा है विवाद और विकास के द्वंद्व में घिरे कालखंड की तरफ । क्या ये छायावाद है?
किसने भेजा है उसे बोलो कवि यूं ही नहीं इस धरा पर में शिक्षा देने चली आई चले तो शिवमंगल सिंह सुमन जैसे कवि भी आए थे । हर कोई चला आता है तुम्हें खोजता इस धरा पर आज भी तुम्हारी पगध्वनि सुनाई देती है और सुनाई देता है मनोहरा का
श्री रामचंद कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणं... राम अर्चन उनके कंठ से फूट रहा है और फूट रही है रुलाई मेरी कंठ से आँखे बहा ले जा रही है मेरे अहंकार को मेरी श्रेष्ठा को तभी मनोहरा देवी का स्पर्श मेरे कंधे पर होता है मुक्त हो किरण इन झूठे राग से और मैं कॉलेज प्रांगण में खड़ी उनकी प्रतिमा के आगे नत हूं।
निराला गा रहे है
छल-छल हो गए नयन, कुछ बूंद पुन: ढलके दृग जल, रुक कंठ!!
जा रही हूं महाकवि नौकरी का बोझ अब सह नहीं जाता दस साल बिताये उन क्षणों में अगर आप न होते तो कैसे समझ पाती वसंत में पतझड़ मिला होता है। कहाँ समझ पाती कविता स्त्री की सुकुमारता नहीं, कवितत्व का पुरुष गर्व है।
कहाँ उतार पाती मन का अनकहा कहाँ कर पाती कागज की धरती को धानी कहाँ समझ पाती रिश्तों को जिन्होंने कच्चे सूत से आप को भी बांध लिया था।
नमन तुम्हें मनोहरा
अब चाहे तर्कों के बुने हुए जाल
विरोध का झेलूं भाल स्नेह का नहीं मिले प्रतिदान चाहे भुला दे मुझे जीवन मनोहरा के समान फिर भी शूलों के रवि पथ पर चलती जाउंगी उनके लिए जिनके लिए वसंत पतझड़ में भेद नहीं...छिना हुआ धन, जिससे आधे नहीं वसन तन, आग तापकर पार कर रहे है गृहजीवन।
बांधो न नाव इस ठांव बंधु.

दस साल डलमऊ के पास बिताए कॉलेज में रहते हुये कुछ सुनी कुछ पढ़ी बातों पर आधारित संस्मरण।


Saturday, February 18, 2017

सुप्रीम मिस्ट्रेट ऑफ़ द यूनिवार्स

सिबल ऑफ़ द लिवरेटिंग पॉवर्स ऑफ़ फीमेल सेक्सुअलिटी ! सुप्रीम मिस्ट्रेट ऑफ़ द यूनिवार्स ।
मृत्युजयी निरावरण श्यामवर्ण काली, कालजयी आदि शक्ति जिसके अस्तित्व से जन्मी है प्रलय क्योंकि उस शक्ति ने साधा है काल को और उसे सहा भी है। विरोध स्वरुप जिसका जन्म हुआ हो उसे काल की क्या चिंता वो तो उसके आगे असहाय है।
संयुक्ति से जन्मे त्रिकाल सत्य, शिव सुंदर होता है बिना शक्ति शिव शव है दोनों का मिलन ही अद्धैत की आत्मा है।
स्त्री सदा से प्रेममय है काल से मुक्त पर पुरुष
 ने अपनी रोपित अकांक्षाओ से उसे तोड़ दिया है उसके भीतर की शक्ति असहाय हो या तो ख़त्म हो रही है या विध्वंस करने को बाध्य हो रही है। नकली जिन्दगी जीती स्त्री मानवीय संवेदना खो रही है।
सहअस्तित्व से संसार चक्र चलेगा लेकिन उससे पहले स्त्री को प्रेम में रहने देना होगा क्योंकि उसका प्रेम और उसका  खुद से समर्पण ही उसकी स्वाधीनता है अगर आदिकालीन स्वभाव व स्वरुप नष्ट कर दिये जाएंगे तो आदते नए अधिकार पाने की चेष्टा करेंगी जो शायद मानवता के लिए स्रष्टि के लिए ठीक नहीं होगा ।
उसे सजग और निर्दोष रहने दो ।समय से मुक्ति के लिय जरुरी है  बेशर्त प्रेम में होना। शिव की उर्जा को धारण करने वाली शक्ति ही है हमें इसे नहीं भूलना चाहिये।

Saturday, October 1, 2016

रुपजीवा संवेदना

परिपथ से राजपथ तक
संवेदना दिखाई पड़ती है
किसी मचलती तारिका की तरह
अपनी अदाओं से
उत्तेजना फैलाती
तूफान खड़ा कर देती है
संवेदना जो पूरी तरह बदल गई है वेश्या में
लगाती है अपनी कीमत
त्रिवर्ग की सिद्धि में लगे लोग
बोली लगा खरीदते है
और संवेदना चल देती है उनके साथ
दुकान चमकाने
घटना हतप्रभ हो देखती है तमाशा
उसकी चीड़ फाड़ में लगा समाज
संवेदना पर लिखता है इतिहास
विशेष बन संवेदना
इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होती है
बिछती है नेता,अभिनेता,कवि,कलाकार
के बिस्तर पर
रुपजीवा की भाती बिस्तर बदलती ये
पूरे करती है मनोरथ
घटना किसी अंधेरे कोने में
मुंह छिपाये सुबकती है
संवेदना पण्यस्त्री बन
बैठ जाती है फिर बाज़ार में

Wednesday, September 14, 2016

यात्रा

सुदूर अतीत के
मुर्दे टीले में बने
तालाब की आखरी सीड़ी पर
पड़ी हुई जली लाश
असल में फिनिक्स पक्षी है
जो अपनी ही राख से
पुन: जीवित
स्त्री बन
सभ्यताओं के आंसू से
लिख रही है विशिष्टता की दास्तां
सभाल रही है
विशिष्ट व्यवस्थाओं के दस्तावेज
जिसमे है रूमानियत की लाश
ज़ज्वातो की डिबिया
गीतों के मिसरें
कैदी मुस्कान
नफरतो के साय
धोखे की कहानी
बेपनाह दर्द
इलज़ाम का सन्दूक
आंसुओं से लिखा प्रेम पत्र
जिसमे लिखा है
पुरुष स्त्री के सम्मिलन की कहानी
और त्रिपथगा की यात्रा का मन्त्र
जिसे अपनी आत्मा के सुरों में डाल
पहुँचा रही है हर सभ्यता में।

Saturday, September 3, 2016

प्रेम बिंदू

सूक्ष्म खुशबू, भीनी गंध
ऐसा ही होता है प्रेम
प्रेम मतलब एक बिंदु पर खड़ा होना
या
अंतस से एक स्त्री का पुरुष होना , पुरुष का स्त्री होना
प्रेम, हर पल चलती सांसो का उत्सव
या अस्तित्व में समाई जीवन- मृत्यु
उल्लास,उमंग का जरिया
प्रेम मतलब उर्जा, सृजन, जीवन, आशा, विश्वास, उम्मीद
प्रेम, एक ऐसा झरना
जिसमे छपछापाना
या
चुम्बनों के साथ
रंग में लिपटना
आधी रात और होते हुये दिन के बीच
धुन, गंध, लय, ताल,  सुर, सुन्दरता
में समा जाना
प्रेम मतलब यायावर
निकल जाना  रास्ते से मिलने
भूरी मटमैली धूप या उठते धूल के गुबार
में रूहानी खुशबू लेना
किसी नूरी मछुआरिन या
महुआ घटवारिन की कहानी
को सुन सीने से लगा लेना
या
अनगिनत परिदों से भरे आसमान में भी
शोकगीत बजाती हवा से
दुःख साझा कर लेना
प्रेम मतलब मूक भाषा की लोरियां
सोधी रोटियां
प्रेम, झुके हुये लोग उनकी
पीठ पर रखे हाथ का स्नेह
रास्तो को बुहारती आंखें
प्रेम,अज्ञान-ज्ञान-विज्ञान
प्रेम
सत्यम शिवम् सुन्दरम

Sunday, August 21, 2016

बचपन की गूंज

वो गूंजते दिन बचपन के
झूमते आंवले के पेड़
बचपन तोड़ता तेदू फल
और खंडहर हुये
किले में
छुपती किलकारी
सर्पीली सडको से दौड़
पहाड़ो पर चड़ना
जालपा मैया के
घंटे के लिए
घंटो मशक्कत करना
आज भी
भीड़ के सूनेपन में
मंदिर के घंटे
याद दिल ही देते है
बीते बचपन की।