Tuesday, March 7, 2017

अपने ही दिमाग की सलाखों में कैद स्त्री

उन्नीस सौ साठ के दशक से या यूं कहें कि उत्तर-आधुनिकता के आगमन से विश्व के सामाजिक,राजनितिक चिंतन और व्यवहार में कुछ नए आयाम जुड़े है। परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष से मानव समाज के सामाजिक जीवन एवं व्यवहार में बदलाव होता जा रहा है। सामाजिक व्यवहार तथा मूल्यों में हो रहे बदलाव अच्छे भी है और नहीं भी । इसका निर्णय जितना अच्छा भविष्य देगा उतना वर्तमान नहीं।
इस बदलते हुए समय का सबसे ज्यादा अगर किसी पर प्रभाव पढ़ा है तो वो है स्त्री। आज स्त्री पश्चिमी रंग में रंग कर उसमे ढली है परन्तु अपने दिमाग की सलाखों में वो आज भी कैद है इसलिए वह सहज और शांत नहीं वो अपनी स्वतंत्रता को अपना आत्मविश्वास नहीं बना पा रही है। स्त्री - सशक्तिकरण नारे सिर्फ जुमले बन हवा में तैर रहे है और वो प्रश्न अनुत्तरिण है कि स्त्री समाज के लिए क्या है?और समाज उसे कैसे देखता है?
क्या स्त्री -पुरुष समान है ? या समाज स्त्री को द्धितीयक मानता है या आज भी गुलाम या दासी मानता है। क्या समाज स्त्री को लेकर आज भी कुंठित है ?
ये यक्ष प्रश्न है इन सवालों के उत्तर के साथ ही समाज में मनुष्यता स्थापित हो जाएगी । इसलिए ये जरुरी है कि समाज इन सवालों को हल करे और स्त्री पुरुष संतुलन को कायम करे।
स्त्री सृजनकर्ता रही है । हमेशा से उसने जीवन को रचा है उसे सवारा है। सभ्यता का मानवीय विकास स्त्री की ही देन है । उसने गुलामी और प्रताड़ना से हमेशा समाज को मुक्त कराया है, उसने मानव जीवन का रूपांतरण कर समाज को सभ्य बनाया है।(सम्राट अशोक कलिंग युद्ध और गोप)।
आज बदलते हुए समय में सारे समाज की जिम्मेदारी बदल रही है इस बदलते समाज में स्त्री की जो सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वो है उसका अपने प्रति जिम्मेदार होना ऐसा जिम्मेदार होना जिसमे भ्रम न हो ।
उसे संतुष्टिकारण का शिकार नहीं होना है उसे अपने दोषों और कमजोरियों पर भी नजर रखनी होगी और अपना आंकलन खुद ही करना होगा। उसे खबरदार भी रहना होगा कि वो प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल  तो नहीं हो रही है।
समाज में अपने स्थान को बनाने के लिए अपने संघर्ष को  देह-विमर्श  में उसे नहीं बदलने देना है और उन स्त्रियों से भी सावधान रहना है जो देह-विमर्श के नाम पर स्त्रियों की जिन्दगी को और कठिन बना अपने को चमकाने में लगी है।
विभिन्न सम्प्रदाय,धर्म,जाति में फैले हमारे देश में स्त्रियों के संघर्ष बहुत अलग-अलग है जिनकी जड़े गहरे से गढ़ी है स्त्रियों को उन गढ़ी हुई बेशर्म जड़ो को निकाल कर अपने लिए उपयोगी बनाना है ताकि उस पर संस्कृति, मानवता, नैतिकता का पौधा लहरहा सके और स्त्री स्वतंत्रता के फल उस पर आ सके।
अगर स्त्री हमारे देश में फैली समस्याओं जाति,धर्म आदि को नजरंदाज करती है तो उनकी मुक्ति की आस बेमानी होगी।
स्त्री को अपने संघर्ष में चाहे घर हो या बाहार स्वलाम्भी  होना होगा उसे चाहें पारिवारिक शोषण को तोडना हो या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना हो दोनों ही सूरत में परिवार में पारिवारिक लोकतंत्र व कार्य स्थल में अपने हुनर का इस्तेमाल करना होगा न कि स्त्री होने का इस्तेमाल।
स्त्री का सवतंत्रता के संघर्ष को लक्ष्य उसके चरित्र की द्धढता से मिलेगा और हर न्याय तभी मिलेगा। वो खुद भी अपने साथ तभी न्याय कर पाएगी जब वो अपने स्त्री होने को पीछे कर मनुष्य होने के बोध को जगाएगी।
अन्तत: इस संकटग्रस्त मानवीय संबंधो के समय जब की रिश्ते पल-पल बदल रहे है लोग भ्रमित है उलझे है परेशान हो मशीन बन भाव और संवेदना खो रहे है विगत की भूल ने रिश्तो की नीव कमजोर की है ऐसी दशा में स्त्रियों को मानवीय संबंधो को पुन:स्थापित करने में अहम् भूमिका निभानी होगी उसे अपनी अंतरात्मा की कसौठी पर खुद अपने को पुरुष को और उन बच्चों को कसना होगा जो कल पुरुष बन स्त्री-पुरुष के संबंधो को जीयेंगे।लेकिन जीवन मुल्य को चलने के लिए गति को लय में चलन ही होगा पुरुष गति है शिव है और स्त्री लय है शक्ति है शिव बिना गति के शव है और स्त्री बिना लय के शक्तिहीन अर्धनारीश्वर के रूप में पुरुष समानताओं और विपरीतताओं से परे स्रष्टि को गति और लय देते है तभी सुन्दर और शांत स्रष्टि की रचना हो सकती है।
ये सम्बन्ध संतुलित हो जीवन में गुणवता बनी रहे समाज में सकारात्मकता और सृजनात्मकता बनी रहे इसलिये ये जरुरी है कि स्त्री हर बार नए सिरे से खुद को और पुरुष  के साथ उसके रिश्ते को परिभाषित करती रहे।
आने वाली सदी में स्त्री-पुरुष के संबंधो में उर्वरता बनी रहे और बुद्ध के दर्शन सम्यक जीवन का आधार स्त्री-पुरुष जीवन का आधार हो हम ये कामना तो कर ही सकते है।

Thursday, March 2, 2017

आग के दरिया में दो मैना

होना तो ये था
पाबंद बन जाने थे माथे पर
जलाना था दिया
जाना था तकिया पर
ये पूछने
दरिया में आग क्यों अमृत क्यों नहीं
शायद दो मैना दिख जाती
लेकिन झुकना न आया
फिर मारे पत्थर दिल पर
खौफ़ की चक्की चलाई
सोचा तो ये भी था
अब-ए-चश्म में नहा कर
पता चलेगा
दिल का जला क्या पता देगा
कुछ आंखो में
जुगनुओं की तरह टिमटिमाया
फिर गायब
खुदाई में मिला
आत्मा का पता नहीं
आम दस्तूर
आग के दरिया से पार नहीं पाया
राख का पंछी बन
भटक रहा है वीराने में
जहां न चुम्बकत्व है
न गंध है
न सूर्य
अब कफ़स में मैना
पैगाम आए तो कैसे।
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तकिया- फकीरों-दरवेशों का निवास-स्थान
अब-ए-चश्म- आंसू


Thursday, February 23, 2017

शिव बिन शक्ति शव

हर धुन, हर गंध, हर ताल
हर सुर, हर सत्य, हर सुन्दरता
शिव तुम हो
तुम्हारे रसतत्व में
तत्व की शक्ति
तो शक्ति है
हैं न शिव
नहीं तो तुम शव हो
लेकिन शक्ति के छंद में दर्द
तो वो क्या करे
अपने आंसुओं से
निकाल जल तत्व
क्या स्थापित करे
अपने अन्दर वो उर्जा
जो आज तक पुरुष को देती आई।

Tuesday, February 21, 2017

हम


जीवन
नयन, मन तार
बज उठा सितार
लीन हुई मैं
तुम में।

अंग सिहरन
रहस्मय गति
तुम सत्य ज्ञान
मैं जड़ सी पड़ी।

सात लोक
सात स्वर
सप्तसदी
बिन तुम्हारे
मैं शून्य हो खडी।

अभिमान, स्वाभिमान हुए आलिंगित तब सभ्यता हुई नूतन

Monday, February 20, 2017

वसंत के बहाने

हर काबिल हर कातिल तक अपनी महक अपना हरापन फैलाते वसंत स्वागत है तुम्हारा....

मधुमास लिखी धरती पर देख रही हूँ एक कवि बो रहा है सपनों के बीज । किसके सपने है महाकवि मैं पूछती हूं और ग्रीक देवता नहीं अपोलो नहीं.. बोल पड़ा चतुरी चमार । ये कैसा मेल महाप्राण ? कोई मेल नहीं कोई समानता नहीं लेकिन साथ-साथ जैसे पतझर के साथ वसंत।
मैं स्तब्ध !!
लाल रेखाओं से पूर्ण समस्त मानव समाज में फैले हुई रुढियों को तोड़ते नेत्र जो वसंत की दस्तक से बेखबर चला जा रहा है विवाद और विकास के द्वंद्व में घिरे कालखंड की तरफ । क्या ये छायावाद है?
किसने भेजा है उसे बोलो कवि यूं ही नहीं इस धरा पर में शिक्षा देने चली आई चले तो शिवमंगल सिंह सुमन जैसे कवि भी आए थे । हर कोई चला आता है तुम्हें खोजता इस धरा पर आज भी तुम्हारी पगध्वनि सुनाई देती है और सुनाई देता है मनोहरा का
श्री रामचंद कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणं... राम अर्चन उनके कंठ से फूट रहा है और फूट रही है रुलाई मेरी कंठ से आँखे बहा ले जा रही है मेरे अहंकार को मेरी श्रेष्ठा को तभी मनोहरा देवी का स्पर्श मेरे कंधे पर होता है मुक्त हो किरण इन झूठे राग से और मैं कॉलेज प्रांगण में खड़ी उनकी प्रतिमा के आगे नत हूं।
निराला गा रहे है
छल-छल हो गए नयन, कुछ बूंद पुन: ढलके दृग जल, रुक कंठ!!
जा रही हूं महाकवि नौकरी का बोझ अब सह नहीं जाता दस साल बिताये उन क्षणों में अगर आप न होते तो कैसे समझ पाती वसंत में पतझड़ मिला होता है। कहाँ समझ पाती कविता स्त्री की सुकुमारता नहीं, कवितत्व का पुरुष गर्व है।
कहाँ उतार पाती मन का अनकहा कहाँ कर पाती कागज की धरती को धानी कहाँ समझ पाती रिश्तों को जिन्होंने कच्चे सूत से आप को भी बांध लिया था।
नमन तुम्हें मनोहरा
अब चाहे तर्कों के बुने हुए जाल
विरोध का झेलूं भाल स्नेह का नहीं मिले प्रतिदान चाहे भुला दे मुझे जीवन मनोहरा के समान फिर भी शूलों के रवि पथ पर चलती जाउंगी उनके लिए जिनके लिए वसंत पतझड़ में भेद नहीं...छिना हुआ धन, जिससे आधे नहीं वसन तन, आग तापकर पार कर रहे है गृहजीवन।
बांधो न नाव इस ठांव बंधु.

दस साल डलमऊ के पास बिताए कॉलेज में रहते हुये कुछ सुनी कुछ पढ़ी बातों पर आधारित संस्मरण।


Saturday, February 18, 2017

सुप्रीम मिस्ट्रेट ऑफ़ द यूनिवार्स

सिबल ऑफ़ द लिवरेटिंग पॉवर्स ऑफ़ फीमेल सेक्सुअलिटी ! सुप्रीम मिस्ट्रेट ऑफ़ द यूनिवार्स ।
मृत्युजयी निरावरण श्यामवर्ण काली, कालजयी आदि शक्ति जिसके अस्तित्व से जन्मी है प्रलय क्योंकि उस शक्ति ने साधा है काल को और उसे सहा भी है। विरोध स्वरुप जिसका जन्म हुआ हो उसे काल की क्या चिंता वो तो उसके आगे असहाय है।
संयुक्ति से जन्मे त्रिकाल सत्य, शिव सुंदर होता है बिना शक्ति शिव शव है दोनों का मिलन ही अद्धैत की आत्मा है।
स्त्री सदा से प्रेममय है काल से मुक्त पर पुरुष
 ने अपनी रोपित अकांक्षाओ से उसे तोड़ दिया है उसके भीतर की शक्ति असहाय हो या तो ख़त्म हो रही है या विध्वंस करने को बाध्य हो रही है। नकली जिन्दगी जीती स्त्री मानवीय संवेदना खो रही है।
सहअस्तित्व से संसार चक्र चलेगा लेकिन उससे पहले स्त्री को प्रेम में रहने देना होगा क्योंकि उसका प्रेम और उसका  खुद से समर्पण ही उसकी स्वाधीनता है अगर आदिकालीन स्वभाव व स्वरुप नष्ट कर दिये जाएंगे तो आदते नए अधिकार पाने की चेष्टा करेंगी जो शायद मानवता के लिए स्रष्टि के लिए ठीक नहीं होगा ।
उसे सजग और निर्दोष रहने दो ।समय से मुक्ति के लिय जरुरी है  बेशर्त प्रेम में होना। शिव की उर्जा को धारण करने वाली शक्ति ही है हमें इसे नहीं भूलना चाहिये।

Saturday, October 1, 2016

रुपजीवा संवेदना

परिपथ से राजपथ तक
संवेदना दिखाई पड़ती है
किसी मचलती तारिका की तरह
अपनी अदाओं से
उत्तेजना फैलाती
तूफान खड़ा कर देती है
संवेदना जो पूरी तरह बदल गई है वेश्या में
लगाती है अपनी कीमत
त्रिवर्ग की सिद्धि में लगे लोग
बोली लगा खरीदते है
और संवेदना चल देती है उनके साथ
दुकान चमकाने
घटना हतप्रभ हो देखती है तमाशा
उसकी चीड़ फाड़ में लगा समाज
संवेदना पर लिखता है इतिहास
विशेष बन संवेदना
इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होती है
बिछती है नेता,अभिनेता,कवि,कलाकार
के बिस्तर पर
रुपजीवा की भाती बिस्तर बदलती ये
पूरे करती है मनोरथ
घटना किसी अंधेरे कोने में
मुंह छिपाये सुबकती है
संवेदना पण्यस्त्री बन
बैठ जाती है फिर बाज़ार में